बालोद

सागर अस्पताल में मेडिकल लापरवाही : जानलेवा साजिश या प्रशासन की नाकामी?

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद। स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दांता और अवैध चिकित्सा प्रथाओं का काला कारोबार अब महज चंद रुपयों का खेल नहीं रह गया है, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र बन चुका है, जिसकी चपेट में सबसे ज्यादा गरीब और साधारण नागरिक फंस रहे हैं। इसका खामियाजा यह हो रहा है कि कई मरीज अपनी जान और संपत्ति दोनों गंवा बैठे हैं। प्रभावित लोगों ने अपनी पीड़ा विभिन्न मंचों पर बयां की, लेकिन अस्पताल संचालक की कथित प्रभावशाली पहुंच और अधिकारियों से गहरे रिश्तों के कारण हर शिकायत कुचल दी गई। आखिरकार, कुछ पीड़ितों ने अपनी पहचान छिपाने की शर्त पर अपनी दर्दभरी कहानी साझा की, जिससे बालोद शहर के हृदय स्थल पर चल रहे सागर अस्पताल के कई काले राज सामने आ गए।

यह निजी स्वास्थ्य केंद्र मरीजों की जिंदगियों को दांव पर लगाने से बाज नहीं आता। फिर भी, यहां स्वास्थ्य विभाग की कोई सख्ती नजर नहीं आती, न ही कोई कड़ी कार्यवाही होती दिखाई देती है। इससे जिला स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल उठते हैं— क्या यह अस्पताल प्रबंधन से डर रहा है या ऊंचे पदों की कथित सेटिंग के कारण खुद को बेबस मान लेता है?

इसी क्रम में एक और गंभीर खुलासा हुआ है, जो चिंता का विषय है। शिकायतों के मुताबिक, डॉ. वीएस खोटेश्वर की पत्नी डॉ. मंजू (क्षत्रिय) खोटेश्वर (बीएएमएस – आयुर्वेद) और उनके सहकर्मी भोज ठाकुर ने खुद सिजेरियन जैसे उन्नत सर्जरी अंजाम दी हैं— इसकी तस्वीरें भी उपलब्ध हैं।

डॉ. वीएस खोटेश्वर की पत्नी डॉ. मंजू (क्षत्रिय) खोटेश्वर की बीएएमएस की डिग्री

सबसे डरावना पहलू यह है कि इन कथित सर्जरी के दौरान न तो कोई गायनेकोलॉजिस्ट, न एनेस्थीसियोलॉजिस्ट और न ही किसी सर्जिकल टीम की उपस्थिति थी। जबकि मेडिकल प्रोटोकॉल स्पष्ट है कि सिजेरियन जैसी प्रक्रिया के लिए विशेषज्ञों की पूरी यूनिट जरूरी होती है। ठोस साक्ष्यों से पुष्टि होती है। जबकि डॉ. मंजू (क्षत्रिय) खोटेश्वर एक आयुर्वेदिक प्रैक्टिशनर हैं, जबकि भोज ठाकुर के पास कोई मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता का प्रमाण नहीं पाया गया। अगर ये दावे सही साबित हुए, तो यह न सिर्फ चिकित्सा मानदंडों का उल्लंघन होगा, बल्कि इंसानी जिंदगियों के साथ खुला खिलवाड़ साबित होगा।

पीड़ितों की मानें तो अस्पताल में बिना योग्यता के डॉक्टरों द्वारा आपातकालीन सर्जरी करना आम बात है। बालोद स्वास्थ्य विभाग ने शिकायतों पर अब तक कोई संज्ञान नहीं लिया, जबकि कई मामले जानलेवा साबित हो चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी अवैध प्रथाएं न केवल मरीजों की सुरक्षा को खतरे में डालती हैं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती हैं।

“जिला प्रशासन को तत्काल जांच के आदेश देने चाहिए, ताकि ऐसी साजिशें रुक सकें। अन्यथा, गरीबों की जिंदगियां दांव पर लगती रहेंगी।”

स्वास्थ्य विभाग की चेतावनी के बावजूद सागर अस्पताल में अनियमितताओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। 15 अप्रैल 2025 को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी बालोद ने एक सख्त पत्र जारी कर अस्पताल प्रबंधन को तीन दिनों के अंदर कमियों को दूर करने और आवश्यक दस्तावेज जमा करने का आदेश दिया था। अन्यथा, नर्सिंग होम एक्ट के तहत कड़ी कार्यवाही की चेतावनी दी गई, जिसकी पूरी जिम्मेदारी अस्पताल संचालकों पर होगी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, इस निर्देश के बाद न सुधार के कोई स्पष्ट संकेत मिले और न ही कोई सख्त कदम उठाए गए।

जिले के पत्रकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले में 10 प्रमुख बिंदुओं पर शिकायत दर्ज कराई थी। इसी आधार पर 01 जनवरी 2025 को एक जांच दल सागर अस्पताल पहुंचा और निरीक्षण के बाद 21 जनवरी 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इस रिपोर्ट को जनता के सामने लाने में करीब 11 महीने का अनावश्यक विलंब हुआ। इस बीच, स्वास्थ्य विभाग की रफ्तार कछुए से भी सुस्त रही, जबकि अस्पताल में कथित उल्लंघन तेजी से बढ़ते गए।

पीड़ितों का कहना है कि ऐसी लापरवाही से मरीजों की जान खतरे में पड़ रही है। विशेषज्ञों ने मांग की है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषियों पर त्वरित कार्यवाही हो, वरना स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता दांव पर लग जाएगी। प्रशासन की इस चुप्पी ने सवाल खड़े कर दिए हैं— क्या ऊंची पहुंच कार्यवाही रोक रही है?

जाँच रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष (रिपोर्ट के अनुसार):

  • सागर हॉस्पिटल, गंजपारा, बालोद में किए जा रहे ऑपरेशन अधिकृत स्त्री रोग विशेषज्ञ द्वारा न होकर महिला चिकित्सक द्वारा किए जाने की जानकारी प्राप्त हुई।
  • संस्थान में कोई भी एम.बी.बी.एस. चिकित्सक पदस्थ नहीं पाया गया।
  • अस्पताल के दस्तावेजों में संचालक के अलावा किसी भी डॉक्टर का उल्लेख नहीं है और इसकी सूचना मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय को नहीं दी गई।
  • जाँच के दौरान अस्पताल संचालक व्हीलचेयर पर उपस्थित पाए गए।
  • मरीजों के अनुसार, संचालक की पत्नी डॉ. मंजू (बी.ए.एम.एस.) द्वारा ही नियमित राउंड और उपचार किया जाता है।
  • नर्सिंग होम एक्ट के अंतर्गत जारी पंजीयन प्रमाण पत्र प्रदर्शित नहीं किया गया।
  • कर्मचारियों के कार्य-समय और नाम की विधिवत जानकारी चस्पा नहीं की गई।

सागर अस्पताल में हो रही अनियमितताओं पर नियम ये है कि सभी मामले छत्तीसगढ़ राज्य उपचारागृह एवं रोगोपचार संस्थान अनुज्ञापन अधिनियम 2010 और उसके नियम 2013 (नर्सिंग होम एक्ट) का खुला उल्लंघन हैं। इस कानून के तहत दोषी अस्पतालों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है, अनुमति रद्द की जा सकती है और गंभीर मामलों में अस्पताल को सील कर दिया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह अधिनियम मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है, ताकि बिना योग्यता के चिकित्सा सेवाएं न दी जाएं।

फिर भी, जमीनी स्तर पर कोई कड़ी या त्वरित कार्यवाही नजर नहीं आ रही। ऐसी लापरवाही के बीच सवाल उठता है— क्या इंसानी जिंदगियों की कीमत महज कुछ कागजी फाइलों तक सिमट गई है? जब कानूनों का पालन न हो और प्रशासन खामोश बना रहे, तो यह चुप्पी किसकी रक्षा कर रही है? क्या ऊंची पहुंच वाले संचालकों को बचाने का खेल चल रहा है? पीड़ित परिवारों का दर्द बढ़ता जा रहा है, जबकि स्वास्थ्य तंत्र की नाकामी उजागर हो रही है। तत्काल बारीकी से जांच और सजा जरूरी है, वरना विश्वास पूरी तरह टूट जाएगा।

Feroz Ahmed Khan

संभाग प्रभारी : दुर्ग

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