रायपुर

शोक में डूबा कला जगत : पंडवानी को वैश्विक पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन…

रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक कला और संस्कृति को वैश्विक पटल पर स्थापित करने वाली महान पंडवानी गायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का शनिवार देर रात (3:15 बजे) निधन हो गया। वे 70 वर्ष की थीं। उन्होंने रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अंतिम सांस ली। वे पिछले करीब दो वर्षों से उम्र संबंधी बीमारियों और सांस लेने में तकलीफ से जूझ रही थीं। आज उनके पैतृक गांव गनियारी में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

भावपूर्ण श्रद्धांजलि

​उनके निधन की खबर से कला, संस्कृति और राजनीतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय समेत कई दिग्गजों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।

पीएम मोदी और सीएम साय ने जताया शोक – ​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर शोक व्यक्त करते हुए लिखा:

​”उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में पहचान दिलाई। उनका जाना कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।”

​गौरतलब है कि 1 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री मोदी ने खुद तीजन बाई की बहू वेणु देशमुख को फोन कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी और हरसंभव मदद का आश्वासन देते हुए उन्हें ‘छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपरा की धरोहर’ बताया था।

​वहीं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि तीजन बाई ने पंडवानी के जरिए देश-विदेश में राज्य का नाम रोशन किया है, उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।

संघर्षों से भरा रहा सफर : समाज ने किया था बेदखल – 24 अप्रैल 1956 को भिलाई के गनियारी गांव में पारधी समुदाय में जन्मीं तीजन बाई का जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। पिता चुनुकलाल और माता सुखवती की बेटी तीजन को बचपन में अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कहानियां गाते हुए देखने से पंडवानी का शौक लगा।

​जब उन्होंने पंडवानी गाना शुरू किया, तो रूढ़िवादी समाज ने उनका विरोध किया और उन्हें समाज से बेदखल कर दिया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी कला को साधना मानकर गाती रहीं। बाद में गायक उमेद सिंह देशमुख ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें विधिवत प्रशिक्षण दिया।

रूढ़ियों को तोड़कर चुनी ‘कापालिक शैली’ – महज 13 वर्ष की उम्र में तीजन बाई ने अपना पहला मंच प्रदर्शन किया था। उस दौर में महिलाएं केवल बैठकर पंडवानी गाती थीं, जिसे ‘वेदमती शैली’ कहा जाता है। तीजन बाई ने रूढ़ियों को तोड़ते हुए पुरुषों के वर्चस्व वाली ‘कापालिक शैली’ को अपनाया, जिसमें खड़े होकर, हाथ में तंबूरा लेकर अभिनय के साथ गाकर कहानी सुनाई जाती है। उनकी इसी अनोखी शैली और कड़कड़ाती आवाज ने उन्हें विश्व प्रसिद्ध बना दिया।

अद्भुत संयोग : कभी स्कूल नहीं गईं, पर मिलीं 4 ‘डी. लिट.’ की उपाधियां – तीजन बाई का जीवन इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा किसी डिग्री की मोहताज नहीं होती। बचपन में कभी स्कूल न जा पाने वाली तीजन बाई बाद में साक्षरता अभियान के जरिए सिर्फ पांचवीं तक ही पढ़ सकीं। लेकिन उनकी कला का जादू ऐसा था कि देश-विदेश के बड़े विश्वविद्यालयों ने उन्हें 4 बार डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (डी. लिट.) की मानद उपाधि से सम्मानित किया।

देश के तीनों सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से थीं विभूषित – भारतीय लोक कला में उनके असाधारण और बेजोड़ योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के शीर्ष नागरिक सम्मानों से नवाजा था:

  • पद्मश्री
  • पद्म भूषण
  • पद्म विभूषण

​डॉ. तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन हाथ में तंबूरा लिए, महाभारत के प्रसंगों को जीवंत करती उनकी कड़कती आवाज और रौद्र रूप हमेशा कला प्रेमियों के दिलों में अमर रहेगा।

Ambika Sao

सह-संपादक : छत्तीसगढ़

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