महाघोटाला! घरघोड़ा BEO ऑफिस में ‘कागजी दिव्यांगों’ की मौज, RTI से खुली विभाग के गोलमाल की पोल…

रायगढ़। क्या सिस्टम इतना अंधा हो चुका है कि ‘दिव्यांग कोटे’ का हक मारकर फर्जीवाड़े की बुनियाद पर नौकरियां बांटी जा रही हैं? विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) कार्यालय, घरघोड़ा में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत हुए एक बड़े खुलासे ने इस अंदेशे को पुख्ता कर दिया है। विभाग से जब दिव्यांग कोटे में हुई नियुक्तियों के सुबूत मांगे गए, तो जिम्मेदारों के पसीने छूट गए। सूची तो थमा दी गई, लेकिन ‘असली खेल’ खोलने वाला सबसे अहम दस्तावेज ही गायब कर दिया गया!
RTI में लीपापोती : नाम दिए, पर ‘सुबूत’ छिपा ले गए अधिकारी – RTI आवेदक ने BEO कार्यालय घरघोड़ा से स्पष्ट रूप से “नियुक्ति के समय प्रस्तुत मूल दिव्यांग प्रमाण पत्रों की प्रमाणित प्रति” मांगी थी। जवाब में जनसूचना अधिकारी ने 6 अधिकारियों/कर्मचारियों की एक सूची पकड़ा दी, जिनमें कुछ को दृष्टिबाधित तो अधिकांश को अस्थिबाधित बताया गया है। साथ ही दावा किया गया कि इनके प्रमाण पत्र जिला मेडिकल बोर्ड, रायगढ़ से जारी हुए हैं।
लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि जिस प्रमाण पत्र के आधार पर ये नौकरियां मिलीं, विभाग ने उसकी प्रमाणित प्रति देने से साफ परहेज किया।
- सबसे बड़ा सवाल : यदि नियुक्तियां वैध हैं, तो प्रमाण पत्र सार्वजनिक करने में डर कैसा? क्या मेडिकल बोर्ड के नाम पर फर्जी सर्टिफिकेट लगाए गए हैं या फाइलें ही गायब हैं?
दो साल में ही बदल गए रिकॉर्ड! भयंकर गोलमाल की बू – इस मामले में एक और सनसनीखेज पहलू सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, इसी विषय पर दो साल पहले मांगी गई जानकारी और वर्तमान RTI के जवाब में भारी विरोधाभास है। आरोप है कि पूर्व में दी गई जानकारी और नई सूची के विवरणों में हेरफेर किया गया है।
संदेह के घेरे में विभाग की कार्यप्रणाली :
- क्या अफसरों की मिलीभगत से रिकॉर्ड रूम में दस्तावेजों को बदला जा रहा है?
- क्या ‘अपात्रों’ को बचाने के लिए रातों-रात नई सूचियां गढ़ी जा रही हैं?
- यदि एक ही विषय पर दो अलग-अलग जवाब दिए गए हैं, तो पहला झूठ था या दूसरा?
कानून का खुला मखौल : भ्रामक जानकारी देने वालों पर लटकी तलवार – अधूरी, भ्रामक और तथ्यहीन जानकारी देना सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का सीधा उल्लंघन है। कानूनी जानकारों के अनुसार, इस तरह जानबूझकर अहम दस्तावेज छिपाने वाले जनसूचना अधिकारी पर RTI Act की धारा 20 के तहत भारी जुर्माना और अनुशासनात्मक कार्रवाई तय है। मूल दस्तावेज छिपाकर विभाग ने प्रथम दृष्टया यह साबित कर दिया है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
अब आर-पार की लड़ाई : उच्च स्तरीय जांच की उठी मांग – इस खुलासे के बाद क्षेत्र में हड़कंप मच गया है। RTI कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने इस मामले में लीपापोती करने वाले अधिकारियों पर तत्काल और कठोर कदम उठाने की मांग की है:
- तत्काल सत्यापन : नियुक्ति के समय जमा सभी दिव्यांग प्रमाण पत्रों का राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड से पुनः भौतिक सत्यापन हो।
- रोस्टर की जांच : आरक्षण रोस्टर के पालन की सूक्ष्म जांच की जाए।
- FIR की मांग : यदि जांच में दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं, तो संबंधित कर्मचारियों और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज हो।
आगे क्या? – मामले की गंभीरता को देखते हुए अब प्रथम अपील और राज्य सूचना आयोग में शिकायत की पुख्ता तैयारी की जा रही है। अगर इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच हुई, तो घरघोड़ा शिक्षा विभाग का यह मामला महज़ एक विभागीय अनियमितता नहीं, बल्कि “दिव्यांग कोटे का सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा” साबित हो सकता है! जिनकी गर्दनें इस खेल में फंसी हैं, उनके लिए अब बचना मुश्किल नजर आ रहा है।




