छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग में मची खलबली : अपर संचालक संजीव तिवारी के खिलाफ PM और CBI तक पहुंची शिकायत, EOW-CBI जांच की मांग…

रायपुर (1 जून 2026): छत्तीसगढ़ के जनसंपर्क विभाग में एक बार फिर भ्रष्टाचार और भारी अनियमितताओं के आरोपों से भूचाल आ गया है। इस बार सीधे विभाग के शीर्ष अधिकारियों में शुमार अपर संचालक संजीव तिवारी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया है। प्रेस एंड मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन (PMWA), छत्तीसगढ़ ने तिवारी के खिलाफ विज्ञापनों की बंदरबांट, वित्तीय गड़बड़ियों और अकूत संपत्ति जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और CBI निदेशक सहित कई संवैधानिक संस्थाओं को एक विस्तृत और सबूतों से लैस ज्ञापन सौंपा है।
संगठन के प्रदेश प्रधान महासचिव राहुल कुमार मिश्रा के नेतृत्व में सौंपे गए इस ज्ञापन ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। संगठन ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यदि इस मामले में निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो वे चुप नहीं बैठेंगे।
ये हैं वो 5 बड़े आरोप, जिन पर उठी जांच की मांग – एसोसिएशन का दावा है कि पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों के बाद यह कदम उठाया गया है। ज्ञापन में 5 प्रमुख बिंदुओं पर SIT, EOW या CBI से हाई-लेवल जांच की मांग की गई है:
- विज्ञापनों की बंदरबांट : शासकीय विज्ञापनों के वितरण में भारी मनमानी, पारदर्शिता की कमी और चहेते मीडिया संस्थानों को उपकृत करने के गंभीर आरोपों की जांच।
- वित्तीय और निविदा (टेंडर) घोटाले का शक : विभाग में पास किए गए टेंडरों, वित्तीय फैसलों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के परीक्षण की मांग।
- अकूत संपत्ति का ब्यौरा : संजीव तिवारी और उनके परिवार के नाम पर दर्ज चल-अचल संपत्तियों, आय के स्रोतों और सरकारी दस्तावेजों में दी गई जानकारी के भौतिक सत्यापन की मांग।
- 20 साल का ‘रसूख’ : पिछले दो दशकों से रायपुर और जनसंपर्क विभाग के सबसे मलाईदार और महत्वपूर्ण पदों पर उनकी नियुक्ति, पदस्थापना और ट्रांसफर प्रक्रिया की वैधानिक जांच।
- पद से हटाने की मांग : संगठन ने स्पष्ट किया है कि जांच को प्रभावित होने से बचाने के लिए संजीव तिवारी को तत्काल उनके वर्तमान पद से हटाया जाए या किसी अन्य स्थान पर ट्रांसफर किया जाए।
अभय शाह प्रकरण : क्या है पर्दे के पीछे का सच? – ज्ञापन में सिर्फ विभाग की कार्यप्रणाली ही नहीं, बल्कि ‘बुलंद छत्तीसगढ़’ समाचार पत्र से जुड़े अभय शाह द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत परिवाद (कोर्ट कंप्लेंट) का भी प्रमुखता से जिक्र किया गया है। संगठन ने इस मामले में चल रही न्यायिक प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता बरतने और संबंधित पक्षकारों की सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित करने की मांग की है।
संगठन की चेतावनी : “प्रशासन को ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें किसी भी प्रकार के दबाव, प्रताड़ना या रसूखदार हस्तक्षेप की गुंजाइश न रहे।”
15 दिन का अल्टीमेटम : नहीं तो होगा कोर्ट का रुख – प्रेस एंड मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन ने सरकार और प्रशासन को 15 दिनों का सीधा अल्टीमेटम दिया है। संगठन का स्पष्ट कहना है कि यदि 15 दिन के भीतर इस ज्ञापन पर कोई ठोस कार्रवाई कर रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाती है, तो वे सीधे न्यायिक मंचों (कोर्ट) और वैधानिक रास्तों का रुख करेंगे।
कौन-कौन रहा मौजूद? – इस आर-पार की लड़ाई का शंखनाद करते समय संगठन के तमाम बड़े चेहरे मौजूद थे। इनमें प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्र गुप्ता, कार्यकारी अध्यक्ष सोनू रेलवानी, महासचिव सचिन, सहसचिव के साथ-साथ रंजना सिंह, संगीता बर्मन, जानकी मरकाम, मयंक श्रीवास्तव, प्रवीण शर्मा, लोकेश हिरवानी, आनंद गुप्ता, परितोष शर्मा और संतोष यादव सहित बड़ी संख्या में पदाधिकारी शामिल रहे।
संगठन का दो-टूक स्टैंड : एसोसिएशन ने स्पष्ट किया है कि उनकी यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ कोई निजी रंजिश नहीं है। यह कदम पत्रकार हित, प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन की बहाली के लिए उठाया गया है, और भविष्य में भी वे ऐसे मुद्दों को पूरी ताकत से उठाते रहेंगे।
अब देखना यह है कि राज्य सरकार और जांच एजेंसियां इस धारदार शिकायत पर क्या कदम उठाती हैं, या फिर रसूख के आगे एक बार फिर जांच की फाइलें धूल फांकती रह जाएंगी।




