बालोद : सिस्टम की ‘शुगर’ फेल, किसान का खून खौल रहा: करकाभाट कारखाने में बदइंतजामी की पेराई!…

बालोद। किसान खेत में पसीना बहाता है ताकि देश का मुंह मीठा हो सके, लेकिन बालोद के करकाभाट शक्कर कारखाना ने किसानों की जिंदगी में कड़वाहट घोल दी है। प्रबंधन की लापरवाही और प्रशासन की चुप्पी ने अन्नदाता को सड़क पर रातें काटने को मजबूर कर दिया है। सवाल बड़ा है – क्या फरीदाबाद से आने वाली एक फ्लाइट की कीमत, किसानों की सालभर की मेहनत से ज्यादा है?

ठिठुरती रातें और सूखता गन्ना: तमाशा देख रहा प्रबंधन – कारखाना प्रबंधन ने 15 दिसंबर से गन्ना मंगवाया, टोकन बांटे, लेकिन मशीनें जंग खा रही थीं। आज स्थिति यह है कि:
- सैकड़ों ट्रैक्टर-ट्रॉली पिछले 5 दिनों से कतार में खड़े हैं।
- कड़ाके की ठंड में किसान खुले आसमान के नीचे रात काट रहे हैं।
- खड़े-खड़े गन्ने का वजन घट रहा है और रस सूख रहा है, जिसका सीधा आर्थिक नुकसान किसान की जेब पर पड़ेगा।
कुतर्कों की पराकाष्ठा : ‘साहब की फ्लाइट मिस हो गई’ – महाप्रबंधक का यह तर्क कि “इंजीनियर की फ्लाइट मिस हो गई,” किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। क्या करोड़ों के टर्नओवर वाले कारखाने का भविष्य एक फ्लाइट पर टिका है? जब मशीनें तैयार नहीं थीं, तो किसानों को बुलाकर उन्हें बंधक क्यों बनाया गया? यह सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि प्रबंधन का ‘मेंटल फेलियर’ है।
अन्नदाता का अल्टीमेटम : “नहीं बोएंगे गन्ना” – दशकों से चल रही इस अव्यवस्था से तंग आकर किसानों का सब्र अब टूट चुका है। आक्रोशित किसानों ने दो-टूक चेतावनी दी है— “अगर यही जिल्लत झेलनी है, तो अगले साल से गन्ने की बोआई बंद।” अगर ऐसा होता है, तो यह केवल कारखाने की विफलता नहीं बल्कि पूरे कृषि विभाग और प्रशासन की हार होगी।
प्रशासन मौन, सवाल कई: क्या किसान केवल वोट बैंक है? – जिले के आला अधिकारी इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठे हैं।
- क्या किसानों को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई कारखाना प्रबंधन करेगा?
- लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- क्या रबी की फसल छोड़कर किसान सड़कों पर ही बैठा रहेगा?
करकाभाट कारखाना अब चीनी नहीं, बल्कि किसानों का गुस्सा पैदा कर रहा है। यदि तत्काल पेराई शुरू नहीं हुई, तो यह चिंगारी एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है।




