लैलूंगा : हाईकोर्ट के आदेश की अवमानना! कागजों पर न्याय, जमीन पर डकैती! ‘लैलूंगा-बाकारुमा रोड’ विवाद में घिरे जिला कलेक्टर; बिना सहमति और मुआवजे के 5 साल पहले ही बना दी अवैध सड़क…क्या अब राजपुर में होगा आंदोलन??…

- बिलासपुर हाईकोर्ट ने 2021 में दिया था नियमानुसार जमीन अधिग्रहण और सीमांकन का आदेश, प्रशासन ने ठंडे बस्ते में डाला।…
- LARR एक्ट 2013 की धारा 38, 40(5) और 41 को ठेंगा दिखाकर साल 2020-21 में ही कर दिया गया था अवैध निर्माण।…
- 11 जुलाई 2026 तक न्याय न मिलने पर 12 जुलाई 26 को राजपुर बाजार में उग्र चक्काजाम आंदोलन की दी गई अंतिम चेतावनी।…
रायगढ़। लैलूंगा-बाकारुमा मुख्य मार्ग के राजपुर क्षेत्र में विकास के नाम पर आदिवासियों और स्थानीय किसानों के दमन का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ देश के सख्त भूमि अधिग्रहण कानून की धज्जियां उड़ाई हैं, बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायिक व्यवस्था ‘माननीय उच्च न्यायालय’ के आदेश को भी ठेंगे पर रख दिया है। सनसनीखेज मोड़ यह है कि जिस सड़क चौड़ीकरण को लेकर आज विवाद गहराया हुआ है, उसका एक बड़ा हिस्सा प्रशासन द्वारा साल 2020-21 में ही बिना किसी कानूनी प्रक्रिया और बिना मुआवजा दिए, जबरन गुंडागर्दी के दम पर बना दिया गया था।

बिलासपुर हाईकोर्ट के आदेश को दी खुली चुनौती – मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित किसान /अधिवक्ता – राकेश कुमार बेहरा ने साल 2021 में बिलासपुर उच्च न्यायालय (High Court of Chhattisgarh) का दरवाजा खटखटाया था।
माननीय जस्टिस गौतम भादुड़ी की एकल पीठ ने 25 मार्च 2021 को याचिका का निपटारा करते हुए प्रशासन को स्पष्ट और कड़े निर्देश जारी किए थे :
- यदि याचिकाकर्ताओं की निजी भूमि सड़क चौड़ीकरण के दायरे में आ रही है, तो प्रशासन किसी भी सूरत में बलपूर्वक (by force) जमीन पर कब्जा नहीं कर सकता।
- आदेश की प्रति मिलने के 30 दिनों के भीतर पीड़ितों की भूमि का सीमांकन (Demarcation) किया जाए।
- यदि भूमि का अधिग्रहण करना ही है, तो अधिकतम 6 महीने के भीतर कानून के तहत ‘उचित प्रक्रिया’ (Due process of acquisition) का पालन कर मुआवजा सुनिश्चित किया जाए।

आज 5 साल बीत जाने के बाद भी हाईकोर्ट के इस स्पष्ट आदेश की फाइलें लैलूंगा और रायगढ़ प्रशासनिक दफ्तरों की धूल फांक रही हैं। न तो पीड़ितों को कानून सम्मत उचित मुआवजा दिया गया और न ही उचित प्रक्रिया अपनाई गई।
2020-21 में हुआ ‘अवैध’ निर्माण, उखाड़ फेंके कानून के नियम – प्रशासन और निर्माण एजेंसी ने साल 2020-21 के दौरान ही पीड़ितों की निजी भूमि पर बिना भूमि अधिग्रहण अधिनियम (LARR Act, 2013) की धारा 41 का पालन किए (जिसके तहत अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा और पंचायत की सहमति अनिवार्य होती है), जबरन खंभे गाड़ दिए और सड़क का निर्माण कर दिया।
अधिनियम की धारा 38 के तहत कलेक्टर को यह सुनिश्चित करना था कि मुआवजे की घोषणा के 3 महीने के भीतर भुगतान हो, लेकिन भुगतान तो दूर, पीड़ितों का एक मकान बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस की तामीली के मलबे में तब्दील कर दिया गया। आपातकालीन क्लॉज (धारा 40(5)) के तहत मिलने वाला 75% अतिरिक्त मुआवजा तो अब एक दूर का सपना बन चुका है।

जर्जर सड़क और न्याय के लिए 12 जुलाई को ‘आर-पार’ की जंग – 2020-21 में बने इस अवैध मार्ग के बाद भी आज राजपुर क्षेत्र की यह सड़क पूरी तरह से जर्जर, बदहाल और जानलेवा गड्ढों में तब्दील हो चुकी है। एक तरफ किसान अपनी जमीन और आशियाना गंवाकर न्याय के लिए भटक रहे हैं, तो दूसरी तरफ आम जनता रोज दुर्घटनाओं का शिकार हो रही है।
इस दोहरे अन्याय के खिलाफ अब क्षेत्र की जनता और पीड़ितों का आक्रोश फूट पड़ा है। अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) लैलूंगा को सौंपे गए अल्टीमेटम पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि दिनांक 11.07.2026 (शनिवार) तक सड़क मरम्मत का कार्य शुरू नहीं होता और पीड़ितों को हाईकोर्ट के आदेशानुसार न्याय नहीं मिलता, तो रविवार 12.07.2026 को राजपुर बाजार के पास ऐतिहासिक चक्काजाम आंदोलन किया जाएगा। रवि भगत (ग्राम झरन, लैलूंगा) सहित स्थानीय ग्रामीणों ने साफ कह दिया है कि इस बार लड़ाई आर-पार की होगी और शासन-प्रशासन की इस तानाशाही को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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