ग्राउंड रिपोर्ट: ‘माननीयों’ के आशियाने के लिए मलबे में मिला दिए गए गरीबों के सपने, राजधानी में इंसानियत शर्मसार!…

- रायपुर के नकटी गांव में बारिश के बीच 80 परिवारों पर कहर बनकर टूटा प्रशासन का बुलडोजर, 1000 पुलिस जवानों के बूटों तले रौंदे गए सांसद के वादे।…
रायपुर: विकास की जिस ईंट पर ‘वीआईपी (VIP) विधायक कॉलोनी’ की नींव रखी जा रही है, आज उस ईंट पर गरीबों के आंसू और बेबसी के धब्बे लग गए हैं। रायपुर के माना इलाके के नकटी गांव में सोमवार की सुबह जो मंजर देखने को मिला, वह सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि सत्ता के गुरूर और सिस्टम की निष्ठुरता का जीता-जागता सबूत था। भारी बारिश के अलर्ट के बीच 80 परिवारों के आशियाने जमींदोज कर दिए गए, और वो भी उन माननीयों के लिए, जिनके पास पहले से ही सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं है।

खबर के सबसे धारदार और चुभते हुए पहलू:
- सरकारी योजनाओं का क्रूर मजाक : इस पूरी कार्रवाई का सबसे बड़ा और कड़वा सच यह है कि जिन 80 घरों को ढहाया गया, उनमें से 32 घर प्रधानमंत्री और इंदिरा आवास योजना के तहत बने थे। एक तरफ सरकारें मंच से गरीबों को पक्की छत देने का ढिंढोरा पीटती हैं, और दूसरी तरफ ‘वीआईपी कॉलोनी’ के नाम पर सरकारी पैसे से बनी उन्हीं छतों को रौंद देती हैं। क्या सरकारी योजनाओं की उम्र अब माननीयों की जरूरत के हिसाब से तय होगी?
- 48 घंटे में हवा हुआ सांसद का वादा : लोकतंत्र में जनता और जनप्रतिनिधि के बीच भरोसे का कत्ल कैसे होता है, यह नकटी गांव ने आज सुबह अपनी आंखों से देखा। महज दो दिन पहले रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने ग्रामीणों को छाती ठोककर भरोसा दिलाया था कि “बारिश के मौसम में किसी का मकान नहीं टूटेगा।” आज उसी वादे के मलबे पर ग्रामीण अपने टूटे हुए घर का सामान समेट रहे हैं। क्या सांसद का आश्वासन सिर्फ ग्रामीणों के आक्रोश को शांत करने का एक राजनीतिक जुमला था?
- 80 घर और 1000 जवानों की फौज : प्रशासन का खौफ देखिए। अपने ही शहर के निहत्थे नागरिकों, महिलाओं और बच्चों को खदेड़ने के लिए रविवार रात से ही गांव को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। 1000 से ज्यादा जवान ऐसे तैनात किए गए जैसे किसी खूंखार अपराधी पर कार्रवाई करनी हो। सुबह जेसीबी (JCB) देखते ही जब बेबस ग्रामीण अपने घरों को बचाने मशीनों के आगे अड़े, तो उन्हें पुलिस के धक्कों और बल-प्रयोग का सामना करना पड़ा।
- भूखा बचपन, बेबस बुढ़ापा और मलबे पर कटती जिंदगी : कार्रवाई की सबसे रुला देने वाली तस्वीर एक छोटी बच्ची की थी। डबडबाई आंखों से उसने बताया कि बुलडोजर के खौफ से घर में कल रात से चूल्हा तक नहीं जला और वह सुबह से भूखी है। वहीं, जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई से बनाए घर को टूटता देख, एक बुजुर्ग अपने मासूम पोते को सीने से लगाए मलबे के ढेर पर सुन्न बैठे नजर आए। यह दृश्य उस ‘कल्याणकारी राज्य’ के मुंह पर करारा तमाचा है जो गरीबों के नाम पर वोट मांगता है।
डैमेज कंट्रोल और खोखले दावे – जब बेदर्दी से घर तोड़ दिए गए और बवाल मीडिया की सुर्खियां बनने लगा, तब प्रशासन ने कागजी झुनझुना थमाते हुए दावा किया कि प्रभावितों को नया रायपुर के सेक्टर-30 स्थित ईडब्ल्यूएस (EWS) में मकान दिए जाएंगे। कहा जा रहा है कि आवंटन की प्रक्रिया अब ‘जारी’ है।
सबसे बड़ा सवाल : जब घर तोड़ने ही थे, तो आवंटन और शिफ्टिंग की प्रक्रिया पहले पूरी क्यों नहीं की गई? क्या इन 80 परिवारों को बारिश के बीच खुले आसमान के नीचे, तिरपाल तानकर भूखे पेट रहने के लिए छोड़ देना ही प्रशासन का ‘पुनर्वास मॉडल’ है?
नकटी गांव का मलबा आज सत्ता के गलियारों से चीख-चीख कर एक ही सवाल पूछ रहा है—क्या ‘माननीयों’ की चैन की नींद के लिए गरीबों के बच्चों का भूखा और बेघर होना जरूरी है? आज जो बुलडोजर चला है, उसने सिर्फ ईंट-गारे की दीवारें नहीं तोड़ी हैं, बल्कि सिस्टम से एक आम आदमी का आखिरी भरोसा भी कुचल दिया है।




