रायगढ़

रायगढ़ RTO या ‘यमराज’ का शोरूम? बिना ट्रायल बंट रहे ‘मौत के परमिट’, साहब के डिजिटल सिग्नेचर से सड़कों पर उतर रहे ‘लाइसेंसधारी कातिल’…

रायगढ़ | विशेष पड़ताल क्या आप रायगढ़ की सड़कों पर सुरक्षित हैं? शायद नहीं। क्योंकि आपके बगल से गुजरने वाली भारी ट्रक, तेज रफ्तार कार व मोटरसायकल के स्टीयरिंग पर बैठा शख्स ड्राइवर नहीं, बल्कि ‘सिस्टम की उपज’ हो सकता है। रायगढ़ क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) इन दिनों ड्राइविंग स्किल नहीं, बल्कि ‘रिश्वत का वजन’ तौल रहा है। यहाँ ट्रायल ट्रैक पर पसीना बहाने की जरूरत नहीं, बस ‘साहब’ के पोर्टल पर ग्रीन सिग्नल मिलते ही आपके घर ‘मौत का लाइसेंस’ डिलीवर हो जाता है।

विधानसभा में फूटा ‘डेटा बम’ : 90% लाइसेंस फर्जीवाड़े की भेंट? – भ्रष्टाचार की यह दुर्गंध अब छत्तीसगढ़ विधानसभा की दहलीज तक जा पहुंची है। विधायक अनुज शर्मा ने सदन में परिवहन विभाग के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए सीधे मंत्री केदार कश्यप से सवाल किया कि आखिर यह कैसा ‘जादू’ है?

आंकड़ों की चोट : प्रदेश में जारी होने वाले कुल लाइसेंसों में से 10% लोग भी ट्रायल ट्रैक पर नहीं उतरते। सवाल बड़ा है – जब 90% आवेदकों ने गाड़ी छुई तक नहीं, तो उन्हें ‘फिट’ घोषित करने वाला वह ‘अदृश्य हाथ’ किसका है? रायगढ़ RTO इसी काले खेल का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है।

दलाल तो सिर्फ ‘टाइपिस्ट’ हैं, असली ‘रिमोट कंट्रोल’ वातानुकूलित केबिन में! – ​अक्सर कार्रवाई के नाम पर दो-चार बाहरी एजेंटों को हटाकर प्रशासन पल्ला झाड़ लेता है, लेकिन तकनीकी हकीकत कुछ और ही चीख रही है:

  • दलाल की सीमा : कोई भी एजेंट सिर्फ डेटा एंट्री कर सकता है और फीस भर सकता है। उसके पास सिस्टम में किसी को ‘पास’ करने की चाबी नहीं होती।
  • अधिकारी का ‘ब्रह्मास्त्र’ : मोटर व्हीकल एक्ट के तहत फाइनल अप्रूवल की शक्ति सिर्फ RTO या MVI (Motor Vehicle Inspector) के पास है। बिना अधिकारी के डिजिटल सिग्नेचर और आईडी-पासवर्ड के, कोई भी लाइसेंस प्रिंट नहीं हो सकता।
  • निष्कर्ष : अगर बिना ट्रायल लाइसेंस बन रहा है, तो गुनहगार बाहर खड़ा दलाल नहीं, बल्कि अंदर बैठा वह ‘साहब’ है जिसने अपनी लॉगिन आईडी बेच दी है।

रायगढ़ का ‘व्हाट्सएप कांड’ : रिश्वत की बात पर ‘ब्लॉक’, काम पर ‘ओके’! – भ्रष्टाचार का एक ताजा और शर्मनाक उदाहरण रायगढ़ के एक ग्रामीण की आपबीती से सामने आया है।

  • सेटिंग का खेल : ग्रामीण ने एजेंट के जरिए मोटी रकम पहुंचाई।
  • साहब का डर : जब काम में देरी हुई और ग्रामीण ने सीधे अधिकारी को व्हाट्सएप पर ‘रिश्वत’ का हवाला दिया, तो साहब ने ईमानदारी का ढोंग करते हुए उसे ब्लॉक कर दिया।
  • जादूई अप्रूवल : ब्लॉक करने के बावजूद, अधिकारी ने पर्दे के पीछे से उसी ग्रामीण को बिना ट्रायल ‘पास’ कर दिया। कुछ ही दिनों में बिना गाड़ी चलाए लाइसेंस घर पहुंच गया। यह साबित करता है कि अधिकारी को नियम टूटने का गम नहीं, बस अपनी पोल खुलने का डर था।

प्रशासन से सीधी मांग: अब ‘मोहरों’ पर नहीं, ‘वजीरों’ पर हो वार! – रायगढ़ की सड़कों पर बहने वाले खून के छींटे इन भ्रष्ट अफसरों की सफेद कमीजों पर भी हैं। अब वक्त केवल जांच का नहीं, ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का है:

  • सर्वर लॉग की फॉरेंसिक जांच : उस ग्रामीण के मामले में पोर्टल का लॉग चेक किया जाए कि आखिर किस अधिकारी की आईडी से बिना ट्रैक रिकॉर्ड के उसे ‘पास’ किया गया?
  • वीडियो फुटेज का मिलान : पिछले एक साल में जितने लाइसेंस जारी हुए, क्या उनके ट्रायल वीडियो उपलब्ध हैं? अगर नहीं, तो उन सभी को निरस्त कर संबंधित अफसर पर FIR दर्ज हो।
  • साजिश का खुलासा : व्हाट्सएप चैट और कॉल डिटेल्स खंगाली जाएं ताकि पता चले कि दलालों के तार सीधे किन बड़े चेहरों से जुड़े हैं।

नोट: यह खबर सिर्फ एक शुरुआत है। ‘RM24’ इस सिंडिकेट की हर परत उधेड़ता रहेगा। देखना यह है कि जिला प्रशासन ‘साहब’ के पासवर्ड की सुरक्षा करता है या मासूम जनता की जान की?

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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