रायगढ़ के राजपुर में ‘विकास’ का नया खेला: जमीन किसी की, सड़क किसी की… और प्रशासन गहरी नींद में!…

रायगढ़।स्वागत है आपका लैलूंगा के राजपुर में, जहाँ आजकल ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’ वाला नाटक फुल एचडी (HD) में लाइव चल रहा है। यहाँ प्रशासन ने ‘विकास’ का एक ऐसा नया चश्मा पहना है, जिसमें दूसरों की निजी जमीन सीधे ‘सरकारी जागीर’ नजर आने लगती है। इस नए खेल के मुख्य शिकार बने हैं स्थानीय निवासी राकेश बेहरा, और खेल का नियम बड़ा सीधा है— “जमीन तुम्हारी, पर सड़क हमारी… और परमिशन? वो क्या होता है भाई?”
बिना पूछे सड़क : प्रशासन की दबंगई का ‘लाइव डेमो’ – कहानी कुछ यूँ है कि राजपुर में राकेश बेहरा की एक जमीन स्थित है। एक दिन अचानक सिस्टम के भीतर ‘विकास का भूत’ जागा और बिना राकेश बेहरा की सहमति लिए, उनकी निजी जमीन पर धड़ल्ले से सड़क निर्माण का प्रयास शुरू कर दिया गया। ना कोई नोटिस, ना कोई परमिशन। मानो प्रशासन कह रहा हो, “हम तो सड़क बनाएंगे, तुमको जो उखाड़ना है उखाड़ लो।” इसे सरकारी भाषा में ‘जनहित’ कहते हैं और आम आदमी की भाषा में ‘खुली दादागिरी’।
हाई कोर्ट का डंडा और बाबुओं की ‘कुंभकर्णी नींद’ – पर राकेश बेहरा भी कच्ची गोलियां नहीं खेले थे। उन्होंने इस सीनाजोरी के खिलाफ सीधे माननीय उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटाया और याचिका प्रस्तुत कर दी। अदालत ने भी प्रशासन की इस ‘रचनात्मक इंजीनियरिंग’ को देखकर तुरंत सीमांकन (Demarcation) का आदेश पारित कर दिया।
लेकिन ठहरिए! आप भूल रहे हैं कि यह हमारा महान स्थानीय प्रशासन है। हाई कोर्ट का आदेश आ गया, लेकिन हमारे सरकारी बाबुओं की ‘फाइलें’ अभी भी खिसकने का नाम नहीं ले रही हैं। वर्तमान में सीमांकन का आवेदन सरकारी दफ्तर की किसी अलमारी में धूल फांकते हुए ‘लंबित’ है। प्रशासन की उदासीनता और सुस्ती का आलम यह है कि कोर्ट के आदेश के बाद भी उनके कानों पर जूं नहीं रेंग रही है।
अजब विडंबना : जिसने सताया उसी का काम कर रहा पीड़ित – अब इस व्यंग्यात्मक कहानी का सबसे बड़ा क्लाइमेक्स सुनिए। एक तरफ प्रशासन की दादागिरी और दूसरी तरफ उनकी बेशर्म सुस्ती। सड़क की हालत खराब और स्थानीय लोग परेशान। ऐसे में सिस्टम के गाल पर करारा तमाचा जड़ते हुए खुद राकेश बेहरा आगे आए।
जिस व्यक्ति की जमीन पर जबरन कब्जा करने की कोशिश की गई, उसी राकेश बेहरा ने क्षेत्र के लोगों की परेशानियों और गड्ढों को देखते हुए, अपने स्तर पर उस सड़क की रिपेयरिंग का कार्य शुरू करवा दिया।
वाह रे सिस्टम! – इसे कहते हैं असली ‘रामराज्य’ (व्यंग्य)! प्रशासन पहले आपकी जमीन पर जबरन घुसेगा, फिर कोर्ट के आदेश को ठेंगे पर रखेगा, और अंत में आपको ही जनता की भलाई के लिए अपनी जेब से सड़क मरम्मत करवानी पड़ेगी। राजपुर का यह ‘नया खेला’ उन सभी अधिकारियों के लिए एक केस स्टडी है, जिन्हें यह सीखना है कि बिना काम किए और बिना नियम माने, कुर्सी पर बैठकर ‘दादागिरी’ कैसे की जाती है।
जनता तो बस यही पूछ रही है – साहब, जब सड़क भी राकेश बेहरा को ही सुधारनी थी, तो आप लोग दफ्तर में बैठकर कौन सा ‘तीर’ मार रहे हैं?




