चुनावी रणभूमि में ‘छत्तीसगढ़िया’ धमक : पसीने से लिखी जा रही सियासत की नई इबारत…

रायपुर। देश के किसी भी कोने में चुनावी बिगुल फुंके, अब रणनीतिक बिसात बिछाने के लिए ‘छत्तीसगढ़ मॉडल’ की मांग बढ़ गई है। बीते कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ के नेताओं ने अपनी मेहनत और चुनावी प्रबंधन से राष्ट्रीय राजनीति में अपना कद इतना ऊँचा कर लिया है कि अब हाईकमान के लिए ये ‘संकटमोचक’ बन कर उभरे हैं।
पसीने से तरबतर कुर्ते और मिशन मोड : असम की तपती गर्मी हो या बंगाल की चुनौतीपूर्ण गलियां, छत्तीसगढ़ के नेताओं की मौजूदगी हर जगह दर्ज की जा रही है। इन नेताओं के चेहरे की थकान, धंसी हुई आंखें और पसीने से भीगी शर्ट इस बात की गवाही देती है कि ये नेता सिर्फ हाजिरी लगाने नहीं, बल्कि ‘हाड़-तोड़’ मेहनत करने पहुंचे हैं।
- रणनीति का लोहा : चुनाव प्रबंधन से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक, छत्तीसगढ़ी नेताओं ने अपनी कार्यशैली से राष्ट्रीय नेतृत्व को प्रभावित किया है।
- नतीजों की कसौटी : हालांकि हार-जीत का अंतिम फैसला 4 मई को होगा, लेकिन इन नेताओं ने जिस तरह से पसीना बहाया है, उसने पार्टी के भीतर उनकी साख पर मुहर लगा दी है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष : दोनों का बढ़ता कद – छत्तीसगढ़ के नेताओं की पूछपरख किसी एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राजनीतिक परिदृश्य में यह बदलाव देखा जा रहा है :
- कांग्रेस का ‘भरोसा’ : पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आज भी पार्टी के लिए सबसे बड़े रणनीतिकारों में से एक बने हुए हैं। उनके साथ-साथ सत्ताधारी दल के अन्य दिग्गजों ने झारखंड और बिहार के चुनावों में भी अपनी संगठन क्षमता का लोहा मनवाया था।
- भाजपा की सक्रियता : खेमे से भी कई चेहरे लगातार दूसरे राज्यों में अहम जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। कुल मिलाकर, दिल्ली के गलियारों में अब छत्तीसगढ़ के फीडबैक को गंभीरता से लिया जाता है।
“नतीजे मेहनत का प्रमाण पत्र देंगे या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन यह तय है कि राष्ट्रीय राजनीति के नक्शे पर छत्तीसगढ़ के नेताओं का ‘कद’ अब उनकी मेहनत की बदौलत काफी बड़ा हो चुका है।”
इससे पहले भी झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में छत्तीसगढ़ी नेताओं के परिश्रम ने हाईकमान की वाहवाही लूटी थी। अब असम और बंगाल के चुनावी नतीजे यह तय करेंगे कि इस ‘मेहनत’ को जीत का सेहरा मिलता है या सिर्फ डायरी में दर्ज होने वाली शाबाशी। पर एक बात साफ है – छत्तीसगढ़ अब सिर्फ धान का कटोरा नहीं, बल्कि सियासत का पावर सेंटर भी बन रहा है।




