“सखी सईयां तो खूब ही कमात हैं…” – पर्दे का व्यंग्य जब बन गया आम आदमी की चौखट का असली दर्द…

न्यूज़ डेस्क | विशेष रिपोर्ट
“सखी सईयां तो खूब ही कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है…” पर्दे पर कुछ वर्षों पहले जब यह गीत गूंजा था, तब सिनेमाघरों में बैठे लोगों ने इस पर तालियां पीटी थीं। उस वक्त यह केवल एक लोकगीत के रूप में व्यवस्था पर एक करारा व्यंग्य था। लेकिन आज के हालात पर अगर नज़र डालें, तो यह गीत अब महज एक सिनेमाई रचना नहीं, बल्कि देश के हर मध्यम वर्गीय परिवार, किसान और मज़दूर की जिंदगी का सबसे कड़वा सच बन चुका है।
लगातार बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। गांव की चौपालों से लेकर शहर की तंग गलियों तक, अब चर्चा का विषय राजनीति से ज्यादा ‘राशन के दाम’ बन चुके हैं।
थाली से गायब हो रहा है स्वाद और पोषण – बाजारों का हाल यह है कि आम आदमी के लिए हरी सब्जियां और दालें खरीदना किसी लग्जरी से कम नहीं रह गया है। खाद्य तेलों, मसालों और रोजमर्रा के राशन की कीमतों में जो उछाल आया है, उसने रसोई का पूरा गणित बिगाड़ दिया है। जिस थाली में कभी चार चीजें सजा करती थीं, वह अब केवल पेट भरने का साधन मात्र रह गई है। गृहिणियों का कहना है कि वे अब महीने के अंत तक का खर्च चलाने के लिए अपनी छोटी-मोटी जरूरतों में भी कटौती करने को मजबूर हैं।
‘सईयां की कमाई’ भी पड़ रही है कम – गीत की पंक्तियां कहती हैं कि कमाई तो बहुत है, लेकिन महंगाई सब खा जाती है। आज का यथार्थ इससे भी ज्यादा डरावना है। एक तरफ जहां रोजगार और आमदनी के साधन सीमित हुए हैं, वेतन वृद्धि या तो रुकी हुई है या महंगाई दर के मुकाबले बेहद मामूली है। वहीं दूसरी तरफ शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन के खर्च आसमान छू रहे हैं। ऐसे में जो कमाई महीने की पहली तारीख को हाथ में आती है, वह हफ्ते भर के भीतर ही बिलों और उधारों को चुकाने में खत्म हो जाती है। बचत का कॉलम अब लोगों की डायरी से लगभग मिट चुका है।
गांवों और कस्बों में सबसे ज्यादा मार – शहरों में फिर भी लोग किसी तरह अतिरिक्त काम करके गुज़ारा कर रहे हैं, लेकिन ग्रामीण अंचलों और कस्बों में स्थिति ज्यादा गंभीर है। किसानी में लगने वाली लागत (खाद, बीज, डीजल) महंगी हो गई है, जबकि उनकी उपज का सही मोल आज भी एक बड़ा संघर्ष है। दिहाड़ी मज़दूरों के लिए तो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी किसी जंग से कम नहीं है।
समाधान की उम्मीद में टकटकी लगाए जनता – यह सिर्फ एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल है जहां विकास के दावों के बीच आम नागरिक अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। जब तक नीतियां ‘जमीनी हकीकत’ और ‘आम आदमी की क्रय शक्ति’ को ध्यान में रखकर नहीं बनेंगी, तब तक ‘महंगाई डायन’ इसी तरह लोगों की मेहनत की कमाई को निगलती रहेगी।
जनता आज केवल राहत की उम्मीद में है, कि कोई तो ऐसी व्यवस्था बने जो इस ‘डायन’ के प्रकोप से उन्हें आज़ाद कर सके।




