ब्रेकिंग न्यूज़ : पत्थलगांव में शुरू हुई ‘मुफ्त डायटिंग योजना’! राशन माफियाओं के सौजन्य से गरीबों का ‘वजन घटाओ’ अभियान…

पत्थलगांव (जशपुर)। सरकार ने तो गरीबों का पेट भरने के लिए मुफ्त राशन की योजना बनाई थी, लेकिन पत्थलगांव के राशन दुकानदारों ने एक कदम आगे बढ़कर जनता की ‘फिटनेस’ का जिम्मा भी उठा लिया है! जी हां, यहां के राशन दुकानदार इतने दूरदर्शी और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हैं कि वे कभी शक्कर गायब कर देते हैं तो कभी चना, ताकि गरीबों को मधुमेह (Diabetes) और अपच जैसी बीमारियां ही न हों।
और अगर कभी दुकान में सारा सामान गलती से आ भी जाए, तो संचालक महोदय खुद ‘अंडरग्राउंड’ होकर ‘राष्ट्रीय अवकाश’ घोषित कर देते हैं। आखिर गरीब कार्ड धारकों को महीने के 15 दिन दुकान के चक्कर लगवाकर रोज सैर (Morning/Evening Walk) करवाने का इससे अच्छा बहाना और क्या हो सकता है?
शिकायत निवारण का ‘अल्ट्रा-फास्ट होम डिलीवरी’ सिस्टम – इस शहर के खाद्य अधिकारी (Food Officer) तो ‘कस्टमर केयर’ के मामले में बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को भी मात दे रहे हैं। अगर कोई नासमझ नागरिक इस ‘शानदार व्यवस्था’ के खिलाफ फोन पर शिकायत करने की गुस्ताखी करता है, तो अधिकारी कार्रवाई करने का कष्ट नहीं उठाते। वे तुरंत शिकायतकर्ता का नाम और नंबर राशन दुकान संचालक को ‘फॉरवर्ड’ कर देते हैं। इसे कहते हैं विभागों के बीच गजब का ‘कोऑर्डिनेशन’!
VIP ट्रीटमेंट की होम डिलीवरी : शिकायत का डेटा मिलते ही राशन दुकानदार सीधे शिकायतकर्ता के घर पहुंच जाते हैं। वहां वे बड़े ही प्रेम से गुंडागर्दी करते हुए “राशन कार्ड निरस्त करवाने” और “भूखे मारने” का आशीर्वाद देते हैं।
सत्ता का नशा और ‘मलाई’ का समाजवाद – आम जनता इस ‘गुंडाराज’ के आगे बेबस क्यों है? क्योंकि जिस दुकान से सबसे ज्यादा ‘आशीर्वाद’ (प्रताड़ना) मिल रहा है, उसके संचालक कोई आम आदमी नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल (बीजेपी) के एक ‘सुसंस्कृत और रसूखदार’ नेता हैं। भई, जब दुकान संचालक ही सरकार का नुमाइंदा हो, तो फिर कानून-वानून की छोटी-मोटी बातें कौन करता है? ऊपर से लेकर नीचे तक कमीशन की ‘मलाई’ इतने समान रूप से बांटी जा रही है कि ‘समाजवाद’ का असली सपना तो जैसे पत्थलगांव के खाद्य विभाग में ही साकार हो रहा है।
ग्राउंड जीरो का ‘गौरव’ : कांपते हाथ और डरी हुई आंखें – इस महान व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि हमारी टीम को तब दिखी, जब एक पीड़ित बुजुर्ग महिला से बात हुई। सिस्टम ने बड़ी ही सफलतापूर्वक एक बेबस बुजुर्ग के अंदर ऐसा खौफ भर दिया है कि उन्हें अब राशन से ज्यादा नेताजी की गालियों का डर सता रहा है।
“बाबू, बहुत परेशान हैं… पर हमारा नाम मत छापना… नहीं तो राशन दुकान वाला घर आकर गाली-गलौज करेगा, मारपीट पर उतारू हो जाएगा। उससे अच्छा तो यही होगा कि हम कहीं और से अनाज मांग कर खा लें।”
जोरदार तालियां बजनी चाहिए ऐसे प्रशासन के लिए, जिसने उम्र के इस पड़ाव पर एक महिला को इतना ‘आत्मनिर्भर’ बना दिया है कि वह अपने हक का राशन मांगने के बजाय भीख मांगने को ज्यादा सुरक्षित मान रही है!
प्रशासन से कुछ ‘विनम्र’ सवाल : कुंभकर्णी नींद में सो रहे प्रशासन से जनता अब सिर्फ कुछ छोटे-मोटे स्पष्टीकरण चाहती है:
- क्या जशपुर कलेक्टर महोदय इन ‘राशन माफियाओं’ को उनके शानदार फिटनेस अभियान और होम-डिलीवरी (धमकी) सेवाओं के लिए सम्मानित करेंगे?
- क्या खाद्य विभाग के अधिकारियों को शिकायतकर्ताओं का डेटा लीक करने के लिए ‘बेस्ट सेल्समैन’ का अवॉर्ड मिलेगा?
- सत्ताधारी दल अपने इस ‘तेजस्वी’ नेता का प्रमोशन कब कर रहा है, ताकि वे पूरे जिले का राशन अकेले डकार सकें?
फिलहाल, पत्थलगांव की जनता को राशन तो नहीं मिल रहा, लेकिन ‘इंसाफ’ के नाम पर तारीखें और ‘मुफ्त गालियां’ भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं। डर के साए में जी रहे इन परिवारों को अब बस यह तय करना है कि पहले भूख से लड़ें या इन रसूखदार ‘समाजसेवियों’ की गुंडागर्दी से!




