महा-एक्सक्लूसिव : क्या अपनी कुर्सी बचाने के लिए मंत्री ने दी OSD की ‘बलि’?… क्या महिला बाल विकास विभाग में चल रहा है भ्रष्टाचार का ‘डार्क सिंडिकेट’?…

रायपुर। क्या छत्तीसगढ़ के महिला बाल विकास विभाग में कोई बहुत बड़ा घोटाला पनप रहा है? क्या विभाग की कमान मंत्री के बजाय किसी ‘अदृश्य सुपर पावर’ के हाथों में है? ये सवाल इसलिए सुलग रहे हैं क्योंकि विभाग में एक ऐसा प्रशासनिक फरमान जारी हुआ है, जिसने पूरी ब्यूरोक्रेसी को सन्न कर दिया है।
मामला मंत्री के OSD (विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी) पर अचानक गिरी गाज से जुड़ा है। हैरानी की बात यह है कि जिस मामले में OSD को आनन-फानन में नाप दिया गया, उसकी जांच एजेंसी की रिपोर्ट अब तक टेबल पर आई ही नहीं है। इस जल्दबाजी ने साफ कर दिया है कि सत्ता के गलियारों में कुछ ऐसा ‘काला-पीला’ हो रहा है, जिसे छिपाने के लिए एक छोटे अधिकारी की बलि चढ़ा दी गई है। यह एक सीधा सवाल खड़ा करता है: क्या मंत्री जी ने खुद के दामन पर लगे दाग धोने के लिए अपने ही करीबी को मोहरा बना दिया?
हड़बड़ी में की गई कार्रवाई : न्याय की प्रक्रिया या लीपापोती की साजिश? – प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था का एक सीधा सिद्धांत है – पहले जांच, फिर तथ्य, उसके बाद दोष और अंत में सजा। लेकिन छत्तीसगढ़ के इस हाई-प्रोफाइल मामले में मंत्री ने जांच एजेंसी से भी दो कदम आगे चलते हुए खुद ही अदालत लगा ली और सजा भी सुना दी।
सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों से विभाग में चल रही धांधली को लेकर विपक्ष और मीडिया लगातार सरकार की घेराबंदी कर रहे थे। मंत्री के इस्तीफे और जवाबदेही तक की मांग उठने लगी थी। इस भारी राजनीतिक दबाव से घबराई मंत्री ने “बलि का बकरा” तलाशना शुरू किया और अंततः गाज गिरी OSD पर। राजनीतिक जानकारों का सीधा कहना है कि बिना अंतिम जांच रिपोर्ट के किसी अधिकारी को दोषी ठहराना, दरअसल मुख्य घोटाले से ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी ‘शकुनि चाल’ है।
कौन है पर्दे के पीछे का ‘सुपर मिनिस्टर’? – इस पूरे ड्रामे का सबसे खौफनाक पहलू वह ‘अदृश्य हाथ’ है, जो वास्तव में विभाग को चला रहा है। प्रदेश के प्रशासनिक हल्कों में यह बात ओपन सीक्रेट बन चुकी है कि फैसले OSD या मंत्री नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे बैठा कोई रसूखदार व्यक्ति ले रहा है।
अंदरखाने की खबर के मुताबिक विभाग में चल रहे तीन बड़े ‘खेल’ :
- अवैध अटैचमेंट का गोरखधंधा : नियमों को ताक पर रखकर एक अधिकारी को अनाधिकृत तरीके से विभाग में अटैच किया गया है। यह अधिकारी किसके इशारे पर काम कर रहा है, यह जांच का बड़ा विषय है।
- दागी अफसरों के लिए बिछाई जा रही रेड कार्पेट : भ्रष्टाचार की हद यह है कि एक ऐसे दागी अधिकारी को विभाग में मलाईदार कुर्सी सौंपने की तैयारी चल रही है, जिसके खिलाफ पहले से ही गंभीर विभागीय जांच लंबित है।
- सिंडिकेट का कब्जा : विभाग के टेंडर, पोस्टिंग और योजनाओं में एक खास सिंडिकेट का दखल बढ़ता जा रहा है, और OSD को हटाकर असल में इस सिंडिकेट के रास्ते के कांटे साफ किए गए हैं।
कांपती ब्यूरोक्रेसी और उबलता विपक्ष – इस तानाशाही पूर्ण कार्रवाई ने राज्य के प्रशासनिक अमले (ब्यूरोक्रेसी) में दहशत और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। मंत्रालय के गलियारों में दबी जुबान में अधिकारी कह रहे हैं कि “अगर राजनेता अपनी गलतियों का ठीकरा यूं ही अफसरों के सिर फोड़ते रहे, तो काम करना असंभव हो जाएगा।” OSD केवल एक ‘फाइल-पुशर’ होता है, नीतिगत निर्णय तो उच्च स्तर (मंत्री) पर ही होते हैं। ऐसे में अकेले OSD को सूली पर चढ़ाना पूरी व्यवस्था का मनोबल तोड़ने वाला कदम है।
विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर सरकार की नींद हराम कर दी है। विपक्षी नेताओं ने सीधा हमला बोलते हुए कहा है, “यह कार्रवाई भ्रष्टाचारियों को बचाने का एक डर्टी पॉलिटिकल स्टंट है। मंत्री जी को यह बताना चाहिए कि जब जांच पूरी ही नहीं हुई, तो उन्हें सपने में कैसे पता चल गया कि गलती OSD की है? असली मुजरिम मंत्री और उनके पीछे बैठे आका हैं।”
सरकार से 5 सबसे तीखे और चुभते हुए सवाल :
- जांच रिपोर्ट आने से पहले सजा क्यों? क्या सरकार को डर था कि निष्पक्ष जांच में आंच सीधे मंत्री के केबिन तक पहुंच जाएगी?
- दागी अफसरों से इतना प्रेम क्यों? जिस अधिकारी पर विभागीय जांच चल रही है, उसे विभाग में पिछले दरवाजे से क्यों घुसाया जा रहा है?
- पर्दे के पीछे का असली ‘बॉस’ कौन है? वह कौन व्यक्ति है जिसके इशारे पर बिना मंत्री के हस्ताक्षर के फाइलें दौड़ रही हैं?
- क्या OSD अकेले बड़े फैसले ले सकता है? अगर नहीं, तो उन फैसलों को मंजूरी देने वाले उच्च स्तर के लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- अवैध अटैचमेंट का ‘काला-पीला’ कब बंद होगा? किसके दबाव में नियमों को कुचलकर मनपसंद अधिकारियों की तैनाती की जा रही है?
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक OSD के सस्पेंशन या हटाने का मामला नहीं है। यह एक ऐसे सिस्टम की खौफनाक तस्वीर है जहां ‘बड़ी मछलियों’ को बचाने के लिए ‘छोटी मछलियों’ को चारा बना दिया जाता है। अब नजरें जांच एजेंसी की उस रिपोर्ट पर हैं, जिसे दरकिनार कर यह फैसला लिया गया। देखना यह है कि जब सच की फाइल खुलेगी, तो कुर्सी सिर्फ OSD की जाएगी या सत्ता के गलियारों में बैठे असली ‘महारथियों’ का भी तंबू उखड़ेगा!




