महतारी वंदन योजना में महाघोटाला : ‘पुरुष’ बनता रहा ‘महतारी’, 12 महीने तक डकारता रहा महिलाओं का हक; सरकारी ‘आदेश’ ने खोली व्यवस्था की पोल!… जाने पूरा मामला…

खैरागढ़-छुईखदान-गंडई । छत्तीसगढ़ सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी ‘महतारी वंदन योजना’ में खैरागढ़ के ग्राम मुढ़ीपार से एक ऐसा सनसनीखेज और शर्मनाक मामला सामने आया है, जिसने महिला एवं बाल विकास विभाग के दावों के परखच्चे उड़ा कर रख दिए हैं। जिस योजना का पैसा प्रदेश की गरीब और जरूरतमंद महिलाओं के खातों में जाना था, उसका लाभ एक साल तक एक पुरुष उठाता रहा। व्यवस्था की अकर्मण्यता का आलम देखिए कि कागजों में एक पुरुष खुद ही ‘महिला हितग्राही’ बन गया और खुद को ही अपना ‘पति’ भी घोषित कर दिया। इसके बावजूद विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी आँखें मूंदकर ‘सत्यापन’ (Verification) का बटन दबाते रहे।

अब इस महालापरवाही पर पर्दा डालने के लिए विभाग द्वारा आनन-फानन में जारी किया गया आधिकारिक सरकारी पत्र (क्रमांक/631/आईसीडीएस/2026-27) मीडिया के हाथ लगा है, जिसने व्यवस्था की इस गंभीर चूक पर मुहर लगा दी है।
खुद का ‘पति’ बना पुरुष, दो-दो स्तर की जांच फेल! – यह पूरा मामला खैरागढ़ के ग्राम मुढ़ीपार का है, जहाँ तिलोक साहू नाम के एक युवक ने महतारी वंदन योजना में सेंधमारी की। ऑनलाइन रिकॉर्ड के मुताबिक, इस शातिर आवेदन में:
- हितग्राही का नाम: तिलोक साहू (पुरुष)
- पति का नाम: तिलोक साहू
नियमों के मुताबिक, यह योजना सिर्फ और सिर्फ पात्र महिलाओं के लिए है। लेकिन डिजिटल इंडिया और कड़े सत्यापन के दावों के बीच, यह आवेदन पहले आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के स्तर पर पास हुआ और फिर सुपरवाइजर ने भी इस पर अपनी हरी झंडी दे दी। सवाल यह उठता है कि क्या सत्यापन करने वाले कर्मचारियों को पुरुष और महिला के नाम का अंतर भी समझ नहीं आता? या फिर बिना दस्तावेजों को देखे ही सिर्फ ‘आंखें बंद कर’ अप्रूवल की मुहर लगा दी गई?
सरकारी आदेश की कॉपी आई सामने : ₹10,000 की रिकवरी का फरमान – एकीकृत बाल विकास सेवा परियोजना (ICDS), खैरागढ़ की परियोजना अधिकारी रंजना श्रीवास्तव द्वारा 3 जुलाई 2026 को आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank), शाखा खैरागढ़ के शाखा प्रबंधक को एक आधिकारिक पत्र जारी किया गया है। इस पत्र ने पूरे मामले को आधिकारिक रूप से उजागर कर दिया है।
सरकारी आदेश के मुख्य और चौंकाने वाले अंश:
- अपात्र पुरुष के खाते में जा रही थी राशि: पत्र में साफ लिखा है कि “ग्राम मुढ़ीपार से अपात्र हितग्राही तिलोक साहू को महतारी वंदन योजनांतर्गत राशि प्राप्त हो रही थी।”
- आईडीबीआई बैंक खाता: अपात्र पुरुष के खाता क्रमांक 1762104000039242 में यह राशि निरंतर जमा हो रही थी।
- रायपुर के खाते में ट्रांसफर का आदेश: विभाग ने बैंक को निर्देश दिया है कि इस अपात्र पुरुष के खाते से 10,000 रुपये की राशि को वापस खींचकर शासन के आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank), शाखा अवंति विहार, रायपुर के खाता क्रमांक 472001000010 (IFSC: ICIC0004720) में RTGS/NEFT के माध्यम से ट्रांसफर किया जाए।
यहाँ खड़ा होता है सबसे बड़ा झोल: डिजिटल रिकॉर्ड के अनुसार, इस फर्जीवाड़े के जरिए संबंधित खाते में पूरे 12 महीने (एक साल) तक भुगतान दर्शाया गया है। यदि हर महीने 1,000 रुपये दिए जाते हैं, तो 12 महीने का कुल भुगतान 12,000 रुपये होना चाहिए। लेकिन सरकारी आदेश में सिर्फ 10,000 रुपये की रिकवरी की बात कही गई है। अब जनता यह पूछ रही है कि बाकी के 2 महीनों की राशि (2,000 रुपये) कहाँ गायब है? क्या इस रिकवरी के आंकड़े में भी कोई नया खेल चल रहा है?
‘ट्रायल’ के नाम पर व्यवस्था का मज़ाक! – जब इस पूरे मामले पर आरोपी तिलोक साहू से बात की गई, तो उसका तर्क और भी हैरान करने वाला था। एक सीएससी (CSC) सेंटर संचालित करने वाले तिलोक का कहना है कि उसने केवल पोर्टल की प्रक्रिया समझने और ‘ट्रायल’ के उद्देश्य से यह आवेदन किया था।
यह दलील गले उतरने वाली नहीं है। क्या किसी सरकारी योजना के पोर्टल का ट्रायल लेने के लिए एक पुरुष को एक साल तक सरकारी खजाने से पैसा खाने की छूट दी जा सकती है?
तीखे सवाल: क्या ‘सत्यापित’ का बटन दबाने वालों पर गिरेगी गाज? – यह मामला सिर्फ एक गलत आवेदन का नहीं है, बल्कि उस समूचे सिस्टम का ‘सिस्टमैटिक फेलियर’ (Systematic Failure) है जो घोर लापरवाही की नींव पर टिका है।
- क्या सिर्फ पैसा वापस ले लेने से गुनाह खत्म हो जाता है? अगर यह मामला उजागर न होता, तो यह फर्जीवाड़ा कब तक चलता रहता?
- आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सुपरवाइजर पर कार्रवाई क्यों नहीं? जिन ज़िम्मेदार कंधों पर सत्यापन का जिम्मा था, क्या उनका काम सिर्फ बिना देखे ‘Approved’ का बटन दबाना है? क्या उनकी कोई जवाबदेही नहीं है?
- क्या यह अकेला मामला है? जब एक पुरुष का आवेदन दो-दो स्तर की जांच को इतनी आसानी से पार कर सकता है, तो प्रदेश भर में ऐसी कितनी अपात्र ‘महतारियां’ और पुरुष सरकारी खजाने को चूना लगा रहे होंगे?
महिला एवं बाल विकास विभाग ने पत्र जारी कर पैसे तो वापस मांग लिए हैं और बदनामी से बचने के लिए पोर्टल पर आवेदन को ‘परमानेंट होल्ड’ कर दिया है, लेकिन असली परीक्षा अब प्रशासन की है। देखना होगा कि ‘सत्यापित’ का बटन दबाने वाले लापरवाह कर्मचारियों को सजा मिलती है या फिर यह फाइल भी हमेशा की तरह सरकारी बस्ते में दबाकर ठंडी कर दी जाएगी।




