सरगुजा में 15 वर्षीय नाबालिग से दुष्कर्म: 2020 में सस्पेंड हुए SDOP ध्रुवेश जायसवाल पर अब 2026 में आरोपी को भगाने के गंभीर आरोप!…

विशेष ग्राउंड रिपोर्ट | अंबिकापुर / बलरामपुर
वर्ष 2020 में बलरामपुर जिले में नाबालिगों से दुष्कर्म और अपराधों में पुलिस की लापरवाही पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कड़ा रुख अपनाया था। उस वक्त वाड्रफनगर के तत्कालीन एसडीओपी ध्रुवेश जायसवाल और रघुनाथनगर थाना प्रभारी को सीधे निलंबित कर दिया गया था। सरकार का संदेश साफ था—महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराधों में ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी।

लेकिन छह साल बाद, यानी वर्ष 2026 में एक बार फिर सरगुजा संभाग में खाकी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार भी वही नाम—एसडीओ(पी) ध्रुवेश जायसवाल—विवादों के केंद्र में हैं। ग्रामीणों ने उन पर दुष्कर्म के आरोपी को फरार कराने में मदद करने का सीधा आरोप लगाया है।
घटना क्या है? 15 वर्षीय आदिवासी बच्ची से हैवानियत – मामला अंबिकापुर कोतवाली क्षेत्र के ग्राम भफौली का है। यहाँ गांव की उपसरपंच के पति तरुण जायसवाल पर पड़ोस की 15 वर्षीय आदिवासी नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म करने का आरोप लगा है।
- अपराध क्रमांक: 504/2026
- दर्ज धाराएं: पोक्सो एक्ट की धारा 4 व 6, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 65(1) एवं अन्य प्रासंगिक धाराएं।
- घटना की तारीख: 20 जुलाई 2026
घटना के बाद से ही आरोपी तरुण जायसवाल फरार है और क्षेत्र में भारी जनआक्रोश व्याप्त है।
₹8 लाख में मामला दबाने की कोशिश और रसूख का खेल – पीड़िता के पिता का आरोप है कि घटना के अगले ही दिन (21 जुलाई 2026) आरोपी के भाई अरुण जायसवाल, उसकी पत्नी, पूर्व सरपंच विवेक पैंकरा और अशोक जायसवाल ने पीड़ित परिवार को ₹8 लाख नकद देकर मामले में समझौता करने और शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया।

ग्रामीणों का कहना है कि जायसवाल परिवार का गांव में काफी प्रभाव है और वे आर्थिक ताकत के बल पर अक्सर गंभीर मामलों में लीपापोती कराते आए हैं। हालांकि, इन आरोपों की भी पुलिस द्वारा जांच की जानी बाकी है।
SDOP ध्रुवेश जायसवाल पर फिर उठे सवाल: क्या आरोपी को भगाने में की गई मदद? – इस मामले का सबसे विवादास्पद पहलू पुलिस प्रशासन की भूमिका को लेकर सामने आ रहा है। स्थानीय ग्रामीणों ने कैमरे के सामने आरोप लगाया है कि आरोपी के कुछ रिश्तेदार पुलिस विभाग में कार्यरत हैं।
ग्रामीणों का बड़ा आरोप : “एसडीओ(पी) ध्रुवेश जायसवाल ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए आरोपी तरुण जायसवाल को समय रहते फरार होने में मदद की।”
हालांकि इन संगीन आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन 2020 में इसी तरह की लापरवाही में सस्पेंड हो चुके अधिकारी का नाम दोबारा सामने आने से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।
राजनीतिक लीपापोती और बयानों का दौर – मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए राजनीतिक पारा भी चढ़ गया है। शुरुआती चर्चाओं में आरोपी को स्थानीय भाजपा जिलाध्यक्ष का करीबी बताया गया, जिसके बाद मामले ने तूल पकड़ा।
इसके बाद जब कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से “नाबालिग की सहमति” जैसा विवादित तर्क दिए जाने की बात सामने आई, तो दोनों ही प्रमुख दलों (भाजपा और कांग्रेस) के नेता अपनी-अपनी सफाई देने और पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचने लगे। फिलहाल किसी भी राजनीतिक दल की इसमें प्रत्यक्ष संलिप्तता का कोई आधिकारिक निष्कर्ष नहीं आया है।
पुलिस की अब तक की कार्रवाई: बंदूक जब्त, कुर्की की तैयारी – मामला तूल पकड़ते ही डीआईजी एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) राजेश अग्रवाल ने कड़ा रुख अपनाया है:
- ₹5,000 का इनाम: फरार आरोपी तरुण जायसवाल की गिरफ्तारी पर 5 हजार रुपये के नकद इनाम की घोषणा की गई है।
- 12 बोर बंदूक जब्त: आरोपी के नाम पर दर्ज 12 बोर की लाइसेंसी बंदूक और उसका लाइसेंस परिजनों से जब्त कर लिया गया है। शस्त्र लाइसेंस निरस्तीकरण की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दी गई थी।
- संपत्ति कुर्की: पुलिस ने राजस्व विभाग से आरोपी की चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा मांगा है और कुर्की की वैधानिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके अलावा अतिक्रमित भूमि की जांच के लिए भी आवेदन दिया गया है।
- मदद करने वालों को चेतावनी: पुलिस ने साफ कर दिया है कि आरोपी को शरण देने या उसकी मदद करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
2020 की कार्रवाई और 2026 का सवाल : 2020 में जब महिलाओं के विरुद्ध अपराध में लापरवाही पर एसडीओपी स्तर के अधिकारी पर निलंबन की गाज गिर सकती है, तो 2026 के इस मामले में सवाल उठना लाजिमी है:
बड़ा सवाल : क्या जांच में एसडीओ(पी) ध्रुवेश जायसवाल या किसी अन्य जनप्रतिनिधि/अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, तो क्या प्रशासन 2020 की तरह ही कठोर रुख अपनाएगा?
पीड़ित परिवार और आम जनता की सिर्फ एक ही मांग है – मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच हो। यदि कोई बेकसूर है तो उसे न्याय मिले, लेकिन यदि रसूख या पद के दम पर आरोपी को बचाने की कोशिश हुई है, तो उन सभी पर कानून का चाबुक चलना चाहिए।




