‘प्लास्टिक’ का दोहरा चरित्र : चाय की चुस्की पर ‘आफत’, पव्वों पर ‘राहत’!…

रायपुर। राजधानी की सड़कों पर आजकल एक अद्भुत सर्कस चल रहा है। एक तरफ नगर निगम के ‘सिपाही’ किसी गरीब की चाय की थड़ी पर छापा मारकर ऐसे दहाड़ते हैं जैसे उन्होंने कोई परमाणु बम पकड़ लिया हो- जुर्म क्या है? “प्लास्टिक का डिस्पोजल!” दूसरी तरफ, सरकारी शराब दुकानों के बाहर प्लास्टिक (PET) बोतलों का ऐसा अंबार लगा है, मानो पर्यावरण संरक्षण की अर्थी वहीं से उठने वाली हो।

सरकार का ‘अनोखा’ विज्ञान : आम जनता हैरान है कि जो प्लास्टिक चाय की दुकान पर ‘पर्यावरण का दुश्मन’ है, वही शराब की दुकान में घुसते ही ‘पवित्र और सुरक्षित’ कैसे हो जाता है?
- तर्क नंबर 1 (सुरक्षा): “कांच की बोतल से सिर फूटते हैं।”
- व्यंग्य : वाह! यानी अब सरकार चाहती है कि लोग शांति से प्लास्टिक की बोतलें गटकें और फिर उन्हीं बोतलों को नालों में फेंक दें ताकि धीरे-धीरे पूरे शहर का गला घुट जाए। सिर न फूटे, चाहे पर्यावरण का दम घुट जाए!
- तर्क नंबर 2 (लागत) : “परिवहन सस्ता पड़ता है।”
- व्यंग्य : मुनाफे का गणित इतना सटीक है कि उसमें ‘मिट्टी’ और ‘भविष्य’ के लिए कोई जगह ही नहीं बची।
कबाड़ियों की ‘दिवाली’ बुझी, नालों में ‘प्लास्टिक’ की होली – पहले कांच की खाली बोतल एक ‘करेंसी’ थी। उसे बेचकर गरीब अपना पेट पालता था। अब आलम यह है:
”साहब, पहले कांच की खाली बोतल कबाड़ी को दो, तो चार पैसे मिलते थे। अब ये प्लास्टिक की बोतलें कबाड़ी भी नहीं लेता। अब ये बोतलें सीधे नालों में जाकर ‘जलभराव’ का वीआईपी इंतजाम कर रही हैं।”
रोजगार का एनकाउंटर : जो कबाड़ बीनने वाले कांच की बोतलों के जरिए रीसाइक्लिंग की अनकही चेन चला रहे थे, सरकार ने एक झटके में उनकी रोजी-रोटी का ‘प्लास्टिकीकरण’ कर दिया है।
सिस्टम का चश्मा : पावरफुल के लिए ‘छूट’, मजबूर के लिए ‘लूट’ – यह देखना दिलचस्प है कि प्रशासन की ‘सख्ती’ का सारा जोर छोटे दुकानदारों पर ही चलता है। क्या सरकार को इन लाखों प्लास्टिक बोतलों से निकलते माइक्रोप्लास्टिक की महक नहीं आती?
- खेतों में प्लास्टिक
- नदियों में प्लास्टिक
- नालों में प्लास्टिक लेकिन साहब, इसे ‘विकास’ कहिए, क्योंकि इसमें ‘रेवेन्यू’ का नशा जो शामिल है!
बड़ा सवाल : क्या पर्यावरण की बलि सिर्फ गरीब ही देगा? – अगर सिंगल यूज प्लास्टिक वास्तव में जहर है, तो फिर शराब दुकानों पर यह अमृत की तरह क्यों बंट रहा है? क्या कानून की नजर सिर्फ चाय के कप तक सीमित है?
रायपुर की सड़कों पर बिखरी ये प्लास्टिक की बोतलें सरकार की नीतियों का असली चेहरा दिखा रही हैं। एक तरफ पर्यावरण बचाने का ढोंग और दूसरी तरफ प्लास्टिक को सरकारी संरक्षण। जनता देख रही है कि ‘स्वच्छ भारत’ के नारे के नीचे प्लास्टिक की शराब बोतलें किस तरह दबी हुई हैं।
अब इंतजार है उस दिन का, जब सरकार को समझ आएगा कि कांच टूटता है तो चुभता है, लेकिन प्लास्टिक तो पूरी सभ्यता को ही निगल जाता है!



