प्रेस की आज़ादी पर हमला: जशपुर में पत्रकारों को 1-1 करोड़ का नोटिस, जनसंपर्क अधिकारी की बड़ी दबंगई…

जशपुर में प्रेस की आज़ादी पर हमला :
जनसंपर्क अधिकारी का नोटिस, पत्रकारों पर करोड़ों की मार – एसपी मौन, सत्ता की चापलूसी में व्यस्त!
जशपुर। जिले में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दबाने की बेशर्म कोशिश सामने आई है। जनसंपर्क विभाग के एक अधिकारी ने पत्रकारों को एक-एक करोड़ हर्जाने का नोटिस थमाकर न सिर्फ डराने की कोशिश की है बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि प्रशासनिक दबंगई अब खुलेआम हो रही है।
एसपी की चुप्पी पर सवाल
स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि जब अधिकारी खुद ही कानून का डंडा दिखाकर पत्रकारिता को कुचलने की धमकी दे रहे हैं, तो जिले के एसपी इस मामले में आंख-मूँदकर बैठे हैं। पुलिस कप्तान से उम्मीद थी कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे, लेकिन हकीकत यह है कि वे सत्ता और अफसरशाही की चापलूसी में व्यस्त हैं।
नोटिस या सत्ता का हिटलरशाही फरमान?
नोटिस में पत्रकारों को धमकाया गया है कि यदि 15 दिन के भीतर लिखित माफीनामा प्रकाशित नहीं करेंगे तो उन्हें अदालत में घसीटकर करोड़ों की वसूली की जाएगी। यहां तक कि SC/ST Act जैसे कठोर कानून का डर दिखाकर पत्रकारों को चुप कराने का षड्यंत्र रचा गया है।
पत्रकारों का आक्रोश
पत्रकारों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है। उनका कहना है कि अधिकारी पर लगे आरोपों की सच्चाई उजागर करना उनका कर्तव्य है। लेकिन अब वही अधिकारी सत्ता और प्रशासनिक तंत्र की ताकत का इस्तेमाल कर उन्हें कुचलना चाहते हैं।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का कहना है कि इस तरह का मानहानि नोटिस अदालत में ज्यादा टिकेगा नहीं। अगर पत्रकार तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर खबर लिखते हैं तो यह उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा है। सवाल यह है कि जो विभाग मीडिया और जनता के बीच सेतु बनने के लिए है, उसका अधिकारी ही मीडिया को गला घोंटने की धमकी दे तो इसे क्या कहा जाए?
आंदोलन की आहट
जिले के पत्रकार अब एकजुट होकर इस मसले को पत्रकार संगठनों, राज्यपाल और मुख्यमंत्री तक ले जाने की तैयारी में हैं। उनकी मांग है कि इस धमकीभरे नोटिस को तुरंत वापस लिया जाए और संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई की जाए।
👉 लेकिन बड़ा सवाल यही है — जब जिले के एसपी खुद ही सत्ता की चाटुकारिता में मशगूल हैं, तब क्या पत्रकारों को न्याय मिलेगा या फिर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आवाज इसी तरह दबा दी जाएगी?
क्या आप चाहेंगे कि मैं इसमें पत्रकार संगठनों और संभावित सड़क पर उतरने वाले आंदोलन की भाषा जोड़ दूँ, ताकि खबर और ज्यादा आक्रामक लगे?