लैलूंगा में POCSO का खुला मखौल: 13 साल की दिव्यांग बच्ची से दरिंदगी के 45 दिन बाद भी खाकी नतमस्तक! क्या गोविंद मालाकार का ‘सिंडिकेट’ चला रहा है थाना?…

भाग 2
रायगढ़। जिले के लैलूंगा थाना क्षेत्र से कानून के राज को शर्मसार कर देने वाला एक ऐसा वीभत्स और सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पुलिस की कार्यप्रणाली, रसूखदारों के गठजोड़ और न्याय व्यवस्था की रीढ़ पर कड़ा प्रहार किया है। 13 साल की एक मूक-बधिर व दिव्यांग नाबालिग बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाए जाने के बाद 10 जुलाई को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 127(1), 76 और POCSO एक्ट की धारा 8 के तहत बाकायदा संगीन FIR दर्ज होती है। लेकिन 45 से अधिक दिन बीत जाने के बाद भी लैलूंगा पुलिस की ‘जांच’ कछुए से भी बदतर चाल पर रेंग रही है।
मुख्य दरिंदा श्याम लाल चौहान खुलेआम पुलिस को ठेंगा दिखा रहा है और इस पूरे खेल में कानून के पहरुओं पर सबसे बड़ा सवालिया निशान लगा रहा है कथित ‘मास्टरमाइंड’ और शरणदाता गोविंद मालाकार।
गोविंद मालाकार का अभेद्य किला: वारदात के बाद ‘सेफ हाउस’ और बैकडोर से फरारी – पीड़ित परिवार के सनसनीखेज आरोपों ने पूरे इलाके में आग लगा दी है। आरोप है कि दिव्यांग बच्ची की जिंदगी तबाह करने के बाद मुख्य आरोपी श्याम लाल चौहान सीधे गोविंद मालाकार की चौखट पर पहुंचा।
- पनाहगार की भूमिका: गोविंद मालाकार ने न सिर्फ एक संगीन अपराधी को अपने ठिकाने पर पनाह दी, बल्कि कानूनी शिकंजे से बचाने के लिए ‘बैकडोर एग्जिट’ प्लान तैयार कर उसे सुरक्षित बाहर निकलवाया।
- चाचा-भतीजे का ड्रामा: जब मामला तूल पकड़ने लगा और पीड़ित पक्ष ने आवाज उठाई, तो जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए गोविंद के चाचा सुंदरलाल मालाकार का एक सुनियोजित वीडियो बाजार में उतारा गया। वीडियो में छाती ठोककर दावा किया गया कि “भतीजे ने तो आरोपी को सीधे थाने ले जाकर पुलिस के हवाले कर दिया था।”
कटघरे में गोविंद मालाकार और लैलूंगा पुलिस: इन 4 सवालों का जवाब कौन देगा?
- अगर आरोपी थाने में सरेंडर था, तो हवा में कैसे उड़ा? यदि गोविंद मालाकार ने आरोपी को थाने के सुपुर्द कर दिया था, तो क्या लैलूंगा थाने के लॉकअप की दीवारें टूट गईं या फिर पुलिस ने थाने के पिछले दरवाजे से आरोपी को ‘वीआईपी विदाई’ दी?
- अगर थाने नहीं पहुंचा, तो फर्जी वीडियो का प्रायोजक कौन? अगर दरिंदा थाने पहुंचा ही नहीं, तो चाचा-भतीजे ने जनता को गुमराह करने और खुद की गर्दन बचाने के लिए यह फर्जी और मनगढ़ंत वीडियो किसके इशारे पर रिकॉर्ड कर वायरल किया?
- BNS धारा 249 (हार्बरिंग) के तहत गोविंद पर FIR और गिरफ्तारी क्यों नहीं? POCSO जैसे गैर-जमानती और संवेदनशील मामलों में अपराधी को शरण देना और भगाना खुद एक गंभीर गैर-जमानती जुर्म है। लैलूंगा पुलिस ने अब तक गोविंद मालाकार को सह-आरोपी बनाकर सलाखों के पीछे क्यों नहीं धकेला?
- कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) की जांच से क्यों कांप रहे हैं हाथ? वारदात के दिन से लेकर फरारी तक गोविंद मालाकार और आरोपी श्याम लाल चौहान के बीच हुई बातचीत की सीडीआर व लोकेशन डिटेल अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
पंचायती लीपापोती का षड्यंत्र: इंसाफ का ढोंग या जुबान बंद करने की साजिश? – इस मामले में केवल खाकी ही नहीं, बल्कि तथाकथित स्थानीय पंचायती तंत्र भी बेनकाब हुआ है। पीड़ित परिवार को यह झांसा दिया गया कि “पंचायत उनके साथ खड़ी है”, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है:
- शून्य कानूनी दस्तावेज: न्याय के नाम पर न कोई आधिकारिक बैठक बुलाई गई, न रजिस्टर में कोई प्रस्ताव दर्ज हुआ और न ही कोई पंचनामा तैयार किया गया।
- आरोपी पक्ष को अभयदान: गोविंद मालाकार या मुख्य आरोपी के खिलाफ पंचायत स्तर पर कोई लिखित नोटिस या बहिष्कार तक दर्ज नहीं किया गया। यह पूरा ढोंग सिर्फ इसलिए रचा गया ताकि समय बीतने के साथ-साथ मामला ठंडा पड़ जाए और पीड़ित परिवार थक-हारकर समझौते की मेज पर आ जाए।
वर्दी पर ‘सौदा’ और संरक्षण का दाग: जनआक्रोश की दहलीज पर लैलूंगा – सुप्रीम कोर्ट और गृह मंत्रालय के सख्त दिशा-निर्देश हैं कि POCSO मामलों में 24 घंटे के भीतर कार्रवाई और त्वरित चार्जशीट दाखिल हो। लेकिन लैलूंगा पुलिस की 45 दिनों की रहस्यमयी खामोशी यह चीख-चीख कर कह रही है कि सिस्टम किसी बड़े रसूख और लेनदेन के आगे घुटने टेक चुका है।
एक मूक-बधिर, बेसहारा बच्ची की चीखों का सौदा करने वाले खाकीधारी और गोविंद मालाकार जैसे मददगारों का गठजोड़ अब पूरे क्षेत्र में जनआक्रोश का रूप ले रहा है। यदि लैलूंगा पुलिस ने तत्काल प्रभाव से गोविंद मालाकार को रिमांड पर लेकर दरिंदे श्याम लाल चौहान को बेनकाब नहीं किया, तो यह चिंगारी थाने के घेराव और सड़क पर बड़े जनांदोलन में तब्दील होना तय है। कानून की साख दांव पर है—जवाब लैलूंगा पुलिस के आला अफसरों को देना ही होगा।
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