कोयले के खूनी खेल में SECL, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का घिनौना गठजोड़: अस्पताल पर बुलडोजर चलाकर ली बुजुर्ग महिला की जान, FIR कराने के बजाय नेताओं ने 6 लाख में कराया लाश का ‘सौदा’!..

- मौत के बाद पर्ची पर ‘बैक टाइम’ रेफर और ECG का खौफनाक फर्जीवाड़ा उजागर; न SECL ने बैठाई कोई जांच, न नेताओं ने दर्ज कराई FIR – चंद रुपयों में दफन हुआ बुजुर्ग महिला की मौत का सच…
विशेष खोजी रिपोर्ट: हरदीबाजार / कोरबा (छत्तीसगढ़) कोरबा जिले के हरदीबाजार क्षेत्र में कोयला खनन के मुनाफे की हवस में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL), जिला प्रशासन और जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधियों का ऐसा वीभत्स और संवेदनहीन चेहरा सामने आया है, जिसने समूचे तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। SECL ने खदान विस्तार की अंधी दौड़ में हरदीबाजार के पक्के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) भवन पर बर्बरतापूर्वक बुलडोजर चलवा दिया। प्रशासन ने भी आंख मूंदकर इस पूरे अस्पताल को तहसील कार्यालय के एक संकरे, बदहाल और बुनियादी सुविधाओं से महरूम कमरे में धकेल दिया-जहां न पीने का पानी था, न बोरवेल, न जरूरी जीवन रक्षक उपकरण और न ही पर्याप्त दवाइयां।
SECL और प्रशासन द्वारा खड़े किए गए इसी बदहाल ‘अस्पताल’ में ग्राम रेंकी निवासी 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला भोगा बाई की तड़प-तड़प कर जान चली गई। लेकिन इस घटना के बाद जो खेल खेला गया, वह और भी शर्मनाक है- मौत होते ही डॉक्टर ने खुद को बचाने के लिए पर्ची पर ‘बैक टाइम’ डालकर रेफर और ईसीजी का फर्जीवाड़ा रचा, तो दूसरी तरफ जनता के वोट से चुने गए सफेदपोश जनप्रतिनिधियों ने FIR दर्ज कराने के बजाय SECL से 6 लाख रुपये का मुआवजा दिलवाकर पूरे मामले को रफा-दफा कर दिया।
3 घंटे में सांसें थमीं, फिर पर्ची पर रचा गया ‘बैक टाइम’ रेफर का खेल – ओपीडी पर्ची (पंजी क्र. 8223, ओपीडी क्र. 2803) और मृतका के नाती रघुवीर पटेल के बयानों से अस्पताल के भीतर रचे गए फर्जीवाड़े की पूरी परतें खुल गई हैं:
- दोपहर 12:30 बजे अस्पताल आमद: तालाब से नहाकर लौटने के बाद हाथ-पैर में दर्द व कमजोरी की शिकायत पर भोगा बाई को उनका नाती दोपहर 12:30 बजे हरदीबाजार के इस अस्थाई स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचा।
- सामान्य रिपोर्ट, लेकिन इलाज के नाम पर खानापूर्ति: पर्ची के मुताबिक महिला का बीपी (120/90) और शुगर (128 mg/dl) सामान्य था। ड्यूटी डॉक्टर राजेंद्र पाल ने मात्र सलाइन बोतल (Inj. RL, Cobalamin, Diclo, Neurobion) चढ़ाने का निर्देश दिया।
- स्टाफ नदारद, तड़पती रही मरीज: ड्रिप चढ़ाने के बाद न कोई डॉक्टर मरीज को देखने आया और न ही ड्यूटी नर्स। टूटे-फूटे अस्पताल के माहौल और व्यवस्था के अभाव में महिला की तबीयत बिगड़ती चली गई।
- 3:30 बजे मौत, फिर ‘बैक टाइम’ की बाजीगरी: दोपहर 3:30 बजे महिला की सांसें थम गईं। मरीज के दम तोड़ते ही अपनी गर्दन फंसती देख डॉक्टर ने घबराहट में पर्ची के पीछे “Adv. ECG” लिखा और सामने “Refer to DH Korba” घसीट दिया। यह सब ‘बैक टाइम’ (यानी मौत से पहले का समय दिखाकर) इस तरह दर्शाने की कोशिश की गई मानो मरीज को जीवित रहते ही जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया था। जब केंद्र में ईसीजी मशीन ही नहीं थी, तो मौत के बाद कागजों पर ईसीजी का बहाना बनाकर परिजनों को धमकाने और गुमराह करने का प्रयास किया गया।
FIR दर्ज कराने के नाम पर जनप्रतिनिधियों का दोगलापन: इंसाफ दिलाने के बजाय बने ‘डील मेकर’ – एक गरीब बुजुर्ग महिला की संदिग्ध और असमय मौत के बाद जिन जनप्रतिनिधियों को पीड़ित परिवार के साथ खड़े होकर थाने का घेराव करना चाहिए था, उनकी भूमिका बेहद शर्मनाक रही:
- शून्य FIR तक नहीं कराई: घटना के बाद स्थानीय विधायक, जिला पंचायत उपाध्यक्ष, हरदीबाजार सरपंच और रेंकी सरपंच मौके पर पहुंचे, लेकिन किसी ने भी SECL प्रबंधन या लापरवाह डॉक्टर के खिलाफ थाने में लिखित शिकायत या गैर-इरादतन हत्या की FIR दर्ज कराने की जहमत नहीं उठाई।
- 6 लाख में लाश का मोलभाव: जनप्रतिनिधि कानून के रास्ते चलने के बजाय SECL प्रबंधन के साथ बंद कमरे में बैठ गए। पीड़ित परिवार के दुख का फायदा उठाकर ₹6 लाख की सहायता राशि पर समझौता करा दिया गया।
- कानूनी लिखा-पढ़ी को दफनाया: सरपंच ने खुद फोन पर कबूल किया कि मामले में कोई लिखित शिकायत नहीं हुई है। जनप्रतिनिधियों ने कानून की चौखट तक बात पहुंचने ही नहीं दी, ताकि उनके औद्योगिक आकाओं की साख बची रहे और मामला थाने-कचहरी से दूर रहे।
SECL प्रबंधन की ‘जांच’: न कमेटी बनी, न कोई सस्पेंड हुआ—बस 6 लाख फेंककर पल्ला झाड़ा! – इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल SECL की जवाबदेही पर है:
- आखिर क्या जांच करी SECL ने?: SECL प्रबंधन ने इस बात की कोई प्रशासनिक या तकनीकी जांच नहीं कराई कि बिना वैकल्पिक सर्वसुविधायुक्त अस्पताल तैयार किए पक्के स्वास्थ्य केंद्र पर बुलडोजर चलाने का आदेश किस अधिकारी ने दिया था?
- दोषियों पर क्या कार्रवाई हुई?: क्या अस्पताल ढहाने वाले किसी अफसर पर विभागीय जांच बैठी? क्या बदहाल तहसील कार्यालय में स्वास्थ्य केंद्र को धकेलने के लिए कोई जिम्मेदार ठहराया गया? जवाब है—कुछ नहीं!
- गलती मानी, पर जुर्म छुपाया: SECL ने अपनी गलती स्वीकार तो की, लेकिन जांच कराने के बजाय 6 लाख रुपये की मुआवजा राशि फेंककर मामले को दबा दिया। यह राशि इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि SECL प्रबंधन जानता था कि मौत अस्पताल की बदहाली और उनकी बुलडोजर नीति के कारण हुई है।
पुख्ता सबूत: ऑडियो टेप में खुला सच
- सरपंच का कबूलनामा: हरदीबाजार सरपंच ने बातचीत में साफ कहा कि खदान अधिग्रहण के चक्कर में SECL ने पक्का अस्पताल बलपूर्वक तुड़वाया था। तहसील के कमरे में न बोरवेल था, न पानी और न ही सुविधाएं। इसी अव्यवस्था से महिला की जान गई, जिसके बाद विधायक और जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप पर SECL ने गलती मानते हुए 6 लाख रुपये दिए और कोई लिखा-पढ़ी नहीं कराई गई।
- नाती रघुवीर पटेल का दर्द: मृतका के नाती ने कहा कि अस्पताल में दवाओं और इलाज का टोटा था। डॉक्टर ने मौत के बाद रेफर का कागज थमाया। SECL द्वारा अपनी गलती मानते हुए 6 लाख रुपये देने और घर में क्रिया-कर्म चलने के कारण वे थाने में शिकायत दर्ज नहीं करा सके।
सीधे और तीखे सवाल: कटघरे में SECL, प्रशासन और जनप्रतिनिधि
- जनप्रतिनिधियों से: जनता ने आपको अपना रहनुमा चुना था या SECL के जुर्म को दबाने वाला बिचौलिया? पीड़ित परिवार को न्याय और FIR दिलाने के बजाय 6 लाख रुपये में समझौता कराकर कानूनी कार्रवाई को किसने रोका?
- SECL प्रबंधन से: बिना वैकल्पिक व्यवस्था के अस्पताल तोड़ने वाले अधिकारियों पर अब तक एफआईआर क्यों नहीं हुई? 6 लाख रुपये बांटकर क्या एक बुजुर्ग महिला की जान की कीमत चुकाई जा सकती है?
- स्वास्थ्य विभाग से: महिला के दम तोड़ने के बाद पर्ची पर ‘बैक टाइम’ डालकर रेफर और ईसीजी लिखने वाले डॉक्टर राजेंद्र पाल पर जालसाजी और चिकित्सीय लापरवाही का केस कब दर्ज होगा?
- जिला प्रशासन से: क्या तहसील कार्यालय के एक बदहाल कमरे में बिना पानी और उपकरणों के इंसानों का इलाज कराना प्रशासनिक हत्या की श्रेणी में नहीं आता?
हरदीबाजार की यह घटना साफ बताती है कि जब कोयले के मुनाफे, प्रशासनिक कायरता और राजनीतिक दलाली का गठजोड़ होता है, तो गरीब जनता की जान महज एक समझौते का कागज बनकर रह जाती है।




