आदेशों की ‘कागजी नाव’ और रसूखदारों का ‘सुरक्षित टापू’ : मुख्यमंत्री के गृह जिले जशपुर में क्या फिर ठेंगा दिखाएगा ‘संलग्नीकरण माफिया’?…

- विशेष खोजी रिपोर्ट: संलग्नीकरण का अंतहीन खेल…
जशपुर । छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक नया मुहावरा तेजी से लोकप्रिय हो रहा है – “आदेश-आदेश खेलो, पर मलाईदार कुर्सी मत छोड़ो।” लोक शिक्षण संचालनालय (DPI), छत्तीसगढ़ ने आगामी शैक्षणिक सत्र की शुचिता, व्यवस्था और सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए एक बार फिर ‘संलग्नीकरण’ (Attachment) रूपी असाध्य बीमारी पर सर्जिकल स्ट्राइक करने का दावा किया है।
नया रायपुर के इन्द्रावती भवन से जारी पत्र क्रमांक 445 के जरिए राज्य के सभी संभागीय संयुक्त संचालकों और जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) को कड़ा अल्टीमेटम दिया गया है कि वे अपने मलाईदार दफ्तरों में सालों से जमे प्रभावशाली शिक्षकों और कर्मचारियों को “तत्काल” उनकी मूल पदस्थापना वाली संस्थाओं के लिए कार्यमुक्त करें।

लेकिन, जमीनी हकीकत को जानने वाले लोग इस आदेश को देखकर मुस्कुरा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या यह आदेश भी पिछले दर्जनों आदेशों की तरह सिर्फ रद्दी की टोकरी की शोभा बढ़ाएगा? सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न तो माननीय मुख्यमंत्री के गृह जिले जशपुर को लेकर खड़ा हो रहा है। जशपुर, जो वर्तमान में राज्य की राजनीति और प्रशासन का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु है, क्या वहां इस बार इस शासकीय हठधर्मिता का अंत होगा या फिर ‘रसूख की लाठी’ के आगे नियम-कायदों की भैंस एक बार फिर पानी में बैठ जाएगी?
समीक्षा बैठक का ‘खौफ’ या सिर्फ एक और औपचारिक रस्म? – गौरतलब है कि 23 जून 2026 को माननीय स्कूल शिक्षा मंत्री महोदय की अध्यक्षता में एक हाई-प्रोफाइल समीक्षा बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में राज्य की चरमराती शिक्षा व्यवस्था, सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों का टोटा और शहरी दफ्तरों में बाबुओं की तरह काम कर रहे शिक्षकों के मुद्दे पर गहन चर्चा हुई। बैठक में बड़ी-बड़ी बातें हुईं, कड़े तेवर दिखाए गए और मंत्रियों व आला अधिकारियों ने नाराजगी जाहिर की।
इसी बैठक के ‘दबाव’ में आनन-फानन में 25 जून 2026 को संचालनालय ने यह कड़ा पत्र जारी कर दिया। आदेश की भाषा इतनी सख्त है कि पहली नज़र में कोई भी सामान्य नागरिक सोच बैठेगा कि प्रशासन का दिल सचमुच गरीब बच्चों के भविष्य के लिए पसीज गया है। आदेश में साफ तौर पर लिखा है कि :
”विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) और विकासखंड स्रोत समन्वयक (BRC) कार्यालयों में संलग्न कर्मचारियों/शिक्षकों को तत्काल उनकी मूल पदस्थापना संस्था हेतु कार्यमुक्त किया जाए और इसकी जानकारी निर्धारित प्रपत्र में संचालनालय को भेजी जाए।”
लेकिन इतिहास गवाह है कि शिक्षा विभाग में ऐसे “कड़े निर्देश” हर शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में आते हैं, कुछ दिन फाइलें इधर से उधर होती हैं, और फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
जशपुर का विशेष ‘अटैचमेंट’ : मुख्यमंत्री का क्षेत्र और अनोखा रसूख – कहावत है कि ‘दीये तले अंधेरा’ होता है, पर जब दीया खुद मुख्यमंत्री का गृह जिला हो, तो वहां का अंधेरा थोड़ा ज़्यादा ही चमकदार और रसूखदार हो जाता है। जशपुर जिले में संलग्नीकरण का जाल इतना गहरा और उलझा हुआ है कि इसे भेद पाना किसी भी स्थानीय अधिकारी के बस की बात नहीं दिखती।
जब-जब रायपुर के वातानुकूलित कमरों से कोई कड़ा आदेश जशपुर पहुंचता है, तब-तब स्थानीय स्तर पर “फाइलें दबाने और टालमटोल करने” की कला का अद्भुत प्रदर्शन शुरू हो जाता है। सूत्रों की मानें तो जशपुर के विभिन्न कार्यालयों (जैसे DEO, BEO, BRC दफ्तरों) में अटैच हर दूसरे शिक्षक या कर्मचारी के पीछे किसी न किसी ‘माननीय’, ‘संगठन के बड़े नेता’ या ‘मंत्रालय के रसूखदार अफसर’ का वरदहस्त है।
स्थानीय अधिकारी बखूबी जानते हैं कि यदि उन्होंने किसी ‘खास’ शिक्षक को कार्यमुक्त करने का दुस्साहस किया या उसकी कुर्सी हिलाने की कोशिश की, तो उनका खुद का ट्रांसफर किसी ऐसे सुदूर कोने में कर दिया जाएगा जहां मोबाइल का नेटवर्क भी नहीं पकड़ता। यही वजह है कि मंत्री जी और संचालक महोदय के कड़े निर्देशों के बाद भी निचले स्तर पर बैठे अधिकारियों के हाथ कलम चलाने से थरथरा रहे हैं। वे ‘साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ वाली नीति पर अमल करते हुए समय काटने का बहाना ढूंढ रहे हैं।
व्यंग्य बाण : दफ्तर बाबू बने गुरुजी और गायब होती ‘रीढ़ की हड्डी’ –
जो गुरुजी ब्लैकबोर्ड पर चाक चलाने, बच्चों का भविष्य संवारने और उन्हें ‘क ख ग’ सिखाने के लिए सरकारी खजाने से वेतन पाते हैं, वे सालों से बड़े साहब के दफ्तर में फाइलें सरकाने, नोटशीट तैयार करने और साहब के आने पर चाय का आर्डर देने में विशेषज्ञता हासिल कर चुके हैं। अब भला, ऐसे ‘प्रशासनिक विशेषज्ञों’ को वापस सुदूर गांवों के जंगलों और पहाड़ों के बीच स्थित स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने भेजना क्रूरता नहीं तो और क्या है? आखिरकार, दफ्तर की ठंडी हवा, बाबूगिरी का रौब और साहब की जी-हुज़ूरी का जो नशा है, वह स्कूल के शोर-शराबे और मध्यान्ह भोजन की निगरानी करने में कहां!
अधिकारियों की स्थिति भी दयनीय है। वे जनता के सामने तो ‘सिंघम’ बनते हैं, लेकिन जैसे ही किसी रसूखदार अटैच शिक्षक का फोन आता है, उनकी ‘प्रशासनिक रीढ़ की हड्डी’ अचानक गायब हो जाती है।
संचालनालय ने मांगा ब्यौरा, पर भरेगा कौन? – इस बार लोक शिक्षण संचालनालय ने थोड़ी चालाकी दिखाई है। उन्होंने सिर्फ आदेश देकर पल्ला नहीं झाड़ा, बल्कि नीचे दिए गए कड़े प्रारूप (Format) में तत्काल जानकारी मांग ली है ताकि यह पता चल सके कि कितने लोगों को सचमुच कार्यमुक्त किया गया।
इस खाली टेबल को देखकर ही कइयों के पसीने छूट रहे हैं। इस टेबल में सच लिखना यानी अपने ही आकाओं के चहेतों पर गाज गिराना और खुद के लिए मुसीबत मोल लेना है। अब देखना यह है कि क्या इस बार जशपुर के जिला शिक्षा अधिकारी और संभागीय संयुक्त संचालक अपनी शासकीय निष्ठा दिखाते हुए इस टेबल को ईमानदारी से भरते हैं, या फिर हर बार की तरह इस बार भी कागजों पर ‘सब ठीक है’ की रिपोर्ट भेजकर इतिश्री कर ली जाएगी।
अंतिम टिप्पणी : कलम की थरथराहट बनाम बच्चों का भविष्य – जब तक व्यवस्था में बैठे हुक्मरानों को यह समझ नहीं आएगा कि शिक्षकों का स्थान दफ्तरों की बाबूगीरी में नहीं, बल्कि देश के भविष्य को गढ़ने वाले क्लासरूम में है, तब तक ऐसे सैकड़ों आदेश आते रहेंगे और हवा में विलीन होते रहेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब बच्चे आज भी शिक्षकों की राह देख रहे हैं, जबकि उनके हिस्से के शिक्षक शहरों के दफ्तरों में कुर्सियां तोड़ रहे हैं।
मुख्यमंत्री के ‘सुशासन’ के इस दौर में, क्या जशपुर जिला प्रशासन इस दाग को धो पाएगा? क्या इस बार वाकई आदेश का पालन होगा या ‘ऊपर वाले’ के आशीर्वाद से संलग्नीकरण का यह अमर खेल यूं ही अनवरत जारी रहेगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल अधिकारी वर्ग फाइलों के पीछे छिपकर इस तूफान के गुजर जाने का इंतजार कर रहा है।




