छत्तीसगढ़ में ‘डिजिटल कुरुक्षेत्र’ : भूपेश बघेल का बड़ा धमाका, ‘छत्तीसगढ़ संवाद’ को बताया भाजपा का ‘AI वार रूम’…

रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजनीति में अब तक की सबसे बड़ी ‘डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक’ करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने विष्णुदेव साय सरकार की जड़ें हिला दी हैं। बघेल ने नवा रायपुर स्थित सरकारी विज्ञापन संस्था ‘छत्तीसगढ़ संवाद’ पर जो आरोप लगाए हैं, उन्होंने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि सरकारी निष्पक्षता के दावों की भी धज्जियां उड़ा दी हैं।
बघेल का दावा है कि जिस दफ्तर से सरकारी योजनाओं का प्रचार होना चाहिए, वहां अब गुजरात की एजेंसियां बैठकर कांग्रेस नेताओं के खिलाफ AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के जरिए ‘चरित्र हनन’ का खेल खेल रही हैं।
सरकारी संस्थान का ‘भगवाकरण’?: “बोर्ड बदल दो” – भूपेश बघेल ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा को सरकारी तंत्र द्वारा लांघे जाने का आरोप लगाया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि नवा रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ संवाद के भव्य भवन को अब ‘भाजपा कार्यालय’ घोषित कर देना चाहिए।
बघेल का इशारा साफ है: जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली संस्था अब एक राजनीतिक दल की सोशल मीडिया विंग बन चुकी है। उन्होंने अधिकारियों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वे खाकी पैंट पहनें और कमल का बिल्ला लगा लें, ताकि जनता को भ्रम न रहे।
गुजरात कनेक्शन और ‘डीपफेक’ की साजिश – खबर की सबसे गंभीर कड़ी ‘गुजरात कनेक्शन’ है। बघेल ने सीधा आरोप लगाया है कि:
- विपक्षी नेताओं को निशाना : गुजरात से आई पेशेवर एजेंसियां सरकारी दफ्तर के संसाधनों का उपयोग कर कांग्रेस नेताओं के फर्जी AI वीडियो (Deepfakes) बना रही हैं।
- प्रोपेगेंडा मशीन : भाजपा के विभिन्न ‘ट्रॉल आर्मी’ और सोशल मीडिया हैंडल्स का संचालन इसी सरकारी बिल्डिंग से किया जा रहा है।
- तकनीकी दुरुपयोग : आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल जनहित के बजाय राजनीतिक विरोधियों को कुचलने के लिए किया जा रहा है।
“दीवारों के कान हैं” : अंदरूनी बैठकों का पर्दाफाश – भूपेश बघेल ने अपनी पोस्ट में इस बात का भी संकेत दिया कि प्रशासन के भीतर अभी भी उनके ‘मुखबिर’ सक्रिय हैं। उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि बंद कमरों की बैठकों में यह कहना कि “यह बात बाहर नहीं जानी चाहिए” बेकार है, क्योंकि दीवारों के भी कान होते हैं। यह बयान सत्ता के गलियारों में बैठे उन अफसरों के लिए सीधी चुनौती है जो वर्तमान सरकार के ‘पॉलिटिकल टूल’ बने हुए हैं।
बघेल की चेतावनी: “हिसाब आज नहीं तो कल होगा” – पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने चिर-परिचित अंदाज में सरकार को घेरा और एक भविष्यगामी चेतावनी दी :
“घड़ी रुकने से समय नहीं रुकता।” इस वाक्य के जरिए उन्होंने संदेश दिया कि सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र का नियम है और आज जो अधिकारी या एजेंसियां ‘षड्यंत्र’ का हिस्सा बन रही हैं, उन्हें वक्त बदलने पर जवाब देना होगा।
सियासी समीकरण : अब आगे क्या? – बघेल के इस प्रहार ने भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। इस खबर के बाद प्रदेश में कुछ बड़े सवाल तैर रहे हैं:
- सरकारी ऑडिट की मांग: क्या विपक्ष अब छत्तीसगढ़ संवाद के खर्चों और वहां काम करने वाली बाहरी एजेंसियों के कॉन्ट्रैक्ट की जांच की मांग करेगा?
- AI का दुरुपयोग: क्या चुनाव आयोग या साइबर सेल इन गंभीर आरोपों का संज्ञान लेगा कि सरकारी संसाधनों से ‘डीपफेक’ बनाए जा रहे हैं?
- अफसरशाही में खलबली: क्या बघेल के “दीवारों के कान हैं” वाले बयान के बाद अब मंत्रालय और संवाद के भीतर ‘लीकेज’ रोकने के लिए जासूसी बढ़ेगी?
नतीजा: छत्तीसगढ़ की राजनीति अब बैनर-पोस्टर से निकलकर AI और डेटा वॉर में तब्दील हो गई है। भूपेश बघेल ने न केवल एक आरोप लगाया है, बल्कि आने वाले चुनावों के लिए एक बड़ा नैरेटिव सेट कर दिया है—‘सरकारी तंत्र बनाम लोकतंत्र’।



