बिलासपुर

अपोलो का ‘कातिल’ डॉक्टर : बिना डिग्री के धड़ल्ले से की एंजियोप्लास्टी; चार्जशीट के बाद अब CBI जांच की मांग तेज…

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के अपोलो अस्पताल में साल 2006 में हुए देश के सबसे बड़े मेडिकल फर्जीवाड़े की जांच रिपोर्ट आते ही प्रदेश की सियासत और स्वास्थ्य महकमा पूरी तरह गरमा गया है। खुद को देश-विदेश की बड़ी डिग्रियों से लैस बताकर मरीजों के दिलों से खिलवाड़ करने वाले कथित डॉक्टर नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव के खिलाफ पुलिस ने अदालत में चार्जशीट (चालान) तो पेश कर दिया है, लेकिन असली विवाद पुलिस द्वारा अपोलो अस्पताल प्रबंधन को दी गई ‘क्लीन चिट’ को लेकर खड़ा हो गया है।

​इस संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मामले में अब CBI (केंद्रीय जांच ब्यूरो) जांच की मांग उठने लगी है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर क्या है यह पूरा मामला, जिसने 19 साल बाद एक बार फिर न्याय व्यवस्था और कॉर्पोरेट अस्पतालों की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

मुख्य आरोपी : फर्जी डॉक्टर का ‘खतरनाक’ खेल – पुलिस की चार्जशीट और तफ्तीश में जो बातें सामने आई हैं, वह किसी रोंगटे खड़े कर देने वाली थ्रिलर फिल्म जैसी हैं:

  • फर्जी नाम और पहचान का जाल: आरोपी का असली नाम “नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव” है, लेकिन उसने कथित तौर पर “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेज तैयार करवाए थे।
  • डिग्रियों का फर्जीवाड़ा: आरोपी ने खुद को MBBS, MRCP (यूके) और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी (हृदय रोग विशेषज्ञ) का एक्सपर्ट बताया था। छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल, उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज समेत देश भर के कई संस्थानों से जब पुलिस ने दस्तावेज जुटाए, तो उसके सारे दावे पूरी तरह फर्जी निकले।
  • दिलों से खिलवाड़ (एंजियोप्लास्टी और एंजियोग्राफी): पुलिस रिमांड के दौरान आरोपी ने खुद कबूल किया कि उसने अपोलो अस्पताल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट रहते हुए कई गंभीर मरीजों की एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी (हार्ट स्टेंटिंग) जैसी जटिल सर्जरीज की थीं।

27 मौतों का खौफनाक आंकड़ा, लेकिन कानूनी पेच – पुलिस जांच में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि इस फर्जी डॉक्टर के कार्यकाल (साल 2006) के दौरान अस्पताल में करीब 27 मरीजों की मौत हुई थी। हालांकि, तकनीकी और कानूनी रूप से पुलिस इन मौतों को सीधे आरोपी की फर्जी डिग्री से नहीं जोड़ पा रही है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:

  • ​इतने सालों बाद पर्याप्त और पुख्ता मेडिकल रिकॉर्ड्स का न मिल पाना।
  • ​केवल दो पीड़ित परिवारों द्वारा ही थाने में औपचारिक शिकायत दर्ज कराया जाना।

2006 से 2025 : टाइमलाइन, जिसने 19 साल बाद खोला दफन राज – यह पूरा मामला तब दोबारा खुला जब मध्यप्रदेश के दमोह से आरोपी डॉक्टर की किसी अन्य फर्जीवाड़े में गिरफ्तारी हुई। इसके बाद छत्तीसगढ़ के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के बेटे प्रो. प्रदीप शुक्ल ने बिलासपुर के सरकंडा थाने में एफआईआर दर्ज कराई।

अस्पताल के रिकॉर्ड्स खंगालने पर जो टाइमलाइन सामने आई, वो इस प्रकार है:

  • 01 जून 2006 : आरोपी डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव को बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में बकायदा कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट के पद पर नियुक्त किया गया।
  • 21 जुलाई 2006 : मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कद्दावर नेता रहे राजेंद्र प्रसाद शुक्ल को इलाज के लिए अपोलो में भर्ती कराया गया।
  • 02 अगस्त 2006 : इस फर्जी डॉक्टर ने शुक्ल जी की एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की प्रक्रिया को अंजाम दिया। इसके कुछ ही घंटों बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी।
  • 20 अगस्त 2006 : लगातार 18 दिनों तक वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत की जंग लड़ने के बाद पूर्व विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ल का निधन हो गया। परिवार इसे सामान्य मौत समझता रहा।
  • अप्रैल 2025 : लगभग 19 साल बाद शुक्ल परिवार को भनक लगी कि जिस डॉक्टर ने उनके पिता के दिल का ऑपरेशन किया था, वह असल में एक ठग है और फर्जी डिग्री के आरोप में दमोह में पकड़ा गया है। इसके बाद सरकंडा थाने में शिकायत और एफआईआर दर्ज हुई।
  • 27 जून 2025 : पुलिस ने आरोपी डॉक्टर के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना (जालसाजी) और बिना वैध योग्यता के इलाज करने की धाराओं के तहत कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी।

प्रबंधन को ‘क्लीन चिट’ पर क्यों भड़का गुस्सा? – बिलासपुर पुलिस (एसएसपी रजनेश सिंह) के मुताबिक, उन्होंने कानूनी राय लेने के बाद अपोलो अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति के खिलाफ क्लोजर रिपोर्ट कोर्ट में पेश की है। पुलिस का तर्क है कि ऐसे कोई ठोस या आपराधिक साक्ष्य नहीं मिले जिससे यह साबित हो सके कि अस्पताल ने जानबूझकर या किसी आपराधिक साजिश के तहत इस फर्जी डॉक्टर को नौकरी पर रखा था।

इसी क्लीन चिट ने अब एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया है। मृतक नेता के परिजनों और आम जनता द्वारा उठाए जा रहे तीखे सवाल निम्न हैं :

1. साख अस्पताल की या डॉक्टर की? – ​पीड़ित परिवारों का साफ कहना है कि कोई भी मरीज किसी अनजान डॉक्टर का चेहरा देखकर अस्पताल नहीं जाता। लोग ‘अपोलो’ जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के ब्रांड और उसकी विश्वसनीयता पर भरोसा करके अपनी जान सौंपते हैं। ऐसे में प्रबंधन अपनी जिम्मेदारी से पल्ला कैसे झाड़ सकता है?

2. बैकग्राउंड वेरिफिकेशन में इतनी बड़ी चूक कैसे? – ​एक सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल की चयन समिति (Selection Committee) ने इतनी संवेदनशील पोस्ट पर नियुक्ति देने से पहले डॉक्टर की डिग्रियों का मेडिकल काउंसिल या यूनिवर्सिटी से वेरिफिकेशन क्यों नहीं कराया? क्या यह सिर्फ ‘लापरवाही’ थी या इसके पीछे कोई बड़ा संस्थागत संरक्षण था?

3. सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल : ​अगर कोई बिना डिग्री का व्यक्ति किसी बड़े संस्थान में बैठकर सालों तक लोगों की जान से खेलता रहे और अंत में संस्थान यह कहकर बच निकले कि “हमें तो पता ही नहीं था”, तो देश के हेल्थकेयर सिस्टम पर आम आदमी का भरोसा कैसे टिकेगा?

अब आगे क्या? अदालत के रुख पर टिकी निगाहें – शुक्ल परिवार ने पुलिस की इस अधूरी जांच को सिरे से खारिज करते हुए मामले की निष्पक्ष CBI जांच की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि जब तक किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से इस पूरे नेक्सस (सांठगांठ) की जांच नहीं होगी, तब तक अस्पताल प्रबंधन के रसूखदार लोग बचते रहेंगे और उन 27 परिवारों को कभी न्याय नहीं मिलेगा जिन्होंने अपनों को खोया है।

वर्तमान स्थिति : मुख्य आरोपी डॉक्टर के खिलाफ चालान कोर्ट में पेश हो चुका है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अदालत पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए अस्पताल प्रबंधन को बरी कर देगी? या फिर पीड़ित परिवारों की दलील को सुनते हुए कोर्ट इस मामले में री-इन्वेस्टिगेशन (दोबारा जांच) या किसी स्वतंत्र एजेंसी (CBI) को केस सौंपने का ऐतिहासिक आदेश जारी करेगी। पूरे प्रदेश की नजरें अब कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी हैं।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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