“जशपुर का जनसम्पर्क विभाग या जन-धमकी विभाग?…”

जशपुरनगर। जिले से एक गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ – पत्रकारिता – पर सीधा प्रहार इस बार बाहरी ताक़तों से नहीं बल्कि स्वयं जनसम्पर्क विभाग के दफ़्तर से हुआ है।
सहायक संचालक, जनसम्पर्क कार्यालय जशपुर, नूतन सिदार ने पत्रकारों को कानूनी नोटिस भेजा। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या उन्होंने इस नोटिस के लिए शासन या विभागीय अनुमति प्राप्त की थी?
यदि अनुमति नहीं ली गई तो यह कदम सेवा आचरण नियमों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
नियम क्या कहते हैं?
Central Civil Services (Conduct) Rules, 1964 के अंतर्गत:
🔹 Rule 23 (Vindication of Acts & Character):
कोई भी सरकारी सेवक यदि अपने पदनाम का प्रयोग करते हुए मानहानि अथवा निजी मुकदमा दायर करना चाहता है, तो उसे सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य रूप से प्राप्त करनी होती है।
स्पष्ट है कि यदि बिना अनुमति ऐसा कदम उठाया गया है, तो यह अधिकारियों के लिए निर्धारित आचार संहिता की अवहेलना है।
पत्रकारों की आपत्ति :प्रदेश के पत्रकार संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतंत्र पर सीधा हमला बताया। उनका कहना है – “सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून का प्रचार करती है, किंतु अधिकारी स्वयं पत्रकारों को धमकाने का प्रयास कर रहे हैं। यह न केवल पत्रकारिता बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी आघात है।”
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल : अब पूरे प्रदेश में यह चर्चा है:
- क्या जशपुर कलेक्टर इस मामले का संज्ञान लेंगे?
- क्या जनसम्पर्क विभाग के वरिष्ठ अधिकारी नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई करेंगे?
- अथवा यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबाकर भुला दिया जाएगा?
यदि कार्रवाई नहीं हुई तो संदेश स्पष्ट होगा कि – “प्रशासन अपने अधिकारियों को पत्रकारों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने की खुली छूट दे रहा है।”
यह केवल एक नोटिस का मामला नहीं यह मुद्दा अब बन चुका है –
पत्रकारिता की स्वतंत्रता बनाम अधिकारीशाही का दुरुपयोग
सवाल यह है:
❓ क्या पत्रकारों की आवाज़ को दबाया जा सकता है?
❓ क्या एक अधिकारी नियमों को दरकिनार कर चौथे स्तंभ को धमका सकता है?
❓ क्या लोकतंत्र केवल काग़ज़ पर ही सुरक्षित है?
नियम उल्लंघन पर संभावित कार्रवाई : यदि नूतन सिदार पर आचरण नियम उल्लंघन का दोष सिद्ध होता है, तो विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के अंतर्गत उन पर निम्न दंड लागू हो सकते हैं –
- चेतावनी (Warning)
- वेतन कटौती (Reduction in Pay)
- पदावनति (Demotion)
- निलंबन (Suspension)
- सेवा से बर्खास्तगी (Dismissal)
यह घटना केवल जशपुर की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के लोकतंत्र की गंभीर परीक्षा है। यदि अधिकारी पर कार्रवाई नहीं की गई तो यह परंपरा बन जाएगी कि कोई भी अफसर अपने पदनाम का दुरुपयोग कर पत्रकारों को चुप कराने का प्रयास करेगा।
जनता और पत्रकार समाज अब एक सुर में प्रशासन से यही पूछ रहा है – “पत्रकारों को धमकी देने वाली अधिकारी पर कार्रवाई होगी या लोकतंत्र नियम पुस्तिका तक सीमित रह जाएगा?”