खाकी पर भारी पड़ी ‘लिपस्टिक वाली कार्रवाई’ : तमनार कांड पर हाईकोर्ट का रौद्र रूप, महाधिवक्ता तलब…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर न्यायपालिका ने एक बार फिर चाबुक चलाया है। रायगढ़ जिले के तमनार थाने में आरोपी के चेहरे पर लिपस्टिक पोतकर और उसे अर्धनग्न अवस्था में सड़क पर घुमाने के मामले को बिलासपुर हाईकोर्ट ने अत्यंत गंभीरता से लिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि “वर्दी का रसूख कानून से बड़ा नहीं हो सकता।”
सुनवाई की बड़ी बातें : जब सन्नाटे में डूब गई अदालत – अदालत में सुनवाई रायपुर के अभनपुर से जुड़े एक अन्य मानवाधिकार उल्लंघन के मामले पर हो रही थी, लेकिन जैसे ही तमनार की घटना का उल्लेख हुआ, चीफ जस्टिस के तेवर सख्त हो गए।
“तालिबानी न्याय” पर न्यायपालिका का प्रहार : कोर्ट ने पुलिस की इस कार्रवाई को मध्यकालीन और अमानवीय करार दिया। चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि किसी आरोपी को अर्धनग्न कर, उसका उपहास उड़ाते हुए सार्वजनिक जुलूस निकालना सभ्य समाज और कानून के शासन (Rule of Law) की हत्या जैसा है। बेंच ने दो टूक कहा कि आरोपी ने जो किया वह अपराध हो सकता है, लेकिन पुलिस ने जो किया वह ‘संवैधानिक मर्यादा का चीरहरण’ है।
महाधिवक्ता को व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का आदेश – अदालत इस मामले में जवाबदेही तय करने के मूड में है। शासन की ओर से मौजूद वकीलों की दलीलों से असंतुष्ट कोर्ट ने अब राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) को अगली सुनवाई में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। कोर्ट यह जानना चाहता है कि क्या प्रदेश में पुलिस को इस तरह की अपमानजनक कार्रवाई की खुली छूट दे दी गई है?
क्या था पूरा घटनाक्रम? (तमनार कांड की इनसाइड स्टोरी) – कुछ दिनों पहले तमनार क्षेत्र में एक युवक पर महिला आरक्षक के साथ दुर्व्यवहार करने और उसकी वर्दी फाड़ने का आरोप लगा था। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को पकड़ा, लेकिन उसके बाद जो हुआ वह विवादों में घिर गया :
- अपमानजनक कृत्य : आरोपी के चेहरे पर महिलाओं की तरह लिपस्टिक पोती गई।
- अर्धनग्न अवस्था : उसे केवल अंडरवियर और फटी हुई बनियान में रखा गया।
- सार्वजनिक प्रदर्शन : पुलिस बल की मौजूदगी में उसे बाजार और सड़कों पर घुमाया गया, ताकि लोग उसका मजाक उड़ा सकें।
पुलिस का तर्क था कि इससे अपराधियों में खौफ पैदा होगा, लेकिन कानूनविदों का मानना है कि यह सुप्रीम कोर्ट के डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले के दिशानिर्देशों का सीधा उल्लंघन है।
कानूनी सवाल: पुलिस की सीमा क्या है? – इस घटना ने छत्तीसगढ़ में तीन बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं:
- सजा का अधिकार किसका? भारतीय दंड संहिता (IPC/BNS) के तहत सजा देने का अधिकार केवल न्यायालय को है। क्या पुलिस ‘जज’ की भूमिका निभा सकती है?
- मानवाधिकार की बलि : क्या आरोपी होने मात्र से किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21 – गरिमा के साथ जीवन) समाप्त हो जाते हैं?
- पुलिस की छवि : क्या ऐसे ‘शक्ति प्रदर्शन’ से जनता का पुलिस पर भरोसा बढ़ता है या पुलिस की छवि एक दमनकारी बल (Oppressive Force) की बनती है?
न्याय की तराजू में खाकी : हाईकोर्ट का यह कड़ा रुख उन पुलिस अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है जो कानून की प्रक्रिया (Due Process of Law) को दरकिनार कर ‘इंस्टेंट जस्टिस’ में विश्वास रखते हैं। अब सबकी नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ सरकार को यह बताना होगा कि दोषियों के खिलाफ क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है।
अदालत का संदेश साफ है : अपराध को खत्म करें, अपराधी की मानवीय गरिमा को नहीं।
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