रायगढ़

अजूबा : घरघोड़ा SDM दफ्तर का ‘RTI टाइम मशीन’ पोर्टल, जहाँ वर्तमान साहब गायब हैं और ‘भूतपूर्व’ आज भी राज कर रहे हैं!…

घरघोड़ा। अगर आपको लगता है कि टाइम मशीन सिर्फ हॉलीवुड की फिल्मों में होती है, तो आपको तुरंत घरघोड़ा SDM कार्यालय के RTI पोर्टल का दौरा करना चाहिए। डिजिटल इंडिया के इस दौर में घरघोड़ा प्रशासन ने एक ऐसा ‘अद्भुत चमत्कारी पोर्टल’ तैयार कर लिया है, जहाँ समय रुक सा गया है। इस पोर्टल की महिमा ऐसी है कि यहाँ वर्तमान में जो कुर्सी पर बैठे हैं, उनका नाम-निशान तक नहीं है, लेकिन जो इतिहास बन चुके हैं, वो आज भी पोर्टल पर ‘अमर’ हैं।

जी हाँ, पोर्टल महाशय को ‘वर्तमान साहब’ के नाम से इतनी चिढ़ है कि उन्होंने रमेश मोर और रिषा ठाकुर – दोनों ‘पूर्व’ जन सूचना अधिकारियों (PIO) को  अपने साथ रखा हुआ है।

कुर्सी पर कोई और, डिजिटल दुनिया में कोई और! – इसे कहते हैं असली ‘रिमोट कंट्रोल’ व्यवस्था। दफ्तर में जब आम जनता सूचना का अधिकार लेकर पहुँचती है, तो सामने कुर्सी पर कोई और साहब मुस्कुराते हुए मिलते हैं। लेकिन जब वही जनता ऑनलाइन पोर्टल खोलती है, तो वहाँ रमेश जी और रिषा जी स्वागत करते नजर आते हैं।

​जनता बेचारी असमंजस में है कि सूचना आखिर मांगे तो किससे मांगे? वर्तमान साहब से, जो दफ्तर में तो हैं पर पोर्टल पर नहीं… या फिर उन पूर्व अधिकारियों से, जो पोर्टल पर तो हैं पर दफ्तर में नहीं! ऐसा लगता है कि प्रशासन ‘दिखते कुछ हैं और होते कुछ हैं’ के दार्शनिक सिद्धांत को अक्षरशः जी रहा है।

पोर्टल का ‘भूतपूर्व प्रेम’ : अपडेट करना मना है! – इस डिजिटल लापरवाही को देखकर तो यही लगता है कि घरघोड़ा SDM दफ्तर का आईटी विभाग शायद किसी गहरे ध्यान (योग निद्रा) में लीन है। उनके लिए वर्तमान अधिकारी का आना-जाना महज़ एक ‘लौकिक घटना’ है, जिससे उनके पवित्र डिजिटल पोर्टल की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

शायद जिम्मेदार बाबू यह सोचकर बैठे हैं- “क्या फर्क पड़ता है साहब, नाम में क्या रखा है? आरटीआई का जवाब तो वैसे भी समय पर नहीं देना है, तो नाम रमेश का रहे, रिषा का रहे या वर्तमान साहब का, जनता तो सिर्फ चक्कर ही काटेगी!”

इस ‘अदृश्य’ व्यवस्था पर कुछ तीखे व्यंग्य बाण :

  • ‘मिस्टर इंडिया’ मोड में वर्तमान साहब: वर्तमान SDM साहब का नाम पोर्टल से ऐसे गायब है, जैसे किसी फिल्म में अनिल कपूर लाल चश्मा हटाने के बाद गायब हो जाते थे। क्या साहब ने खुद को आरटीआई से ‘गोपनीय’ रख लिया है?
  • सैलरी वर्तमान को, क्रेडिट पूर्व को?: जब काम और नाम की बात आती है, तो पोर्टल आज भी पुराने अधिकारियों के प्रति अपनी वफादारी निभा रहा है। क्या वर्तमान साहब के डिजिटल हस्ताक्षर की कीमत पोर्टल की नजर में शून्य है?
  • अनोखा ‘फ्री हिट’ सिस्टम : अगर कोई आवेदक गलत नाम से आवेदन लगा दे और जानकारी न मिले, तो अधिकारी कह सकते हैं- “साहब, वो तो पुराने वाले का नाम था।” और पुराने वाले कहेंगे- “हम तो कब के चले गए।” यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी, और जनता की शामत!
  • पासवर्ड भूल गए या आलस का पहाड़? : क्या पोर्टल का पासवर्ड कोई अपने साथ ट्रांसफर पर ले गया है, या फिर “अगले महीने देख लेंगे” वाली फाइलों के नीचे पोर्टल की सुध दबा दी गई है?

आखरी टिप्पणी : बहरहाल, घरघोड़ा का यह आरटीआई पोर्टल पारदर्शिता का नहीं, बल्कि ‘प्रशासनिक आलस’ का एक उत्कृष्ट स्मारक बन चुका है। अब देखना यह है कि इस व्यंग्य के बाद वर्तमान साहब का ‘डिजिटल राजतिलक’ पोर्टल पर होता है, या पोर्टल इसी तरह पुराने दौर की यादों में खोया रहता है। फिलहाल, आवेदक हाथ में आरटीआई की अर्जी लिए, आसमान में आँखें गड़ाए ढूंढ रहे हैं कि – “ओह साहब! आप कहाँ हैं?”

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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