जशपुर में फूटा आदिवासियों का आक्रोश : चिलचिलाती धूप में सड़कों पर उतरा जनसैलाब, ‘डिलिस्टिंग’ को बताया अधिकारों को छीनने की बड़ी साजिश…

जशपुरनगर। देश भर में चल रही ‘डिलिस्टिंग’ (जनजातीय सूची से बाहर करने की मांग) की बहस के बीच रविवार को जशपुरनगर में आदिवासियों का भारी आक्रोश देखने को मिला। राजी पड़हा और ईसाई आदिवासी महासभा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस विशाल विरोध प्रदर्शन में हजारों की संख्या में आदिवासी सड़क पर उतर आए। चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी भी उनके हौसले को नहीं डिगा सकी। हाथों में छतरी और जुबान पर इंकलाबी नारे लिए, इस जनसैलाब ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे।
रैली का मार्ग और शक्ति प्रदर्शन – प्रदर्शन का शंखनाद शहर के रांची रोड स्थित शासकीय एनईएस कॉलेज के मैदान से हुआ, जहां सुबह से ही जिले भर के सैकड़ों आदिवासी जुटना शुरू हो गए थे। यह विशाल रैली:
- एनईएस कॉलेज मैदान से शुरू होकर जैन मंदिर होते हुए गुजरी।
- इसके बाद जनसैलाब बस स्टैंड, महाराजा चौक और जय स्तंभ चौक से होकर आगे बढ़ा।
- भागलपुर चौक होते हुए अंततः यह रैली बीटीआई ग्राउंड में एक विशाल जनसभा में तब्दील हो गई।
पूरे रास्ते डिलिस्टिंग विरोधी नारों से जशपुरनगर गूंजता रहा, जिसने स्थानीय प्रशासन और सत्ता के गलियारों तक अपनी तपिश पहुंचा दी है।
“आदिवासियों को बांटने का रचा जा रहा है षड्यंत्र” – इस जनसभा के प्रमुख वक्ता और कुनकुरी के पूर्व विधायक व कांग्रेस जिलाध्यक्ष यूडी मिंज ने डिलिस्टिंग की मांग को आदिवासियों के खिलाफ एक गहरी साजिश करार दिया।
यूडी मिंज के प्रहार के मुख्य बिंदु :
- दिल्ली की सभा पर निशाना : उन्होंने हाल ही में दिल्ली में जनजातीय सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित डिलिस्टिंग की मांग वाली सभा को सीधे तौर पर ‘आदिवासियों को बांटने की साजिश’ बताया।
- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार : मिंज ने कड़े शब्दों में कहा कि भारतीय संविधान और कानून हर आदिवासी को अपनी स्वेच्छा से किसी भी धर्म को अपनाने और उसका पालन करने की पूरी आजादी देता है।
- पांचवीं अनुसूची पर खतरा : उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जशपुर जिले में 24 प्रतिशत आबादी ईसाई आदिवासियों की है। अगर डिलिस्टिंग के काले कानून को लागू किया जाता है, तो इस क्षेत्र में ‘पांचवीं अनुसूची’ (Fifth Schedule) निष्प्रभावी हो जाएगी। इसका सीधा और विनाशकारी नुकसान यहां के मूल आदिवासियों को उठाना पड़ेगा, जिससे उनके जल, जंगल और जमीन के अधिकार छिन जाएंगे।
अस्तित्व की लड़ाई : पीछे नहीं हटेगा आदिवासी समाज – मंच से आदिवासी नेताओं ने एक सुर में डिलिस्टिंग के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया।
- राजेश भगत (जिलाध्यक्ष, राजी पड़हा समिति) : उन्होंने स्पष्ट किया कि राजी पड़हा समिति शुरू से ही डिलिस्टिंग जैसी विभाजनकारी मांग का पुरजोर विरोध करती आ रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस दिशा में कोई भी कदम उठाया गया, तो यह विरोध भविष्य में और भी उग्र होगा।
- अनिल किस्पोट्टा (प्रदेश अध्यक्ष, ईसाई आदिवासी महासभा) : किस्पोट्टा ने धार्मिक आजादी की वकालत करते हुए कहा कि किसी भी आदिवासी पर उसकी आस्था को लेकर दबाव नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने डिलिस्टिंग को सीधे तौर पर आदिवासियों के सबसे बड़े रक्षा कवच ‘पांचवीं अनुसूची’ को समाप्त करने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश बताया।
सरना धर्म कोड की उठी गूंज – विरोध प्रदर्शन केवल डिलिस्टिंग के खिलाफ ही नहीं था, बल्कि मंच से समाज के लिए एक सकारात्मक और बड़ी मांग भी रखी गई। सभी वक्ताओं ने एकमत होकर छत्तीसगढ़ राज्य में ‘सरना धर्म कोड’ (Sarna Dharma Code) को जल्द से जल्द लागू करने की पुरजोर वकालत की, ताकि आदिवासियों की मूल पहचान और उनकी प्राचीन परंपराओं को एक अलग और स्पष्ट संवैधानिक मान्यता मिल सके।
जशपुरनगर की इस महारैली ने यह साबित कर दिया है कि डिलिस्टिंग का मुद्दा अब एक बड़े आदिवासी आंदोलन का रूप ले चुका है। जिस तरह से हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे हैं, उससे यह साफ है कि आने वाले समय में यह मुद्दा राज्य और केंद्र सरकार दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाला है।




