सड़क पर रसोई, दिल में गुस्सा: रायपुर कलेक्टर से मिलीं 10 महिलाएं, छत्तीसगढ़ बंद की चेतावनी!… जाने पूरा मामला…

रायपुर के नकटी गांव में हुई बुलडोजर कार्रवाई और उसके बाद सड़क से लेकर मुख्यमंत्री आवास (CM House) तक भड़का जनआक्रोश छत्तीसगढ़ की इस साल की सबसे बड़ी प्रशासनिक और मानवीय त्रासदियों में से एक बन चुका है। बेघर हुए ग्रामीणों का दर्द, पुलिस की सख्ती और विपक्ष (कांग्रेस) के तीखे तेवरों ने इस पूरे मामले को एक हाई-वोल्टेज राजनीतिक ड्रामे में बदल दिया है।

इस पूरी वारदात का मिनट-दर-मिनट और गहराई से विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:
आख़िर क्या है नकटी गांव का पूरा विवाद? – विवाद की जड़ रायपुर के पास स्थित नकटी गांव की 15 हेक्टेयर (लगभग 37 एकड़) सरकारी जमीन है।
- हाउसिंग बोर्ड का दावा : छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड और स्थानीय राजस्व प्रशासन का कहना है कि गांव के 77-80 लोगों ने इस बेशकीमती सरकारी जमीन पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा था। प्रशासन ने दावा किया कि उन्होंने नियमानुसार नोटिस देने के बाद ही कार्रवाई की।
- ग्रामीणों का दर्द : दूसरी ओर, ग्रामीणों का कहना है कि वे पीढ़ियों से (दशकों से) उस जमीन पर कच्चे-पक्के मकान बनाकर रह रहे थे। उनके पास बिजली के बिल, राशन कार्ड और आधार कार्ड जैसे दस्तावेज हैं। अचानक बिना किसी पुख्ता वैकल्पिक व्यवस्था के उनके आशियाने उजाड़ दिए गए।
वह ‘काला दिन’: जब 80 घरों पर चला बुलडोजर – घटना की शुरुआत तीन दिन पहले हुई, जब अचानक भारी पुलिस बल, वज्र वाहन और दर्जनों बुलडोजरों के साथ प्रशासनिक अमला नकटी गांव पहुंच गया।
- देखते ही देखते पूरे गांव को छावनी में बदल दिया गया ताकि कोई विरोध न कर सके।
- इसके बाद बेरहमी से बुलडोजर चलाकर 80 से अधिक परिवारों के घरों को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया।
- गृहस्थी का सामान निकालने तक का वक्त नहीं मिला। महिलाएं और बच्चे रोते-बिलखते रहे, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी नहीं रुकी।
- हालांकि प्रशासन ने कहा कि उन्होंने EWS (Economically Weaker Section) के मकान दिए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि अधिकांश प्रभावित परिवारों को कोई चाबी या आवास नहीं मिला था, जिससे वे खुले आसमान के नीचे आ गए।
कलेक्ट्रेट से मंत्री बंगले और फिर CM हाउस तक ‘महापड़ाव’ – घर टूटने के बाद ग्रामीणों का सब्र का बांध टूट गया। वे कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के साथ लामबंद हुए और न्याय की भीख मांगने रायपुर शहर की ओर निकल पड़े:
कलेक्ट्रेट पर बेअसर धरना – सबसे पहले ग्रामीण रायपुर कलेक्ट्रेट के सामने धरने पर बैठ गए। उन्होंने अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन जब कोई बड़ा आश्वासन नहीं मिला और कलेक्टर उनसे मिलने बाहर नहीं आए, तो आक्रोशित भीड़ ने सत्ता के केंद्रों का रुख करने का फैसला किया।
मंत्री ओपी चौधरी के बंगले का घेराव – कलेक्ट्रेट से निकलकर प्रदर्शनकारी सीधे कैबिनेट मंत्री ओपी चौधरी के बंगले की ओर बढ़े। ग्रामीणों ने बंगले के बाहर जमकर नारेबाजी की और सरकार विरोधी नारे लगाए। जब मंत्री से मुलाकात या ठोस भरोसा नहीं मिला, तो गुस्साए ग्रामीणों ने अंतिम विकल्प के तौर पर मुख्यमंत्री आवास (CM House) को घेरने की ठान ली।
CM हाउस के बाहर हाई-वोल्टेज ड्रामा और ‘सड़क पर रसोई’ – ग्रामीणों के रुख को देखते हुए राजधानी पुलिस अलर्ट मोड पर आ गई। मुख्यमंत्री आवास की ओर जाने वाले रास्तों पर लोहे के ऊंचे बैरिकेड्स लगा दिए गए और भारी संख्या में पुलिस बल (दंगा नियंत्रण बल) तैनात कर दिया गया।
- पुलिस की घेराबंदी : जब ग्रामीणों को मुख्यमंत्री आवास से काफी पहले रोक दिया गया, तो वे वहीं सड़क पर ही धरने पर बैठ गए।
- सड़क पर पकाया खाना : ग्रामीण अपने साथ घर का बचा हुआ राशन, बर्तन और गैस-चूल्हा लेकर आए थे। बेघर होने के गम और भूख के बीच, उन्होंने सीएम हाउस के ठीक सामने की सड़क को ही अपनी रसोई बना लिया। वहां बड़े-बड़े बर्तनों में खाना पकाया जाने लगा।
- पुलिस से तीखी झड़प : इस दौरान पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था और यातायात का हवाला देकर उन्हें वहां से खदेड़ने और खाना बनाने से रोकने की कोशिश की। इससे माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। आक्रोशित महिलाओं ने रोते हुए पुलिस अधिकारियों को झकझोर दिया और कहा : “हमारे रहने का ठिकाना तो सरकार ने पहले ही छीन लिया, हमारे आशियाने तोड़ दिए। अब क्या यह क्रूर प्रशासन हमें सड़क पर दो वक्त की रोटी भी सुकून से नहीं खाने देगा? क्या हम भूखे मर जाएं?”
कलेक्टर से मुलाकात और 5 दिन का अल्टीमेटम – बढ़ते जनआक्रोश और मीडिया के दबाव के बीच प्रशासन बैकफुट पर आया। रायपुर कलेक्टर ने प्रदर्शनकारियों में से 10 प्रमुख महिलाओं के एक प्रतिनिधिमंडल को बातचीत के लिए भीतर बुलाया।
- बंद कमरे में हुई इस मुलाकात में रोती हुई महिलाओं ने कलेक्टर के सामने अपनी आपबीती रखी और तुरंत सिर छिपाने के लिए छत की मांग की।
- कलेक्टर ने स्थिति को संभालते हुए आश्वासन दिया कि वे ग्रामीणों की मांगों की फाइल को ‘उच्च स्तर’ (मुख्यमंत्री और कैबिनेट) तक पहुंचाएंगे और जल्द ही कोई बीच का रास्ता निकाला जाएगा।
- इस आश्वासन के बाद, ग्रामीणों ने प्रशासन को 5 दिनों का सख्त अल्टीमेटम दिया और वहां से हटे।
ग्रामीणों और कांग्रेस की 3 चट्टानी मांगें – ग्रामीणों और उनका नेतृत्व कर रहे कांग्रेस नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इन तीन मांगों से पीछे नहीं हटेंगे:
- जमीन की शत-प्रतिशत वापसी : नकटी गांव की जिस जमीन से उन्हें हटाया गया है, उन्हें वहीं दोबारा बसाया जाए या उसके बदले उसी क्षेत्र में उतनी ही जमीन दी जाए।
- मकानों का भारी मुआवजा : बुलडोजर कार्रवाई में नष्ट हुए पक्के मकानों, घरेलू सामान और आशियानों का सरकार उचित और पूरा मूल्यांकन कर मुआवजा राशि दे।
- मुकदमों (FIR) की तत्काल वापसी : आंदोलन के दौरान पुलिस ने जिन ग्रामीणों और नेताओं पर कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में एफआईआर (FIR) दर्ज की है, उसे तुरंत वापस लिया जाए।
आगे की रणनीति : ‘छत्तीसगढ़ बंद’ का महा-संकट – इस पूरे मामले ने अब छत्तीसगढ़ में एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले लिया है। कांग्रेस नेताओं ने दोटूक शब्दों में सरकार को चेतावनी दी है:
- चरण 1 : यदि 5 दिनों के अल्टीमेटम के भीतर सरकार ने पीड़ितों के पक्ष में फैसला नहीं लिया, तो पूरा अमला राज्यपाल (Governor) के पास जाएगा और न्याय की गुहार लगाएगा।
- चरण 2 : अगर राजभवन से भी आदिवासियों और ग्रामीणों को राहत नहीं मिली, तो पूरे छत्तीसगढ़ में उग्र आंदोलन किया जाएगा और ‘छत्तीसगढ़ बंद’ (Total Shutdown) का आह्वान किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी।
नकटी गांव की यह घटना विकास और अतिक्रमण हटाने के नाम पर मानवीय संवेदनाओं को कुचलने का एक ज्वलंत उदाहरण बन चुकी है। अब देखना यह है कि 5 दिनों के इस अल्टीमेटम के खत्म होने के बाद सरकार झुकती है या छत्तीसगढ़ में आंदोलन की एक नई चिंगारी सुलगती है।
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