रायपुर

विशेष रिपोर्ट : वेदांता नरसंहार – 23 मजदूरों की बलि के बाद ‘पावर’ के गलियारों में छिपी ‘फाइल’ का सच!…

रायपुर। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इतिहास में वेदांता (बालको) का बॉयलर ब्लास्ट अब तक का सबसे भयावह अध्याय बन चुका है। मलबे से निकलती लाशों का आंकड़ा 23 तक पहुँच गया है, लेकिन चीखें अब अस्पताल के वार्डों से निकलकर रायपुर के सत्ता केंद्र तक पहुँच चुकी हैं। यह सिर्फ एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि ‘सिस्टम’ और ‘मुनाफे’ की साठगांठ से हुआ संस्थागत कत्लेआम नजर आता है।

23 मौतें और ‘मुआवजे’ का झुनझुना : हादसे के बाद से ही दिल्ली और रायपुर के बीच संवेदनाओं की फाइलें दौड़ रही हैं। प्रधानमंत्री ने PMNRF से 2 लाख और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने 5 लाख रुपये के मुआवजे का ऐलान कर दिया है।

  • कड़वा सवाल : जिस प्लांट से वेदांता सालाना अरबों का मुनाफा कमाता है, वहां सुरक्षा मानकों में ऐसी कौन सी सेंध लगी कि 23 हंसते-खेलते परिवार उजड़ गए? क्या इन मजदूरों की जान की कीमत महज चंद लाख रुपये लगाकर चुकाई जा सकती है?

FIR की ‘सेंसिटिव’ मिस्ट्री : आखिर रायपुर में बैठा कौन है वो ‘ऊपर’ वाला? – इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा सनसनी पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के एक बयान ने मचाई है। बघेल ने सीधा आरोप लगाया है कि पुलिस FIR की कॉपी दबाकर बैठी है।

  • बघेल का तीखा हमला : “पत्रकारों को जवाब दिया जा रहा है कि फाइल ‘सेंसिटिव’ है और ‘ऊपर’ (रायपुर) से बात करने को कहा जा रहा है।”
  • सुलगता सवाल : क्या 23 जिंदगियों की राख से बड़ी कोई ‘डील’ हो रही है? क्या पुलिस प्रशासन पर उन ‘मित्रों’ को बचाने का दबाव है, जो चुनाव से लेकर फंड तक सरकार की रीढ़ होते हैं? आखिर FIR को सार्वजनिक करने में शासन के हाथ क्यों कांप रहे हैं?

कॉर्पोरेट कवच : अनिल अग्रवाल के बचाव में उतरा उद्योग जगत – जैसे ही खबर आई कि FIR में वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल का नाम शामिल है, रसूखदारों की लॉबी सक्रिय हो गई। सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल ने सोशल मीडिया पर अग्रवाल का बचाव करते हुए इसे “चिंताजनक” बताया।

  • जिंदल का तर्क: “बिना जांच के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति को नामजद करना गलत है।”
  • जनता का काउंटर: जब सुरक्षा चूक की वजह से सामूहिक नरसंहार होता है, तो ‘विशिष्ठ जिम्मेदारी’ (Vicarious Liability) के तहत क्या कंपनी के मालिक को जवाबदेह नहीं होना चाहिए? या फिर कानून की बेड़ियाँ सिर्फ छोटे सुपरवाइजरों और मजदूरों के लिए हैं?

ग्राउंड रिपोर्ट : सुरक्षा मानकों की धज्जियां – स्थानीय सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि बॉयलर की हालत लंबे समय से खराब थी।

  • लापरवाही का रिकॉर्ड : क्या प्लांट का सेफ्टी ऑडिट समय पर हुआ था?
  • आउटसोर्सिंग का खेल : आरोप लग रहे हैं कि लागत कम करने के चक्कर में कम अनुभवी मजदूरों और कच्चे माल का इस्तेमाल किया गया, जिसका नतीजा आज 23 चिताओं के रूप में सामने है।

सियासी बिसात पर मुख्य किरदार :

सक्ती जिले की यह त्रासदी अब एक लिटमस टेस्ट बन गई है। यदि 23 मौतों के बाद भी FIR को ‘सेंसिटिव’ बताकर रसूखदारों को अभयदान दिया गया, तो यह मान लिया जाएगा कि इस देश में मज़दूर की जान की कीमत किसी कॉर्पोरेट की बैलेंस शीट से ज्यादा कुछ नहीं है।

छत्तीसगढ़ पूछ रहा हैमुख्यमंत्री जी, FIR सार्वजनिक कब होगी? और वो ‘ऊपर’ बैठा रहस्यमयी व्यक्ति कौन है, जिसका नाम लेने से पुलिस भी डर रही है?

पूर्व में प्रकाशित खबर :

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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