सड़क पर ‘रवि’, सत्ता के गलियारों में ‘सन्नाटा’: राजपुर की बदहाली और सियासत का नग्न सच!…

रायगढ़। क्या जनहित के मुद्दे अब केवल पार्टी की सदस्यता के मोहताज हैं? क्या किसी का ‘अपनापन’ सिर्फ सत्ता की दहलीज़ तक ही सीमित है? राजपुर की जानलेवा सड़कों पर आज एक शख्स अकेले धरने पर बैठा है – नाम है रवि भगत। लेकिन, उनका यह संघर्ष केवल गड्डों से भरी सड़क के खिलाफ नहीं, बल्कि उस ‘राजनीतिक बेशर्मी’ के खिलाफ एक शंखनाद है, जिसने अपनों के चेहरों से नकाब उतार फेंके हैं।
कुंभकर्णी नींद में प्रशासन, जोखिम में जान – राजपुर की सड़क अब सड़क नहीं, एक ‘नासूर’ बन चुकी है। खस्ताहाल और गड्डों में तब्दील हो चुकी यह सड़क हर दिन हादसों को दावत दे रही है। प्रशासन की संवेदनहीनता का आलम यह है कि मौतों और चोटों के आंकड़े भी उनके कान पर जूं नहीं रेंगने दे रहे। बंद कमरों में दिए गए ज्ञापन और अर्जियां फाइलों की धूल फांक रही हैं, जिसके बाद मजबूर होकर रवि भगत को सड़क पर उतरना पड़ा।
सियासत का ‘दोहरा चरित्र’: कल तक ‘आंखों का तारा’, आज ‘अछूत’ – रवि भगत का यह धरना व्यवस्था के साथ-साथ उन ‘दलबदलू और अवसरवादी’ चेहरों को भी आईना दिखा रहा है, जो कभी उनके पीछे चलकर गर्व महसूस करते थे।
- जब बीजेपी में थे : तब रवि भगत की हर एक बात ‘कद्दावर’ और ‘जनहित की आवाज’ थी। पार्टी के छोटे-बड़े नेता उनके सुर में सुर मिलाते थे।
- आज जब साथ छोड़ा : वही ‘अपने’ अब रवि भगत को पहचान तक नहीं रहे। निष्ठा और दोस्ती का मुखौटा पहनकर घूमने वाले वे नेता, आज इस जनमुद्दे से ऐसे किनारा कर रहे हैं मानो राजपुर की सड़क उनके क्षेत्र का हिस्सा ही न हो।
‘अकेला रवि’ बनाम ‘भीड़तंत्र की अवसरवादिता’ – रवि भगत का यह एकाकी संघर्ष साबित करता है कि राजनीतिक दलों में ‘साथ’ केवल ‘सत्ता की मलाई’ तक सीमित है। जैसे ही किसी ने विचारधारा या उसूलों के लिए दल बदला, तो उनके द्वारा उठाया गया जनहित का मुद्दा भी ‘बेमानी’ हो गया। यह रवि भगत का अपमान नहीं, बल्कि उन अवसरवादी नेताओं के चरित्र पर लगा एक करारा तमाचा है।
क्या प्रशासन की नींद टूटेगी? – राजपुर की जनता देख रही है कि कौन उनके दुख में खड़ा है और कौन कुर्सी बचाने के लिए खामोश है। रवि भगत का यह अडिग संकल्प यह संदेश देता है कि जिसे जनता की फिक्र हो, उसे किसी झंडे या झूठी भीड़ की जरूरत नहीं होती।
सवाल अब यह नहीं है कि सड़क कब बनेगी? – सवाल यह है कि क्या प्रशासन और उन ‘अपनों’ की अंतरात्मा इतनी मर चुकी है कि उन्हें सड़क पर बैठा एक शख्स और आम जनता का दर्द दिखाई नहीं दे रहा?
यह चुप्पी राजपुर की जनता के लिए एक सबक है – अगली बार वोट की ताकत का इस्तेमाल करते समय यह याद रखना जरूरी होगा कि ‘अपनों’ का असली चेहरा क्या है।




