2 करोड़ का ‘हाई-टेक स्टूडियो’ या सत्ता का डिजिटल वॉर-रूम? रायगढ़ में पत्रकारों की अनदेखी और इन्फ्लुएंसर्स पर मेहरबानी के सियासी मायने…

रायगढ़ | विशेष रिपोर्ट / सियासत में जब किसी वर्ग विशेष पर अचानक सरकारी मेहरबानियों की बारिश होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि पर्दे के पीछे जनहित नहीं, बल्कि सियासी नैरेटिव की कोई गहरी बिसात बिछाई जा चुकी है। रायगढ़ में इन दिनों ठीक यही पटकथा लिखी जा रही है। वित्त मंत्री ओपी चौधरी द्वारा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए 2 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक स्टूडियो निर्माण की घोषणा ने प्रशासनिक गलियारों से लेकर मीडिया जगत तक तीखी बहस छेड़ दी है। सतह पर युवाओं के सशक्तीकरण जैसा दिखने वाला यह फैसला, तह में जाते ही प्राथमिकताओं के असंतुलन और रणनीतिक पीआर की बू देने लगता है।
10 साल की जद्दोजहद बनाम रातों-रात 2 करोड़ : प्राथमिकताओं का विरोधाभास : इस घोषणा ने रायगढ़ के जमीनी पत्रकारों के उस घाव को कुरेद दिया है, जो पिछले एक दशक से अपनी बुनियादी जगह के लिए सत्ता और व्यवस्था के चक्कर काट रहे हैं। दशकों से धूप, धूल और जोखिम के बीच जनता के सरोकारों को उठाने वाले पत्रकारों के लिए एक प्रेस क्लब भवन तक मयस्सर नहीं हो सका। लंबी लड़ाई, राजनीतिक आश्वासनों और दो अलग-अलग सरकारों की कछुआ चाल के बाद महज़ 50 लाख रुपये (कांग्रेस शासन में 25 लाख और भाजपा में 25 लाख) स्वीकृत हुए। विडंबना देखिए कि उसकी पहचान भी ‘प्रेस क्लब’ के बजाय ‘सामुदायिक भवन’ में तब्दील कर दी गई, और वह ढांचा भी वर्षों से अधूरा पड़ा है।
दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर चंद सेकंड्स के वीडियो बनाने वालों के लिए बिना किसी लंबी मांग या प्रक्रिया के, पलक झपकते ही 2 करोड़ रुपये का राजकोषीय आवंटन कर दिया जाता है। सवाल उठना लाजिमी है—जो सत्ता स्वतंत्र और जवाबदेह पत्रकारिता को एक अदद छत देने में एक दशक लगा देती है, वही डिजिटल कंटेंट के लिए इतनी त्वरित उदारता क्यों दिखा रही है?
सरकारी खर्च पर फाइव-स्टार आवभगत : जनसंपर्क या ‘डिजिटल कैडर’ का निर्माण? : मामला केवल 2 करोड़ के स्टूडियो तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ समय से प्रशासन और सत्ताधारी दल द्वारा चुनिंदा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को दिया जा रहा तरजीही इलाज चर्चा का विषय है। बस्तर के प्रायोजित सरकारी टूर से लेकर महंगे होटलों में मंत्रियों के साथ निजी संवाद और आवभगत—यह सब किस नीतिगत ढांचे के तहत हो रहा है?
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि यह कवायद किसी रचनात्मक क्रांति के लिए नहीं, बल्कि आगामी चुनावों के मद्देनजर जनता के पैसे से तैयार किया जा रहा एक ‘डिजिटल वॉर-रूम’ है। पारंपरिक मीडिया जब तीखे सवाल पूछने से बाज नहीं आता, तब सत्ता ऐसे नए मंचों की तलाश करती है जो बिना सवाल किए केवल उनके प्रोपेगैंडा को एल्गोरिदम की मदद से जनता के फीड तक पहुंचा सकें।
‘सोने का पिंजरा’ और निष्पक्षता का संकट : इस घोषणा पर सिर्फ मुख्यधारा का मीडिया ही आशंकित नहीं है, बल्कि ज़मीनी मेहनत और मौलिकता के दम पर पहचान बनाने वाले स्वतंत्र क्रिएटर्स भी असहज हैं। बौद्धिक हलकों में यह सीधा सवाल उठ रहा है: क्या सरकारी पैसे, सरकारी लाइट और सरकारी कैमरों से लैस स्टूडियो में बैठकर सत्ता की नीतियों, भ्रष्टाचार या स्थानीय बदहाली पर अंगुली उठाई जा सकेगी?
यह 2 करोड़ का स्टूडियो किसी स्वतंत्र मंच से अधिक एक ‘सोने का पिंजरा’ नज़र आता है, जहां प्रवेश की अघोषित शर्त ही सत्ता की चारण-संस्कृति को स्वीकार करना होगी। स्वतंत्र आवाजों को संसाधन देकर उन्हें व्यवस्था का अघोषित जनसंपर्क अधिकारी बना देना, किसी भी लोकतांत्रिक विमर्श के लिए घातक संकेत है।
रायगढ़ का यह घटनाक्रम साफ संदेश देता है- जब सत्ता जनता की गाढ़ी कमाई से किसी को मुफ्त ‘मंच’ मुहैया कराती है, तो बदले में अक्सर उसकी ‘ज़ुबान’ और ‘निष्पक्षता’ गिरवी रख ली जाती है।




