रायगढ़

तमनार त्रासदी : वर्दी भी शर्मिंदा है, मानवता भी लहूलुहान – क्या यही है हकों की लड़ाई…

रायगढ़। जिले का तमनार क्षेत्र आज विकास की वेदी पर लहूलुहान खड़ा है। यह कहानी केवल एक ‘कॉरपोरेट’ बनाम ‘ग्रामीण’ की जंग नहीं है, बल्कि यह उस नैतिक पतन की दास्तान है जहाँ प्रशासन अंधा हो गया, नेता गूंगे हो गए और आंदोलनकारी ‘दरिंदे’ बन गए।

सत्ता का दंभ : जब जनसुनवाई बनी ‘जबरन-सुनवाई’ – विवाद की जड़ 8 दिसंबर को पड़ी, जब प्रशासन ने जिंदल पावर कोल ब्लॉक के लिए जनसुनवाई आयोजित की। ग्रामीणों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया ‘फर्जी’ थी – न जनता की राय ली गई, न नियमों का पालन हुआ। जब 14 गांवों के ग्रामीणों ने जल-जंगल-जमीन बचाने के लिए 12 दिसंबर से शांतिपूर्ण ‘आर्थिक नाकेबंदी’ शुरू की, तो प्रशासन ने संवाद के बजाय ‘दमन’ को चुना। उद्योगपति के मुनाफे को बचाने के लिए प्रशासन ने जो दबाव बनाया, उसने शांत बैठे ग्रामीणों के भीतर आक्रोश का ज्वालामुखी भर दिया।

हिंसा का नंगा नाच : जल उठा तमनार – 27 दिसंबर को जब प्रशासन ने जबरन नाकेबंदी हटाने की कोशिश की, तो तमनार युद्ध का मैदान बन गया। ग्रामीणों का गुस्सा हिंसक उन्माद में तब्दील हो गया। बसें, कारें और यहाँ तक कि जीवन बचाने वाली एम्बुलेंस को भी आग के हवाले कर दिया गया। पुलिसकर्मियों को गलियों और खेतों में दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। लेकिन इस हिंसा के बीच जो सबसे काला अध्याय लिखा गया, उसने समाज की रूह कंपा दी।

मानवता का मरण : ‘भाई’ कहकर भीख मांगती रही महिला पुलिसकर्मी – आंदोलन के नाम पर कुछ प्रदर्शनकारियों ने जो किया, वह कभी माफ नहीं किया जा सकता। भीड़ के डर से जान बचाने खेत की ओर भागी एक महिला पुलिसकर्मी को समूह ने घेर लिया। चश्मदीदों के मुताबिक, वह महिला हाथ जोड़कर, उन्हें अपनी जान और इज्जत की भीख मांगती रही, लेकिन दरिंदगी उन पर हावी थी। उन्होंने उस निहत्थी महिला को न केवल बेरहमी से पीटा, बल्कि सरेआम उसके कपड़े फाड़ डाले

विचित्र विरोधाभास : जहाँ पुरुष ‘हैवान’ बन रहे थे, वहीं महिला प्रदर्शनकारियों ने एक अलग मिसाल पेश की। उन्होंने महिला थाना प्रभारी को पीटा जरूर, लेकिन उनके बेहोश होने पर उन्हें पानी पिलाया और उनकी गरिमा का ख्याल रखते हुए उनके कपड़े ठीक किए। यह सवाल तमनार के पुरुषों को ताउम्र चुभेगा—जहाँ उनकी महिलाएं ‘मर्यादा’ जानती थीं, वहां वे ‘दरिंदे’ कैसे हो गए?

राजनीति की ‘गुमशुदगी’ और कॉरपोरेट का खेल : इस पूरे खून-खराबे के बीच वे जनप्रतिनिधि कहीं नजर नहीं आए जो वोट के लिए ग्रामीणों के पैरों में गिरते हैं। भाजपा सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि उसके लिए ‘कॉरपोरेट हित’ सर्वोपरि हैं और आदिवासी समाज केवल एक चुनावी आंकड़ा। जब पुलिस की लाठियां ग्रामीणों पर बरस रही थीं और जब पुलिसवाले भीड़ का शिकार हो रहे थे, तब जिले के रसूखदार नेता अपने वातानुकूलित कमरों में ‘मौन’ साधे बैठे थे।

दांव पर लगी मर्यादा : तमनार की यह आग आज नहीं तो कल बुझ जाएगी, लेकिन जो जख्म मानवता और नारी गरिमा पर लगे हैं, वे कभी नहीं भरेंगे।

  • प्रशासन दोषी है क्योंकि उसने संवाद के बजाय पुलिसिया रौब दिखाया।
  • आंदोलनकारी दोषी हैं क्योंकि उन्होंने हक की लड़ाई को ‘अपराध’ और ‘दरिंदगी’ में बदल दिया लेकिन क्यों?…
  • सत्ता दोषी है क्योंकि उसने उद्योगपतियों के कोल ब्लॉक के आगे अपने नागरिकों की सुरक्षा को दांव पर लगा दिया।

तमनार आज पूछ रहा हैक्या विकास की कीमत किसी स्त्री की अस्मत और निर्दोषों का खून ही है?…

पूर्व में प्रकाशित खबर :

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!