रायगढ़ की जीवनदायिनी ‘केलो नदी’ में घोला जा रहा औद्योगिक ज़हर, NGT के नियमों की सरेआम फूंकी जा रही चिता!…

रायगढ़। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) नदियों और जलस्रोतों की पवित्रता बचाने के लिए इंसानी चिता की राख तक विसर्जित करने पर कड़ा ऐतराज जताता है। लेकिन रायगढ़ के औद्योगिक इलाकों में इसी NGT के कायदे-कानूनों की चिता रोज सरेआम जलाई जा रही है। मुनाफे की हवस में अंधे हो चुके उद्योगपति और राख माफिया हर साल हज़ारों टन ‘फ्लाई ऐश’ (औद्योगिक राख) को शातिराना तरीके से नदी-नालों में बहा रहे हैं, और इसी जानलेवा, धीमे ज़हर को पीने के लिए रायगढ़ की जनता मजबूर है।
प्रशासनिक संरक्षण और औद्योगिक स्वार्थ का एक ऐसा ही खौफनाक ‘आंखों देखा सबूत’ बरपाली ग्राम के प्राकृतिक ‘बरदे नाले’ से सामने आया है, जहाँ आस्था का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का ‘त्रिवेणी संगम’ बह रहा है।

बरदे नाले का ‘लाइव मर्डर’ : राख के समंदर में तब्दील प्राकृतिक धार – बरपाली ग्राम से सामने आए एक हालिया वीडियो ने राख माफिया के इस काले खेल को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि प्राकृतिक बरदे नाले के दोनों किनारों को फ्लाई ऐश से बेरहमी से पाट दिया गया है। बरसात के पानी की तेज़ धार के साथ यह औद्योगिक राख घुलकर सीधे रायगढ़ की जीवनदायिनी ‘केलो नदी’ में मिल रही है। यह महज़ प्रदूषण नहीं, बल्कि रायगढ़ की समूची आबादी के स्वास्थ्य के साथ किया जा रहा एक क्रूर और खुला अपराध है।
राख माफिया का नेक्सस: ‘रूपानाधाम’ और ‘नवदुर्गा’ प्लांट के साथ ट्रांसपोर्टर का गठजोड़! – जलस्रोतों को खुलेआम तबाह करने का यह दुस्साहस बिना राजनीतिक और प्रशासनिक शह के मुमकिन नहीं है। स्थानीय ग्रामीणों ने सीधा और गंभीर आरोप लगाया है कि नाले में डंप किया गया यह ज़हरीला फ्लाई ऐश ‘रूपानाधाम’ और ‘नवदुर्गा’ प्लांट का है।
सूत्रों के मुताबिक : इस राख को बेखौफ होकर प्राकृतिक नालों में पाटने का ठेका कुख्यात ट्रांसपोर्टर रोहतास नेहरा की फर्म के पास है, जिसने करीब 2 महीने पहले ही इस ज़हर को यहाँ डंप किया था।
अधिकारियों की ‘लीपापोती’ को कुदरत ने किया बेनकाब – इस पूरे मामले में पर्यावरण संरक्षण मंडल और वन विभाग की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। करीब 8 महीने पहले जब इस नाले में अवैध डंपिंग की शिकायत हुई थी, तब अधिकारियों ने मौके पर आकर ठोस कार्रवाई करने के बजाय एक अजीबोगरीब ‘खेल’ खेला। रायगढ़ इस्पात और रूपाणा धाम प्लांट पर मामूली जुर्माना लगाकर केस क्लोज कर दिया गया और नाले की राख पर मिट्टी का छिड़काव कर मामले को फाइलों में दफन कर दिया गया।
लेकिन कहते हैं न कि “कुदरत को धोखा नहीं दिया जा सकता।” इस बार की मानसूनी बारिश ने अधिकारियों के भ्रष्टाचार पर पानी फेर दिया। मिट्टी बह गई और राख का वह ज़हरीला पहाड़ फिर से बेनकाब होकर केलो नदी की तरफ दौड़ने लगा।
राख की जद में पूरा रायगढ़: हवा से लेकर पानी तक सब काला! – यह त्रासदी सिर्फ एक बरदे नाले तक सीमित नहीं है। गेरवानी, सरायपाली और घरघोड़ा रोड पर दर्जनों फैक्ट्रियां मौत का सामान तैयार कर रही हैं। इन उद्योगों से निकलने वाले फ्लाई ऐश का परिवहन इस क्षेत्र का सबसे बड़ा और सबसे काला मुनाफे वाला व्यापार बन चुका है।
- खौफनाक जमीनी हकीकत : ग्रामीणों के घरों के आंगन, सूखते कपड़े, फसलें और पीने के तालाब… सब कुछ राख की मोटी परत से ढके हुए हैं।
- दिखावे की कार्रवाई : विभाग तभी जागता है जब मीडिया में हाहाकार मचता है, वरना आम जनता की चीखें फैक्ट्रियों के शोर में दबा दी जाती हैं।
बड़ा सवाल: क्या ‘नजराने’ के आगे नतमस्तक रहेगा पर्यावरण विभाग? – पुख्ता सबूत सामने आने के बाद अब गेंद रायगढ़ जिला प्रशासन और पर्यावरण संरक्षण मंडल के पाले में है। विभाग को पूरी जानकारी और सबूत सौंप दिए गए हैं।
अब जनता यह देखना चाहती है:
- क्या इस बार इन रसूखदार प्लांट प्रबंधकों और दोषी ट्रांसपोर्टर को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा?
- क्या एनजीटी के नियमों का मखौल उड़ाने वालों पर करोड़ों का जुर्माना लगेगा?
- या फिर से साहब लोग ‘नजराने’ की गर्मी में शांत होकर, नाले पर मिट्टी डलवाकर इस खूनी खेल पर पर्दा डाल देंगे?
रायगढ़ की जनता अब जवाब मांग रही है!




