बालोद

बालोद में IPL सट्टे का ‘खेला’, पुलिस की भूमिका पर ‘थर्ड अंपायर’ होने का आरोप?…

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद। देश में आईपीएल (IPL) का खुमार चढ़ते ही बालोद जिले में सट्टेबाजी का काला कारोबार अपने चरम पर पहुंच गया है। ताज्जुब की बात यह है कि जहां प्रदेश के अन्य जिलों में पुलिस सटोरियों की नींद उड़ा रही है, वहीं बालोद में यह अवैध धंधा ‘संरक्षण’ और ‘सुस्ती’ के बीच फल-फूल रहा है। आलम यह है कि शहर की गलियों से लेकर पान ठेलों तक अब हार-जीत के दांव खुलेआम लग रहे हैं, लेकिन खाकी की नजरें इनायत नजर नहीं आ रही हैं।

दल्ली राजहरा: सट्टेबाजों का नया ‘कंट्रोल रूम’ – जिले का दल्ली राजहरा क्षेत्र इस समय सट्टेबाजी का अघोषित मुख्यालय बन चुका है। स्थानीय सूत्रों की मानें तो यहाँ 10 से 15 बड़े सटोरिए सक्रिय हैं जो हाई-टेक संसाधनों से लैस हैं।

सफेदपोशों की संलिप्तता : जनचर्चा है कि इस सिंडिकेट में सत्ता और रसूख की धमक रखने वाले एक शहर के पार्षद और उसके भाई का सीधा हस्तक्षेप है।

बदला हुआ रूप, चर्चा का केंद्र : एक पूर्व होटल व्यवसायी भी है, जिसने अब पान ठेले की आड़ में सट्टे का पूरा नेटवर्क बिछा रखा है। यह ठेला केवल नाम का है, असल में यहाँ से ‘लाइन’ और ‘रेट’ का वितरण होता है।

टीवी से तेज ‘डब्बा’ सर्विस का खेल – सट्टेबाजों का यह नेटवर्क तकनीकी रूप से काफी एडवांस है। सूत्रों के अनुसार, सटोरिए ऐसे मोबाइल नंबरों का उपयोग कर रहे हैं जिनके पास टीवी प्रसारण से 3 से 5 सेकंड पहले मैच की पल-पल की जानकारी (बॉल-बाय-बॉल अपडेट) पहुँच जाती है। इसे सट्टे की भाषा में ‘डब्बा’ या ‘लाइन’ कहा जाता है। इसी अंतराल का फायदा उठाकर बड़े दांव लगवाए जाते हैं और युवाओं की जेब खाली की जा रही है।

‘थर्ड अंपायर’ बनी पुलिस? – जिले की जनता अब सीधे तौर पर पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस “थर्ड अंपायर” की भूमिका में है – यानी सब कुछ स्क्रीन पर साफ़ दिखने के बावजूद फैसला लेने में देरी की जा रही है।

अन्य जिलों की सक्रियता बनाम बालोद की चुप्पी : छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों की तुलना बालोद की स्थिति को स्पष्ट कर देती है :

  1. राजनांदगांव (4 अप्रैल) : बड़ी रेड और सटोरियों की गिरफ्तारी।
  2. बिलासपुर (7 अप्रैल) : सट्टा किंग पर शिकंजा।
  3. बागबाहरा (9 अप्रैल) : अंतरराज्यीय लिंक का खुलासा।
  4. बलौदाबाजार (10 अप्रैल) : बड़े गिरोह का भंडाफोड़।
  5. बालोद : अब तक सन्नाटा और कागजी खानापूर्ति का इंतजार।

युवा पीढ़ी पर मंडराता खतरा – सट्टेबाजी के इस सुरक्षित जाल (Safe Network) का सबसे घातक असर छात्रों और बेरोजगार युवाओं पर पड़ रहा है। नए सिम कार्डों और बाहरी पंटरों के जरिए मोबाइल पर ही सट्टे का लेनदेन हो रहा है। जल्दी पैसा कमाने की हसरत में युवा वर्ग कर्ज के दलदल में धंसता जा रहा है, जिससे जिले में अन्य आपराधिक गतिविधियों के बढ़ने का भी अंदेशा है।

पुलिस रिकॉर्ड में ‘सब चंगा सी’ – हैरानी की बात यह है कि शहर में जहाँ सट्टे के नामजद खिलाड़ियों की चर्चा आम है, वहीं थानों के आधिकारिक रिकॉर्ड में इन गतिविधियों का कोई विशेष उल्लेख नहीं है। यह विरोधाभास या तो पुलिस की खुफिया विफलता को दर्शाता है या फिर ‘मिलीभगत’ की ओर इशारा करता है।

तीखे सवाल :

  • क्या बालोद पुलिस को वाकई शहर के इन ‘चिन्हित’ सटोरियों और उनके ठिकानों की जानकारी नहीं है?
  • क्या रसूखदार सफेदपोशों के दबाव में पुलिस की कार्यवाही रुकी हुई है?
  • पड़ोसी जिलों की पुलिस जब बड़ी कार्यवाहियां कर सकती है, तो बालोद पुलिस को इनपुट्स क्यों नहीं मिल रहे?

बालोद की जागरूक जनता अब एसपी और जिला प्रशासन से ठोस कार्यवाही की उम्मीद कर रही है। यदि जल्द ही इन सट्टा अड्डों पर रेड नहीं हुई और बड़े मगरमच्छों को नहीं पकड़ा गया, तो पुलिस की साख पर लगा यह दाग और गहरा होता जाएगा।

Feroz Ahmed Khan

संभाग प्रभारी : दुर्ग

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