महाघोटाले पर ‘तबादला’ पुरस्कार और सच लिखने वालों पर ‘सिंडिकेट’ का वार : क्या यही है छत्तीसगढ़ का ‘जीरो टॉलरेंस’?….

- बलरामपुर में ₹4.30 करोड़ की वित्तीय अनियमितता सिद्ध होने के बाद भी निलंबन नहीं, सिर्फ ट्रांसफर; दूसरी ओर भ्रष्टाचार उजागर करने वाले पत्रकारों व एक्टिविस्टों को धमकियां और चरित्र हनन- सरगुजा से सारंगढ़ तक सड़क पर उतरा मीडिया जगत…
विशेष खोजी व विश्लेषणात्मक रिपोर्ट | रायपुर / बलरामपुर / बिलासपुर / सारंगढ़
छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक जवाबदेही और ‘जीरो टॉलरेंस’ के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत इन दिनों सवालों के घेरे में है। राज्य में एक ऐसा दोहरा तंत्र देखने को मिल रहा है जहां करोड़ों रुपये के सरकारी धन के गबन के प्रमाणित मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों को निलंबन या जेल भेजने के बजाय सुरक्षित तबादले का ‘इनाम’ थमा दिया जाता है, वहीं दूसरी ओर शासन-प्रशासन के इन घपलों और घोटालों को उजागर करने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और डिजिटल एक्टिविस्टों पर संगठित गिरोहों के जरिए व्यक्तिगत हमले, चरित्र हनन और धमकियों का खुला खेल चल रहा है।
बलरामपुर-रामानुजगंज में सामने आया शिक्षा विभाग का 4.30 करोड़ रुपये का घोटाला और उसके बाद सरगुजा से लेकर बिलासपुर और सारंगढ़-बिलाईगढ़ तक पत्रकारों के खिलाफ बना भय का माहौल यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि तंत्र में सवाल पूछने वालों को कुचलने और सरकारी खजाने में सेंध लगाने वालों को बचाने की प्रवृत्ति किस कदर हावी हो चुकी है।
1. बलरामपुर का 4.30 करोड़ का शिक्षा घोटाला: जांच में अपराध प्रमाणित, फिर भी ‘सजा’ के नाम पर महज तबादला,- बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में हुआ वित्तीय अनियमितता का मामला इस बात का प्रमाण है कि किस तरह बड़े आर्थिक घोटालों को प्रशासनिक फाइलों में दबाने की कोशिश की जाती है।
मामले का पूरा घटनाक्रम
- गबन का दायरा: जिले के प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) मनीराम यादव के कार्यकाल के दौरान करीब 4.30 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता और गबन का मामला सामने आया था।
- जांच रिपोर्ट में पुष्टि: इस मामले में बाकायदा विभागीय जांच कराई गई। जांच पूरी होने के बाद जो रिपोर्ट शासन को सौंपी गई, उसमें गंभीर वित्तीय गड़बड़ियों और अनियमितताओं की पुष्टि की गई।
- कठोर कार्रवाई के बजाय ‘सुरक्षित एग्जिट’: सामान्य प्रशासनिक नियमों के तहत यदि किसी अधिकारी के खिलाफ करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितता की विभागीय जांच में पुष्टि होती है, तो उसे तत्काल निलंबित कर उसके खिलाफ विभागीय जांच (DE) संस्थित की जाती है और आपराधिक गबन की धाराओं में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई जाती है। परंतु, यहां ठीक उलट हुआ।
मंत्रालय से जारी आदेश और ‘अजीबोगरीब’ मेहरबानी
छत्तीसगढ़ शासन, स्कूल शिक्षा विभाग मंत्रालय (महानदी भवन, नवा रायपुर अटल नगर) द्वारा जारी आदेश क्रमांक ESTB-102(1)/585/2026/20-3 (दिनांक 28/09/2026) के तहत उप सचिव द्वारा राज्यपाल के नाम से स्थानांतरण आदेश जारी किया गया:
- मनीराम यादव (मूल पद प्राचार्य): इन्हें प्रभारी DEO बलरामपुर-रामानुजगंज के पद से हटाकर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (शा.उ.मा.वि.) परसा, विकासखंड अंबिकापुर (जिला सरगुजा) में प्राचार्य के पद पर पदस्थ कर दिया गया।
- नरेन्द्र कुमार निरापुरे (प्राचार्य): शासकीय हाई स्कूल कोराचा, विकासखंड मानपुर (जिला मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी) से स्थानांतरित कर इन्हें बलरामपुर-रामानुजगंज का नया प्रभारी DEO नियुक्त किया गया।
जनता और प्रशासनिक हलकों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या जनता के 4.30 करोड़ रुपये की लूट की सजा केवल एक जिले से दूसरे जिले का तबादला है? क्या शासन इस जांच रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में डालकर मामले को रफा-दफा करने की तैयारी में है?
2. सच उजागर करने वालों पर संगठित सिंडिकेट का वार: चरित्र हनन और परिवार तक हमले
एक तरफ जहां भ्रष्ट तंत्र पर कार्रवाई से हाथ खींचे जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जो पत्रकार, आरटीआई एक्टिविस्ट और सजग नागरिक इन कारनामों को जनता के सामने ला रहे हैं, उन्हें सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।
सरगुजा-अंबिकापुर: सवालों का जवाब देने के बजाय निजी जीवन पर प्रहार –हाल ही में सहायक प्राध्यापक एवं एक्टिविस्ट अकिल अहमद अंसारी द्वारा जारी एक खुले पत्र ने पूरे प्रदेश के बौद्धिक और पत्रकारिता जगत को झकझोर कर रख दिया। पत्र के माध्यम से उजागर हुआ कि जब भी कोई सजग नागरिक या पत्रकार सरगुजा संभाग में प्रशासनिक भ्रष्टाचार, घोटालों या जनहित से जुड़े गंभीर मुद्दों पर तथ्यात्मक सवाल उठाता है, तो तंत्र सवालों का जवाब देने की जगह उस व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से तबाह करने में जुट जाता है।
- हमले का घिनौना तरीका: संबंधित व्यक्ति के निजी जीवन, चरित्र, परिवार, आजीविका और यहां तक कि धर्म को निशाना बनाया जा रहा है।
- ट्रोल आर्मी और धमकियां: सोशल मीडिया पर फेक नैरेटिव गढ़कर, पेड ट्रोलिंग कराकर और असामाजिक तत्वों के जरिए जान से मारने व झूठे मामलों में फंसाने की धमकियां देकर पत्रकारों की आवाज दबाने का सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है।
पूरे प्रदेश में फूटा पत्रकारों का आक्रोश: बिलासपुर से सारंगढ़ तक ज्ञापन और चेतावनियां – पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर ‘अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति’ (ABPSS) ने मोर्चा खोल दिया है। राज्य के अलग-अलग जिलों में पुलिस कप्तानों के जरिए पुलिस महानिदेशक (DGP) और राज्य सरकार को स्पष्ट अल्टीमेटम दिया गया है।
बिलासपुर: उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने एसपी रजनेश सिंह को सौंपा ज्ञापन
बिलासपुर में समिति के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह से मुलाकात कर डीजीपी के नाम ज्ञापन सौंपा।
- प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व: राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राकेश प्रताप सिंह परिहार, प्रदेश अध्यक्ष गोविन्द शर्मा, राष्ट्रीय पदाधिकारी अमित संतवानी एवं उत्पल सेनगुप्ता ने संयुक्त रूप से मामले की गंभीरता को रेखांकित किया।
- मांग: निष्पक्ष पत्रकारिता करने वालों को तत्काल पर्याप्त सुरक्षा दी जाए और पत्रकारों के खिलाफ भ्रामक प्रचार करने वाले भू-माफियाओं, संगठित गिरोहों और असामाजिक तत्वों के खिलाफ उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए।
सारंगढ़-बिलाईगढ़: ‘कलम न बिकेगी, न झुकेगी’—एसपी को अल्टीमेटम
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में भी पत्रकारों का गुस्सा सड़कों पर दिखा। जिला मुख्यालय में पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर माफिया सिंडिकेट पर शिकंजा कसने की मांग की गई।
- जिलाध्यक्ष नरेश चौहान का तीखा बयान: ”पत्रकार समाज का सजग प्रहरी है। जब तंत्र नाकाम होता है, तब पत्रकार जान जोखिम में डालकर सच सामने लाता है। तथ्यों का जवाब देने के बजाय पत्रकारों को दबाने के लिए पेड ट्रोलिंग और धमकियों का सहारा लिया जा रहा है। हमारी कलम बिकेगी नहीं और न ही झुकेगी। अपने साथियों के सम्मान और सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।”
- उपस्थिति: ज्ञापन सौंपने वालों में जिलाध्यक्ष नरेश चौहान के साथ कोषाध्यक्ष पिंग्धवज खांडेकर, सारंगढ़ ब्लॉक अध्यक्ष समीप अनंत, बिलाईगढ़ ब्लॉक अध्यक्ष युवराज निराला, कोसीर ब्लॉक अध्यक्ष गुलशन लहरे, ब्लॉक उपाध्यक्ष शंभु पटेल, ब्लॉक महासचिव तुलसीदास महंत, संतोषी तेंदुलकर सहित बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद रहे।
- उच्चस्तरीय व निष्पक्ष जांच: पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने वाले असामाजिक तत्वों, भू-माफियाओं, संगठित सिंडिकेट और वित्तीय घोटालों के संरक्षकों के खिलाफ स्पेशल टास्क फोर्स से जांच कराई जाए।
- पुख्ता सुरक्षा की गारंटी: भ्रष्टाचार और जनहित के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों को भयमुक्त वातावरण और प्रशासन की ओर से विधिवत सुरक्षा प्रदान की जाए।
- गैर-जमानती धाराओं में कार्रवाई: सोशल मीडिया पर चरित्र हनन करने, व्यक्तिगत हमले करने, धार्मिक द्वेष फैलाने और धमकियां देने वालों को चिह्नित कर गैर-जमानती धाराओं में तत्काल जेल भेजा जाए।
- घोटालेबाजों पर नरमी क्यों? जब बलरामपुर DEO के 4.30 करोड़ के घोटाले की जांच में अनियमितताएं सिद्ध हो चुकी हैं, तो मनीराम यादव पर निलंबन, विभागीय वसूली और आईपीसी/बीएनएस की धाराओं में एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई?
- तबादला क्या वॉशिंग मशीन है? क्या किसी दागी अधिकारी को एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर प्राचार्य बना देना ही शासन का न्याय है? क्या इससे भ्रष्टाचार करने वालों का हौसला नहीं बढ़ेगा?
- माफिया सिंडिकेट पर कब चलेगा बुलडोजर? सच उजागर करने पर पत्रकारों के परिवारों तक पहुंचने वाले और सोशल मीडिया पर चरित्र हनन करने वाले सिंडिकेट पर पुलिस की साइबर सेल अब तक खामोश क्यों है?
- गृह मंत्रालय की चुप्पी का क्या मतलब है? सरगुजा से लेकर सारंगढ़ तक पूरे प्रदेश के पत्रकार संगठनों को अपनी सुरक्षा के लिए थानों और एसपी कार्यालयों के चक्कर क्यों काटने पड़ रहे हैं?
- क्या सवाल पूछना अपराध है? यदि एक प्राध्यापक/एक्टिविस्ट (अकिल अहमद अंसारी) या जमीनी पत्रकार शासन-प्रशासन की कमियों पर सवाल उठाता है, तो उसका जवाब देने की जगह उसे प्रताड़ित करने की खुली छूट किस स्तर से मिल रही है?
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को पंगु बनाकर और करोड़ों के घोटालों पर पर्दा डालकर कोई भी सरकार ‘सुशासन’ का दावा नहीं कर सकती। यदि बलरामपुर के ₹4.30 करोड़ के गबन मामले में तत्काल प्रभाव से कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं होती और पत्रकारों को निशाना बनाने वाले असामाजिक तत्वों पर शिकंजा नहीं कसा जाता, तो यह आंदोलन केवल ज्ञापनों तक सीमित नहीं रहेगा; यह छत्तीसगढ़ के इतिहास में सत्ता और चौथे स्तंभ के बीच आर-पार की लड़ाई का रूप लेगा।




