
फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद/डौंडीलोहारा। राजनीति को देश सेवा का माध्यम कहा जाता है, लेकिन बालोद जिले के डौंडीलोहारा विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों सेवा का नहीं, बल्कि ‘मेवा’ का अजब-गजब खेल चल रहा है। यहां सिद्धांत, निष्ठा और विचारधारा जैसी बातें किताबों में ही अच्छी लगती हैं; जमीन पर तो सिर्फ ‘दलबदल’ का सुपरहिट फॉर्मूला चल रहा है। जो कल तक विपक्षी खेमे में रहकर जहर उगल रहे थे, वे आज सत्ताधारी दल की अग्रिम पंक्ति में बैठकर हुकुम चला रहे हैं। डौंडीलोहारा की सियासत में इन “बरसाती मेंढ़को” की ऐसी चांदी है कि बरसों से दरी उठाने और झंडा बांधने वाले असली कार्यकर्ता आज कोने में बैठकर अपनी किस्मत को रो रहे हैं।
विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों दलबदल कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक बेहद मुनाफेदार ‘स्टार्टअप’ बन चुका है। अपनी पुरानी पार्टी में तिरस्कृत, बड़बोले, कपटी और अनुशासनहीनता के तमगे से नवाजे गए नेताओं के लिए दूसरी पार्टी एक ‘वाशिंग मशीन’ की तरह काम कर रही है। नई पार्टी की चौखट पर पैर रखते ही इनका पुराना चाटुकारिता का हुनर जाग उठता है। नतीजा यह है कि अपनी मेहनत से पार्टी की नींव मजबूत करने वाले जुझारू और ईमानदार कार्यकर्ता आज किनारे लगा दिए गए हैं और ये ‘परदेसी’ नेता उनके सिर पर बैठकर हुकूमत कर रहे हैं। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि शीर्ष नेतृत्व इस पूरे तमाशे को देखकर धृतराष्ट्र की तरह चुप्पी साधे बैठा है।

पिछले कुछ वर्षों का इतिहास : गिरगिट भी शरमा जाए!
डौंडीलोहारा और बालोद जिले की राजनीति का पिछले दो दशकों (2006 से 2026 तक) का इतिहास खंगालें, तो दलबदल के खेल ने इस क्षेत्र की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को एक कॉमेडी शो में बदल दिया है। इन 20 सालों में दलबदल के मुख्य ट्रेंड्स और समीकरणों को बिना किसी दलबदलू नेता का नाम न उजागर करते हुए हम कुछ मुख्य बिंदुओं में समझ सकते हैं। वही इन दलबदलुओं को जिले के जागरूक व राजनीतिक समझ रखने वाले पाठक समझ जायेंगे :
2006-2013 : ‘लूप लाइन’ से ‘कमल’ की लाइफलाइन : इस दौर में जब भी कांग्रेस के कुछ कद्दावर या महत्वाकांक्षी नेताओं को हाशिए पर धकेला गया, उन्होंने बिना देर किए पाला बदला। कई ऐसे नेता जिन्हें कांग्रेस ने ‘दुतकार’ कर बाहर निकाला था, उन्होंने भाजपा का दामन थामकर खुद को ‘सिंडिकेट’ का राजा बना लिया।
2013-2018 : सत्ता के इर्द-गिर्द परिक्रमा : इस पांच साल के कार्यकाल में दलबदल की रफ्तार इसलिए तेज हुई क्योंकि नेताओं को समझ आ गया था कि बिना सत्ता के ‘विटामिन-एम’ (आर्थिक लाभ) मिलना मुश्किल है। पद, प्रतिष्ठा और ठेकेदारी की लालच में कई दिग्गज रातों-रात अपनी विचारधारा बदलकर ‘गंगा’ नहा लिए।
2018-2023 : कांग्रेस की वापसी और फिर भाजपा का ‘रिवर्स स्विंग’ : 2018 में जब राज्य के समीकरण बदले, तो कई अवसरवादियों ने फिर से पाला बदला। लेकिन जैसे ही हवा का रुख दोबारा बदला, कांग्रेस से आए बाहरी नेताओं ने भाजपा में प्रवेश कर ऐसा सिक्का जमाया कि मूल भाजपाई आज भी एक-दूसरे का मुंह ताक रहे हैं।
2024-2026 (वर्तमान स्थिति) : आलीशान कोठी और स्वर्णबंध का वैभव : पिछले कुछ सालों में तो हद ही हो गई है। कांग्रेस से भाजपा में आए कई दलबदलू नेता आज बड़ी-बड़ी आलीशान कोठियों, चमचमाती लग्जरी कारों और कलाई से लेकर अंगुलियों में मोटे-मोटे सोने के कड़े (स्वर्णबंध) पहने घूम रहे हैं। यह ठाट-बाट गवाही देता है कि दलबदल का धंधा कितना चोखा है।
मुद्दे की बात : ‘दरी बिछाते-बिछाते’ फोटो पर माला चढ़ाने वाला भी नहीं बचा
इस पूरे राजनीतिक सर्कस के बीच सबसे दर्दनाक पहलू उस जमीनी कार्यकर्ता का है, जिसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा के सिद्धांतों को अपनी जिंदगी मान लिया। नाम न उजागर करने की शर्त पर सालों से लूप लाइन में चल रहे एक बुजुर्ग कार्यकर्ता ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, “पार्टी के बड़े नेताओं को तो बस मलाईदार चेहरे पसंद हैं। हम तो दरी बिछाते और उठाते-उठाते ही बूढ़े हो गए।”
विडंबना देखिए, कई कर्मठ, जुझारू व निष्ठावान कार्यकर्ता इसी गफलत में दुनिया से ‘ईशलोक’ (परलोक) प्रस्थान कर गए कि आज नहीं तो कल पार्टी उनके त्याग का सम्मान करेगी। आज आलम यह है कि उन दिवंगत बुजुर्ग भाजपा कार्यकर्ताओं की तस्वीरों पर माल्यार्पण करने वाला भी कोई पार्टी कार्यकर्ता नहीं बचा, क्योंकि कमान तो अब उन ‘कीटाणु’ नुमा चाटुकारों के हाथ में है जो सिर्फ उगते सूरज को सलाम करना जानते हैं। वही कुछ दलबदलू नेता एक फेमस, प्रतिष्ठित और विवादित “बाबा की चरण पादुका” अपने सिर पर धारण कर अपना बड़ा बड़ा काम निकाल रहे है।
“किस्मत बदलनी हो, तो थाम लो फूल”
क्षेत्र के एक वरिष्ठ और राजनीतिक सूझ-बूझ रखने वाले जानकार ने चुटकी लेते हुए कहा कि जो नेता आज भी कांग्रेस या अन्य दलों की ‘लूप लाइन’ में बैठकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, उन्हें बिना वक्त गंवाए हाथ में ‘फूल’ थाम लेना चाहिए। डौंडीलोहारा में इसके एक-दो नहीं, बल्कि बीसियों जिंदा उदाहरण घूम रहे हैं, जो कल तक सड़क पर थे और आज सत्ता के गलियारों में शान से सिंडिकेट चला रहे हैं। वहीं असली और कड़क वैचारिक कांग्रेसी या भाजपाई आज भी अपनी फटी चप्पलें घिसने को मजबूर हैं। अब देखना यह है कि आलाकमान की यह ‘कुंभकर्णी नींद’ कब टूटती है या फिर डौंडीलोहारा का यह अजब-गजब खेल ऐसे ही अनवरत जारी रहता है। अब आगे देखना है कि भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ता आगे भी चुप्पी साधे रहेंगे या दलबदलुओं को किनारे करने जुगत लगाएंगे?
टीप : इस लेख/समाचार में हम किसी भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं तथा नेताओं का नाम नहीं ले रहे है। वही कुछ “हुडुकचुल्लू टाइप के नेता” अपने आप को उस श्रेणी में रख ले तो वो इनकी इच्छा। जिसके जिम्मेदारी हम नहीं लेते।




