रायपुर

विशेष रिपोर्ट : छत्तीसगढ़ विधानसभा में ‘नारी शक्ति’ पर आर-पार; विपक्ष की गैरमौजूदगी में महिला आरक्षण संकल्प पारित…

रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा का हालिया सत्र लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़े सियासी टकराव का गवाह बना। करीब 10 घंटे से अधिक समय तक चली तीखी बहस, आरोपों के तीरों और अंततः विपक्ष के सदन से बहिर्गमन (वॉकआउट) के बीच 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का शासकीय संकल्प पारित कर दिया गया। सत्तापक्ष ने जहाँ इसे ‘ऐतिहासिक कदम’ बताया, वहीं विपक्ष ने इसे ‘चुनावी झुनझुना’ करार देकर सदन का परित्याग कर दिया।

10 घंटे का संग्राम और विपक्ष का बहिष्कार – सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सत्तापक्ष की ओर से महिला आरक्षण के कार्यान्वयन को लेकर शासकीय संकल्प पेश किया गया। इस पर चर्चा के दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष के विधायकों के बीच कई बार तीखी नोंक-झोंक हुई। विपक्ष का मुख्य विरोध इस बात पर था कि सरकार सदन के बाहर ‘निंदा प्रस्ताव’ की बात कह रही थी, लेकिन सदन के भीतर अचानक ‘शासकीय संकल्प’ ले आई।

​विपक्ष ने मांग की कि आरक्षण को जनगणना और परिसीमन की प्रतीक्षा किए बिना तत्काल लागू किया जाना चाहिए। असहमति इतनी बढ़ी कि कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया और उनकी गैरमौजूदगी में ही संकल्प को ध्वनिमत से पारित किया गया।

मुख्यमंत्री का प्रहार : “जनता कभी माफ नहीं करेगी” – मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने विपक्ष के रवैये पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया। उन्होंने केंद्र सरकार के ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को मील का पत्थर बताते हुए कहा:

  • परिसीमन की आवश्यकता : सीएम ने खुद का उदाहरण देते हुए कहा, “मैं रायगढ़ से चार बार सांसद रहा, जहाँ का क्षेत्र 350 किमी तक फैला था। एक जनप्रतिनिधि के लिए इतने बड़े क्षेत्र में हर व्यक्ति तक पहुँचना असंभव है। परिसीमन से क्षेत्र छोटा होगा, जिससे विकास की गति बढ़ेगी।”
  • विपक्ष का दोहरा चरित्र : उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने इस बिल का श्रेय विपक्ष को भी देने की पेशकश की थी, फिर भी विपक्ष द्वारा परिसीमन और जनगणना के नाम पर अड़ंगा लगाना समझ से परे है।

नेता प्रतिपक्ष का वार : “भाजपा की पुरुषवादी मानसिकता” – विपक्ष की ओर से मोर्चा संभालते हुए नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने आरोप लगाया कि :

​”भाजपा की सोच ‘मनुवादी’ और ‘पुरुषवादी’ है। वे महिलाओं को बराबरी का हक देने से डरते हैं। यदि परिसीमन के बाद सीटें 850 होती हैं, तो महिलाओं को 280 सीटें मिलेंगी। भाजपा को डर है कि इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं आईं तो पुरुषों का वर्चस्व खत्म हो जाएगा।”

​वहीं, पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक अनिल भेड़िया ने तंज कसा कि देश की महिलाएं समझदार हैं और वे जानती हैं कि 2023 में पास हुआ बिल अब तक केवल कागजों पर क्यों है।

सत्तापक्ष का पलटवार : घोषणापत्र और वादे – चर्चा के दौरान डिप्टी सीएम अरुण साव ने कांग्रेस की दुखती रग पर हाथ रखते हुए कहा कि जो पार्टी अपने घोषणापत्र में महिलाओं को ₹500 देने का वादा करके मुकर गई, उसे आज महिला अधिकारों पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

​महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने स्पष्ट किया कि सरकार महिलाओं को उनका वाजिब हक देने के लिए प्रतिबद्ध है और विपक्ष का विरोध केवल उनकी महिला विरोधी मानसिकता को दर्शाता है।

विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय और भविष्य की राह – लंबी जद्दोजहद के बाद विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने शासकीय संकल्प के पारित होने की घोषणा की। उन्होंने जानकारी दी कि:

  • ​सदन की कार्यवाही अब अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई है।
  • ​आगामी मानसून सत्र जुलाई के दूसरे सप्ताह में होने की संभावना है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा में पारित यह संकल्प भले ही कानूनी रूप से केंद्र की प्रक्रिया से जुड़ा हो, लेकिन राजनीतिक रूप से इसने प्रदेश में एक नई बहस छेड़ दी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘नारी शक्ति’ का यह मुद्दा आगामी चुनावों में किस करवट बैठता है।

Ambika Sao

सह-संपादक : छत्तीसगढ़

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