खाकी के खेल में उलझा 13 वर्षीय दिव्यांग नाबालिक का POCSO केस : जब आरोपी खुद थाने पहुंचा तो हथकड़ी क्यों नहीं लगी? लैलूंगा पुलिस पर रिश्वत और संरक्षण के संगीन आरोप…

रायगढ़/लैलूंगा। 13 वर्षीय नाबालिग बच्ची से जुड़े संवेदनशील POCSO मामले में FIR दर्ज होने के डेढ़ माह बाद भी मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी न होना लैलूंगा पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मामले में सामने आए विरोधाभासी बयानों, रिश्वतखोरी के दावों और ढुलमुल जांच ने पूरे तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
केस का सबसे बड़ा विरोधाभास : थाने में पेशी या महज छलावा?
- मामले की पड़ताल में पुलिस और परिजनों के दावों में जमीन-आसमान का अंतर नजर आ रहा है:
- परिजनों का दावा: बच्ची के चाचा ने कैमरे पर बयान दिया है कि आरोपी श्याम लाल चौहान को गोविंद मालाकार द्वारा थाने ले जाकर पुलिस के सामने पेश कर दिया गया था।
- पुलिस का पक्ष: थाना प्रभारी गिरधारी साव का दावा है कि आरोपी फरार है और पुलिस उसकी सरगर्मी से तलाश कर रही है।
- जांच का बिंदु: यदि आरोपी थाने लाया गया था, तो उसे उसी वक्त गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? और यदि वह थाने नहीं आया, तो परिजनों के इस दावे का आधार क्या है? इसका सच थाने के CCTV फुटेज, जीडी एंट्री (रोजनामचा) और ड्यूटी लॉग बुक से तुरंत साफ हो सकता है।
डेढ़ लाख की रिश्वत और संरक्षण के गंभीर आरोप : मामले में सामने आए वीडियो बयानों ने पुलिस की भूमिका पर संगीन आरोप लगाए हैं:
- सरपंच का बयान: स्थानीय ग्राम सरपंच ने कैमरे पर कहा है कि थाना प्रभारी को मामले में कथित तौर पर ₹1 लाख से ₹1.5 लाख तक की रिश्वत दिए जाने की चर्चा है।
- पीड़िता की मां का आरोप: बच्ची की मां का कहना है कि लेन-देन के जरिए गोविंद मालाकार और मुख्य आरोपी को पुलिस का खुला संरक्षण दिया गया।
- गोविंद मालाकार की दोहरी भूमिका: एक पक्ष का कहना है कि उसने आरोपी को घर के पिछले रास्ते से भगाने में मदद की, जबकि दूसरा पक्ष उसे आरोपी को थाने ले जाने वाला बता रहा है।
“न फोटो, न पहचान पत्र, न मोबाइल” – पुलिस की दलील पर उठे सवाल
थाना प्रभारी का यह कहना कि आरोपी का कोई पहचान पत्र या फोटो उपलब्ध नहीं है और वह फोन इस्तेमाल नहीं करता, जांच प्रक्रिया पर कई बुनियादी सवाल उठाता है:
- क्या नामजद FIR और स्थानीय पहचान के बावजूद पुलिस किसी आरोपी की तलाश उसके पारिवारिक ठिकानों और सामाजिक संपर्कों से नहीं कर सकती?
- यदि आरोपी थाने पहुंचा था, तो पुलिस रिकॉर्ड में उसकी प्राथमिक पहचान और तस्वीर दर्ज क्यों नहीं की गई?
- पत्रकारों के थाने पहुंचते ही यह सवाल पूछना कि “क्या आप पीड़ित परिवार से मिलकर आ रहे हैं?” यह दर्शाता है कि पुलिस का सूचना तंत्र पत्रकारों की गतिविधियों पर तो सक्रिय है, लेकिन नामजद आरोपी को पकड़ने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।
उच्चाधिकारियों से सीधे 5 सवाल
- पहला: क्या 10 जुलाई को दर्ज FIR के बाद आरोपी थाने आया था? थाने के CCTV फुटेज सार्वजनिक कर जांच क्यों नहीं कराई जाती?
- दूसरा: गोविंद मालाकार की वास्तविक भूमिका (अपराध में मदद या पुलिस को सुपुर्दगी) की स्वतंत्र जांच कब होगी?
- तीसरा: थाना प्रभारी पर लगे डेढ़ लाख रुपये रिश्वत के आरोपों की निष्पक्ष विभागीय जांच क्यों नहीं बैठाई गई?
- चौथा: नाबालिग से जुड़े गंभीर POCSO केस में डेढ़ माह बीत जाने के बाद भी मुख्य आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बाहर क्यों है?
- पांचवां: क्या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP/SP) मामले का संज्ञान लेकर जांच किसी स्वतंत्र अधिकारी को सौंपेंगे?
नोट: कानूनी प्रावधानों के तहत नाबालिग पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी गई है। पुलिस व अन्य पक्षों पर लगे रिश्वत व संरक्षण के दावे वीडियो बयानों पर आधारित आरोप हैं, जिनकी अंतिम पुष्टि सक्षम उच्चाधिकारियों की निष्पक्ष जांच से ही तय होगी।




