बिलासपुर

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: “इंसानी और बेजुबानों की जान इतनी सस्ती नहीं!” करंट से मौतों पर CSPDCL के MD और ऊर्जा सचिव को अल्टीमेटम…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के कोटा ब्लॉक के भाड़म गांव में करंट की चपेट में आने से हुई तीन दर्दनक मौतों पर बिलासपुर हाई कोर्ट ने स्वसंज्ञान  (Suo Motu) लिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) और प्रदेश के ऊर्जा विभाग के सचिव को कटघरे में खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने दोनों शीर्ष अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से शपथपत्र (Affidavit) दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है।

​मामले की अगली और निर्णायक सुनवाई 23 जुलाई को मुकर्रर की गई है।

कोर्ट के तीखे सवाल : “कागजी कार्रवाई नहीं, टाइम-बाउंड एक्शन प्लान चाहिए” – सुनवाई के दौरान कोर्ट का रुख बेहद सख्त रहा। डिवीजन बेंच ने साफ शब्दों में कहा कि फसलों, संपत्तियों या जानवरों को बचाने के नाम पर खेतों और फार्महाउसों में की जा रही ‘इलेक्ट्रिक फेंसिंग’ (बिजली के तारों की घेराबंदी) काल बन चुकी है। कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि CSPDCL के मैनेजिंग डायरेक्टर को आज ही इस जनहित याचिका (PIL) में मुख्य उत्तरदाता (Respondent) के रूप में शामिल किया जाए।

“इलेक्ट्रिक फेंसिंग के कारण बार-बार हो रहा इंसानी और वन्यजीवों की जान का नुकसान बेहद गंभीर और चिंताजनक है। सिर्फ क्रिमिनल केस दर्ज कर लेना काफी नहीं है, हमें इस जानलेवा लापरवाही को जड़ से खत्म करने के लिए एक सख्त और प्रभावी नीति (Policy) चाहिए।” – चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की बेंच

शपथपत्र में इन 4 बिंदुओं पर देना होगा जवाब – हाई कोर्ट ने बिजली विभाग और सरकार को घेरते हुए स्पष्ट किया है कि सौंपे जाने वाले शपथपत्र में केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस मैकेनिज्म का ब्योरा होना चाहिए:

  • इंस्पेक्शन और मेंटेनेंस फ्रेमवर्क : इलेक्ट्रिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के निरीक्षण और रखरखाव का मौजूदा सिस्टम क्या है?
  • सुरक्षा कवच (Safeguards) : ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए फिलहाल धरातल पर क्या सुरक्षा उपाय मौजूद हैं?
  • जवाबदेही तय करना : बिजली विभाग के लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ जिम्मेदारी तय करने का क्या मैकेनिज्म है?
  • SOP और पॉलिसी : क्या इस जानलेवा फेंसिंग को रोकने के लिए कोई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) है? अगर नहीं है, तो इसे लागू करने की पक्की टाइमलाइन क्या है?

बेजुबान भी हो रहे शिकार, कानून की ढिलाई पर चोट – हाई कोर्ट ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई कि बिजली के इन अवैध और जानलेवा तारों का शिकार सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि आए दिन घरेलू और जंगली जानवर भी हो रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि हालांकि कानून के तहत दोषियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाते हैं, लेकिन महकमे की ढिलाई के कारण ये घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। अब वक्त आ गया है जब पब्लिक सेफ्टी को सुनिश्चित करने के लिए एक ‘टाइम-बाउंड’ (समयबद्ध) नीति लागू की जाए।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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