ब्रेकिंग न्यूज़ : कोतबा में ‘सफेद खाद’ का ‘काला खेल’! अन्नदाता बेहाल, मुनाफाखोर मालामाल और कुंभकर्णी नींद में सोया कृषि विभाग का पूरा अमला!…

जशपुर। इसे व्यापार कहें या खुलेआम डकैती? कोतबा में इन दिनों खेती के सीजन के नाम पर किसानों की जेब और उनकी फसलों के साथ एक ऐसा ‘विनाशकारी’ लाइव शो चल रहा है, जिसे देखकर अच्छे-अच्छे ठगों को भी ट्यूशन लेने की जरूरत पड़ जाए। यहाँ ‘अन्नदाता’ की मजबूरी का ऐसा फायदा उठाया जा रहा है कि दो नंबर (अवैध, अमानक और मिलावटी) की खाद को असली के भाव, बल्कि उससे भी ज्यादा ‘प्रीमियम ब्लैक रेट’ पर थमाया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो मुनाफाखोरी की इस बड़ी दुकान से हर दिन अवैध खाद का ऐसा सैलाब निकल रहा है, मानो ब्लैक मार्केट को प्रशासन से ‘स्पेशल वीआईपी पास’ मिला हुआ हो।
साहब का ‘नॉइज़ कैंसिलेशन’ मोड : किसानों की चीखें गायब, ‘गुलाबी नोटों’ का शोर चालू! -इस महा-खेल में सबसे दिलचस्प किरदार हमारे कृषि विभाग के ‘खाद अधिकारी’ साहब का है। क्षेत्र में अमानक खाद का तांडव चल रहा है और साहब दफ्तर के एसी केबिन में इस तरह ध्यानमग्न बैठे हैं, जैसे किसी हिमालय की गुफा में ‘परम मौन साधना’ पर लीन हों।
जनता के बीच चर्चा है कि साहब को किसानों का रोना और उनकी फटी जेबें इसलिए दिखाई-सुनाई नहीं देतीं, क्योंकि उनकी आंखों और कानों पर ‘गांधी छाप’ गुलाबी कागजों का ऐसा मोटा चश्मा चढ़ा हुआ है कि बाहर का सारा प्रदूषण (यानी किसानों का दर्द) खुद-ब-खुद ‘फ़िल्टर’ हो जाता है। जब जेब का वजन बढ़ता है, तो कानून की लाठी अपने आप मोम की बन जाती है!
सालाना जलसा : किसान बेचारा ‘सोना’ उगाने के चक्कर में हो रहा ‘बोना’ – यह कोई रातों-रात खड़ा हुआ साम्राज्य नहीं है। हर साल जब बादल घिरते हैं और किसान अपनी रीढ़ झुकाकर खेतों में पसीना बहाने उतरता है, तब-तब कोतबा के इस काले कारोबार का शिलान्यास फिर से चमचमाने लगता है। इस अवैध धंधे की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इन्हें किसी साधारण पानी की नहीं, बल्कि सालों से ‘प्रशासनिक मेहरबानी’ और ‘साहब के अघोषित आशीर्वाद’ की खाद-पानी देकर सींचा गया है। भारी मात्रा में अवैध खाद डंप करना और सीजन आते ही किसानों को दोनों हाथों से लूटना, इस दुकान का कोई जुर्म नहीं, बल्कि ‘सालाना फेस्टिवल’ बन चुका है।
खेतों से उठती एक बेबस आवाज : “साहब! शिकायत लेकर दफ्तरों के चक्कर काटो, तो बाबू ऐसे घूरता है मानो हम उसकी पुश्तैनी जायदाद मांगने आ गए हों। कोई सुनने वाला नहीं है, क्योंकि यहाँ न्याय के तराजू पर किसान का पसीना नहीं, बिचौलिये का नोट भारी है।”
मजबूरी का नाम… ‘अमानक’ खाद! – अब कुछ ज्ञानी लोग ज्ञान बांटेंगे कि जब खाद नकली है, तो किसान खरीदता ही क्यों है? हुजूर! यह सवाल पूछने से पहले जरा जून-जुलाई की चिलचिलाती धूप में फटी बिवाइयों वाले पैरों से पूछिए। फसल बोनी है, वक्त भागा जा रहा है, मानसून सिर पर तांडव कर रहा है। ऐसे में किसान के पास न तो नखरे करने का समय है और न ही कोई दूसरा विकल्प। जो मिल रहा है, जैसा मिल रहा है, उसी जहर को अमृत समझकर खेतों में डालने को वह लाचार है। दुकानदार को पता है कि चिड़िया जाल में फंसी है, इसलिए वह सीना तानकर, कॉलर खड़ी करके दो नंबर का माल बेच रहा है और उसकी तिजोरी कुबेर के खजाने को मात दे रही है।
सिस्टम की छाती पर मूंग दलते 3 तीखे और सीधे सवाल :
- सवाल नंबर 1 : खाद अधिकारी साहब! आपका यह वीआईपी ‘मौन व्रत’ किस शुभ मुहूर्त में टूटेगा? क्या इसके लिए किसी खास उद्घाटन समारोह का इंतजार है या किसानों के सब्र का बांध पूरी तरह टूटने के बाद ही आप अपनी आंखें खोलेंगे?
- सवाल नंबर 2 : पसीना बहाने वाले के पेट पर लात मारकर, एक मुनाफाखोर की तिजोरी को रॉकेट की रफ्तार से भरने का यह ‘अघोषित और अवैध लाइसेंस’ आपको किस सरकारी नियमावली के तहत मिला है?
- सवाल नंबर 3 : खाद में हेरा-फेरी और कालाबाजारी का यह खुला नंगा नाच आखिर कब तक चलेगा? क्या प्रशासन तभी जागेगा जब कोतबा का कोई बेबस किसान कर्ज के दलदल में डूबकर कोई आत्मघाती कदम उठा लेगा?
कमाल की है यह ‘जुगलबंदी’! – कुल मिलाकर कहानी ये है कि कोतबा का किसान बेबस है, मुनाफाखोर बेखौफ है, और हमारे जिम्मेदार अधिकारी ‘परम मौन’ के साथ चादर तानकर सो रहे हैं। यह त्रिकोण इतना लाजवाब है कि इस पर कोई फिल्म बन जाए तो सुपरहिट हो जाए।
अब देखना यह है कि इस जोरदार धमाके के बाद भी हमारे कुंभकर्णी साहब अपनी ‘सुविधाजनक’ नींद से जागकर इस दुकान पर अपनी कानूनी लाठी चलाते हैं, या फिर ‘गांधी जी के तीन बंदरों’ की तरह आंख, कान और मुंह बंद रखकर अगले सीजन के ‘कलेक्शन’ की एडवांस प्लानिंग में मसरूफ हो जाते हैं। जनता सब देख रही है, साहब!
भाग 2 में खुलेंगे सारे राज… बने रहें RM24 के साथ…




