सत्ता के रसूख तले दबी निष्पक्षता! जिस थाना प्रभारी के खिलाफ शिकायत, उसी की ‘चौखट’ पर हाजिरी का फरमान…

बलरामपुर-रामानुजगंज | विशेष खोजी रिपोर्ट
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कुचलने और प्रशासनिक शह पर निष्पक्षता की धज्जियां उड़ाने का एक और शर्मनाक मामला बलरामपुर जिले से सामने आया है। लंबे समय तक अन्याय की आग में झुलसकर जेल की सलाखों के पीछे दिन बिताने वाले पत्रकार रामहरी गुप्ता ने जब बसंतपुर थाना प्रभारी की मनमानी के खिलाफ ‘सीएम हेल्पलाइन’ की शरण ली, तो उन्हें न्याय की जगह मिला—उसी थाने का समन, जिसके खिलाफ जंग छिड़ी है!
यह मामला न केवल बलरामपुर पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि शिकायत निस्तारण के नाम पर किस तरह रसूखदार अधिकारी खुद ही अपने मामलों में ‘न्यायाधीश’ बनने की होड़ में लगे हैं।
शिकायतकर्ता ही निशाने पर: ‘थाने आओ, वरना…’पत्रकार रामहरी गुप्ता का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने तंत्र की कमियों पर सवाल उठाए और मुख्यमंत्री से सीधे न्याय की गुहार लगाई। लेकिन जवाब में निष्पक्ष जांच कराने के बजाय, बसंतपुर थाने के मातहत ही उन्हें लगातार थाने हाजिर होने का फरमान सुनाने लगे।
सवाल सीधा है: जिस थाना प्रभारी और थाने के खिलाफ शिकायत दर्ज है, क्या उसी थाने की चारदीवारी के भीतर निष्पक्ष जांच संभव है? क्या शिकायतकर्ता को उसी जगह बुलाना, जहाँ से उसे प्रताड़ित किए जाने की आशंका है, पुलिस की खुली दबंगई नहीं है?
पत्रकार ने खेती-किसानी के मौसम का हवाला देते हुए वाड्रफनगर एसडीओपी कार्यालय जैसे तटस्थ (Neutral) स्थान पर बयान दर्ज कराने का तर्कसंगत प्रस्ताव दिया था। लेकिन प्रशासनिक हठधर्मिता का आलम देखिए – 2 अगस्त 2026 को लिखित नोटिस चिपकाकर 3 अगस्त सुबह 11 बजे अनिवार्य रूप से थाने में पेश होने की मियाद तय कर दी गई।
जांच का नाटक या साक्ष्यों को दबाने की साजिश? – पुलिस महकमे के इस कदम ने पूरे जिले के पत्रकारों और जागरूक नागरिकों में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। स्थापित कानूनी और नैतिक प्रक्रियाओं के अनुसार:
- किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत की जांच वरिष्ठ अधिकारी (SDOP या ASP) के स्तर से होनी चाहिए।
- जिस थाने पर आरोप हो, उस थाने की पुलिस खुद उस मामले की जांच या बयान दर्ज नहीं कर सकती।
इसके बावजूद, शिकायतकर्ता पर बसंतपुर थाने आने का दबाव बनाना निष्पक्ष जांच के दावों की धज्जियां उड़ाता है।
आंदोलन की राह पर पत्रकार: “अब सड़कों पर होगा हिसाब” – इस दमनकारी रवैये के खिलाफ प्रदेश के पत्रकार संगठन लामबंद हो गए हैं। पत्रकार संघों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारों का उत्पीड़न अब बर्दाश्त से बाहर हो चुका है।
“छत्तीसगढ़ में जिस तरह पत्रकारों की आवाज दबाई जा रही है, वह लोकतंत्र की हत्या है। अगर इस मामले में प्रशासनिक हठधर्मिता खत्म नहीं हुई और जांच किसी स्वतंत्र अधिकारी को नहीं सौंपी गई, तो कलम बंद होगी और सड़क पर उतरकर उग्र आंदोलन किया जाएगा।”
पत्रकार संगठन
एसपी बलरामपुर से उठती तीखी मांगें
- जांच का तबादला: बसंतपुर थाना प्रभारी के खिलाफ दर्ज शिकायत की जांच तत्काल किसी निष्पक्ष और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (SDOP वाड्रफनगर या अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक) को सौंपी जाए।
- सुरक्षित स्थान पर बयान: शिकायतकर्ता रामहरी गुप्ता का बयान बसंतपुर थाने के बाहर किसी सुरक्षित और निष्पक्ष वातावरण में दर्ज किया जाए।
- नोटिस रद्द हो: बसंतपुर थाने से जारी तानाशाही नोटिस पर तुरंत रोक लगाई जाए।
सम्पादकीय टिप्पणी : अगर रक्षक ही भक्षक के कटघरे में खड़ा हो और जांच की चाबी भी उसी की जेब में डाल दी जाए, तो इसे ‘न्याय’ नहीं बल्कि ‘न्याय का जनाजा’ निकालना कहते हैं। बलरामपुर पुलिस कप्तान को अब यह तय करना होगा कि वे कानून के इकबाल को बुलंद रखना चाहते हैं या अपनों की मनमानी पर पर्दा डालना चाहते हैं।




