“थूक-पॉलिश” से बन रही? नेशनल हाईवे सड़क 930

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
रायपुर/बालोद। करोड़ों रुपये की सार्वजनिक धनराशि से तैयार हो रही नेशनल हाईवे (एनएच) 930 की हालिया हालत ने जिले की प्रशासनिक और तकनीकी जिम्मेदारियों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह सड़क अब चंद दिनों में ही उखड़ने लगी, और इसके पीछे न सिर्फ घटिया निर्माण सामग्री व तकनीकी लापरवाही का हाथ दिख रहा है बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा रात के अंधेरे में की जा रही ‘लिपापोती’ भी सामने आई है। तस्वीरें और वीडियो साक्ष्य साफ बयां करते हैं कि गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, जबकि जब मुद्दों पर सवाल उठाए जाते हैं— तो इंजीनियरों का प्रतिवाद आश्चर्यजनक रूप से आक्रामक और बचकाना रहा।

नियमों की उड़ती धज्जियाँ, रात में थूक पॉलिश?
स्थापित नियमों के अनुसार किसी भी मुख्य मार्ग पर पैचवर्क या रिपेयरिंग कार्य पर्याप्त विजिबिलिटी और सुरक्षा संकेतों के साथ ही किए जाने चाहिए। हालांकि बालोद में नियमों को ताक पर रखकर रात के अंधेरे में स्ट्रीट लाइटें जला कर हड़बड़ी में रिपेयरिंग करवाई जा रही है। यह वही समय है जब हाईवे पर भारी वाहनों का आवागमन सबसे अधिक रहता है, जिससे सुरक्षा गंभीर रूप से दांव पर लग रही है। सवाल उठता है कि क्या दिन के उजाले में काम कराने पर भ्रष्टाचार की पोल खुलने का डर है— जिसका समाधान रात में ‘थूक-पॉलिश’ कर देना माना जा रहा है।

इंजीनियर की अपमानजनक प्रतिक्रिया
जब निर्माण की गुणवत्ता, डामरीकरण की मोटाई और मानक उल्लंघन के बारे में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के संबंधित इंजीनियर से जवाब मांगा गया तो उन्होंने अनुचित और अप्रत्यक्ष रूप से जवाब देते हुए कहा— “बहुत आए और गए भ्रष्टाचार उजागर करने वाले।” इससे स्पष्ट होता है कि अधिकारी अपने काम की तकनीकी कमियों के बजाय सवाल उठाने वालों पर ही बदनामी का ठीकरा फोड़ रहे हैं। वही इनका एक और हैरान कर देने वाला जवाब था— “क्या ब्लैकमेल करने आए हो? जो काम जैसा हो रहा है, उसे होने दो, कार्य में बाधा न डालो।” यह रवैया जवाबदेही की पूरी तरह नाकामी और जनता के प्रति तिरस्कार को दर्शाता है।

क्या ठेकेदार को दिया जा रहा अनुचित लाभ?
स्थानीय बातें यह भी गूंज रही हैं कि सड़क निर्माण के समय नेशनल हाईवे प्राधिकरण के तत्कालीन एसडीओ टीकम ठाकुर ने ठेकेदार को अनुचित लाभ दिए, जिसके कारण गुणवत्ताहीन कार्य किये गए। ऐसे संदिग्ध निर्णयों की उच्चस्तरीय और स्वतंत्र जांच अनिवार्य दिखती है ताकि पता चल सके किन कारणों से मानकों का पालन नहीं हुआ और किसने किसे सुविधाएँ दिलवाईं।

जिम्मेदारो का हास्यास्पद तर्क और तकनीकी जवाबदेही
जब इंजीनियर से पूछा गया कि सड़क इतनी जल्दी क्यों ख़राब हो रही है, तो उनका तर्क था कि “अन्य प्रदेशों व जिलों से आने वाले भारी वाहन ही सड़क को क्षतिग्रस्त कर रहे हैं।” यह बात न केवल गलत अपेक्षा है बल्कि केंद्रीय मानकों और एक्सल-लोड की डिजाइन आवश्यकताओं का सीधा अपमान है। नेशनल हाईवे निर्माण के समय ट्रैफिक व भारी वाहन भार का तकनीकी आकलन करके ही सड़क की परतों और बेस का निर्धारण किया जाना चाहिए। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस हाईवे का डिजाइन ही न तो सही तरीके से किया गया और न ही भविष्य के ट्रैफिक लोड का व्यवस्थित आकलन किया गया?

कलेक्टरों की घोर लापरवाही पर तीखा सवाल
यहाँ एक और चिंता का विषय है— जब यह सड़क निर्माण और बाद की स्थिति बनी, तब “बालोद जिले में समय-समय पर तैनात कलेक्टरों की अनदेखी और उदासीनता पर भी किनारे से सवाल उठते रहे हैं।” अगर जिलाधिकारी स्तर पर सतत निगरानी और तकनीकी ऑडिट का प्रावधान प्रभावी होता तो इतने बड़े दायरे में गुणवत्ता समझौता और रात में ढकोसला कर काम कराने की गुंजाइश कम रह जाती। वही वर्तमान कलेक्टर साहिबा भी इस घटिया सड़क पर चुप्पी साधे हुए है। ऐसे प्रशासकीय संलिप्तता के संकेत, जाँच के दायरे में जरूरी हैं।
स्थानीय नागरिकों और जनहितकर्ता संगठनों की मांग है कि दोषी इंजीनियरों और अधिकारियों को तुरंत निलंबन अथवा बर्खास्त किया जाए और ठेकेदार के भुगतानों पर पेमेंट वैलिडेशन रोक दी जाए। साथ ही तकनीकी ऑडिट के तहत सड़क के कोर-कटिंग कराई जाए ताकि डामर की मोटाई और बेस की वास्तविक गुणवत्ता सामने आ सके। यदि उचित कदम नहीं उठाए गए तो यह केवल राजस्व की हानि नहीं होगी, बल्कि भविष्य में गंभीर सड़क दुर्घटना का कारण बनकर जनजीवन को खतरे में डालेगी। बड़ी विचित्र बात तो यह है कि इस राष्ट्रीय राजमार्ग सड़क निर्माण की गुणवत्ताहीनता पर कांग्रेस और भाजपा के शीर्ष नेताओं की चुप्पी भी समझ से परे है। सत्ता पक्ष की चुप्पी समझ में आती है लेकिन विपक्ष की चुप्पी किसी को हजम नहीं हो रही। वही गुप्त सूत्र बताते है कि शायद ठेकेदार के दोनों पार्टियों के नेताओं से सुमधुर संबंध है?
यह मामला सिर्फ एक सड़क का धंसना, दरकना, चटकना, उखड़ना, टूटना नहीं— यह सार्वजनिक धन की बर्बादी, जवाबदेही की कमी और जिम्मेदार अफसरों की परिचालनिक विफलता का प्रतीक है।
समय रहते निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, ताकि दोषियों को दण्डित कर योजनाओं की विश्वसनीयता बचायी जा सके।




