घरघोड़ा में कार्यपालिक दंडाधिकारी की मनमानी पर हाईकोर्ट का चाबुक : जमानत मिलने के बाद भी जेल भेजने वाले अधिकारियों पर गिरा गाज; शासन पर ₹25,000 का जुर्माना…

रायगढ़। जिले के घरघोड़ा तहसील क्षेत्र के रहने वाले याचिकाकर्ता अशरफ बेग (उम्र 49 वर्ष) को 25 अक्टूबर 2025 को फिरोज कश्यप नाम के व्यक्ति की शिकायत पर घरघोड़ा थाने बुलाया गया था। पुलिस अधिकारियों ने उन पर समझौता करने का दबाव बनाया, और इनकार करने पर थाने में शांति भंग करने और उपद्रव फैलाने का आरोप लगाते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 170/126 और 135(3) [पूर्व में CrPC धारा 151/107/116] के तहत इस्तगासा (Istgasa No. 63/2025) तैयार कर उन्हें कार्यपालिक दंडाधिकारी/तहसीलदार घरघोड़ा के समक्ष पेश कर दिया।
तहसीलदार ने अशरफ बेग को 1 लाख रुपये का बेल बॉन्ड (Bail Bond) पेश करने पर रिहा करने का आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता ने उसी दिन आदेशानुसार जमानत राशि और प्रतिभूति प्रस्तुत कर दी। लेकिन कार्यपालिक दंडाधिकारी ने जमानत स्वीकार कर रिहा करने के बजाय बेल बॉन्ड के सत्यापन (Verification) का बहाना बनाकर फाइल राजस्व निरीक्षक (RI) को भेज दी और याचिकाकर्ता को 25 से 29 अक्टूबर 2025 तक अवैध रूप से जेल में निरुद्ध रखा।

उच्च न्यायालय में प्रस्तुत तीखे तर्क – कार्यपालिक अधिकारियों की इस तानाशाही के खिलाफ अशरफ बेग ने अधिवक्ता के माध्यम से छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (बिलासपुर) में रिट याचिका दर्ज कराई।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत में निम्नलिखित बिंदु रखे:
- गैर-संज्ञेय मामला : याचिकाकर्ता के खिलाफ न तो कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज थी और न ही किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का मामला था।
- कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन : BNSS की धारा 170 (पूर्व में CrPC 151) के तहत निवारक गिरफ्तारी केवल 24 घंटे के लिए हो सकती है, जिसके बाद पुलिस या मजिस्ट्रेट को रिहा करना अनिवार्य होता है।
- अनुच्छेद 21 का हनन : बेल बॉन्ड देने के बाद भी बेवजह 4 दिनों तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा दिए गए ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार’ का घोर उल्लंघन और मानसिक उत्पीड़न है।
हाईकोर्ट का तल्ख रुख और ‘अर्नेश कुमार’ फैसले का हवाला – माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति श्री रवींद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस और राजस्व प्रशासन की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताया।
- सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की नजीर : अदालत ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, डी.के. बासु, और महमूद नय्यर आजम मामलों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि बिना किसी ठोस आधार और बिना नोटिस जारी किए मनमाने ढंग से की गई गिरफ्तारी नागरिकों की गरिमा और स्वतंत्रता को ठेस पहुँचाती है।
- न्यायिक रिमांड की आड़ नहीं : राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि यह रिमांड एक न्यायिक आदेश के तहत था, जिसे अदालत ने खारिज करते हुए कहा कि गैर-संज्ञेय या जमानती मामलों में बिना जांच शुरू हुए किसी भी व्यक्ति को रूटीन तरीके से जेल नहीं भेजा जा सकता।
अदालत का अंतिम आदेश – माननीय उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए तहसीलदार और पुलिस की इस संयुक्त कार्रवाई को अवैध, मनमानीपूर्ण और संवैधानिक अधिकारों का हनन करार दिया।
- ₹25,000 का मुआवजा : अवैध निरोध और मानहानी के एवज में राज्य शासन को ₹25,000/- (पच्चीस हजार रुपये) का मुआवजा याचिकाकर्ता को देने का आदेश दिया।
- समय-सीमा : राज्य सरकार को यह राशि 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता अशरफ बेग को प्रदान करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह फैसला अधीनस्थ कार्यपालिक दंडाधिकारियों (Executive Magistrates) और पुलिस तंत्र की मनमानी रोकने के लिए एक बड़ा संदेश है कि प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।




