जग्गी हत्याकांड: अमित जोगी को SC से ‘कवच’, क्या बच पाएगी ‘सियासी विरासत’?…

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ की राजनीति को हिला देने वाले दो दशक पुराने रामअवतार जग्गी हत्याकांड में एक बार फिर बड़ा भूचाल आया है। जहाँ एक ओर हाईकोर्ट ने अमित जोगी को उम्रकैद की सजा सुनाकर जेल की सलाखों के पीछे भेजने की तैयारी कर ली थी, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने ऐन वक्त पर ‘अंतरिम राहत’ का छाता तानकर जोगी की गिरफ्तारी पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में जोगी की ‘कानूनी सर्जिकल स्ट्राइक’ – हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अमित जोगी की कानूनी टीम ने सुप्रीम कोर्ट में जबरदस्त घेराबंदी की। इस सुनवाई के दो सबसे बड़े पहलू रहे:
- सरेंडर पर ‘फुल स्टॉप’ : हाईकोर्ट ने अमित जोगी को 3 हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। यानी जोगी फिलहाल आजाद रहेंगे।
- CBI को नोटिस : कोर्ट ने केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) से पूछा है कि अमित जोगी के खिलाफ अपील की अनुमति और सजा के आधार क्या हैं?
- टैगिंग का दांव : जोगी की ओर से दो अलग-अलग याचिकाओं को एक साथ सुनने की अपील मंजूर कर ली गई है, जिसे अमित जोगी ने अपनी बड़ी जीत बताया है।
हाईकोर्ट का वो फैसला, जिसने उड़ा दिए थे होश – बीते 6 अप्रैल को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की बेंच ने जो फैसला सुनाया था, उसने जोगी परिवार की राजनीतिक जमीन हिला दी थी।
अदालत की कड़ी फटकार: हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा अमित जोगी को बरी किए जाने को “हास्यास्पद” करार दिया था। कोर्ट ने साफ कहा था कि यह मुमकिन ही नहीं है कि 28 लोग मिलकर एक शख्स (अमित जोगी) को खुश करने के लिए उसकी जानकारी के बिना इतनी बड़ी हत्या को अंजाम दे दें।
अदालत ने अमित जोगी को IPC की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (साजिश) के तहत सीधे तौर पर दोषी माना था।
2003 का वो काला दिन : जब गोलियों से गूंज उठा था रायपुर – यह मामला महज़ एक मर्डर नहीं, बल्कि सत्ता की हनक और रसूख की लड़ाई का नतीजा था।
- तारीख : 4 जून 2003।
- वारदात : NCP के तत्कालीन कोषाध्यक्ष और विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी रामअवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
- साजिश का आरोप : आरोप लगा कि उस वक्त की जोगी सरकार के प्रभाव में इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया। जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने आरोप लगाया था कि उनके पिता की हत्या “सरकार प्रायोजित” थी और पुलिस ने सबूत मिटाने में पूरी मदद की थी।
खाकी और राजनीति का खौफनाक गठजोड़ – इस हत्याकांड की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें सिर्फ अपराधी ही नहीं, बल्कि कानून के रखवाले भी शामिल थे। सजा पाने वाले 28 लोगों में शामिल हैं:
- पुलिस अफसर: 2 तत्कालीन CSP और एक थाना प्रभारी।
- शूटर: पेशेवर अपराधी चिमन सिंह।
- रसूखदार: रायपुर मेयर के भाई याहया ढेबर सहित कई अन्य प्रभावशाली नाम।
अमित जोगी का ‘शक्ति प्रदर्शन’ – सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलते ही अमित जोगी ने सोशल मीडिया पर अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने लिखा :
”न्यायपालिका पर मुझे पूर्ण विश्वास है। मेरी कानूनी टीम का आभार। सत्य की जीत होगी।”
आगे क्या होगा? – अब गेंद CBI के पाले में है। सुप्रीम कोर्ट में CBI का जवाब तय करेगा कि अमित जोगी की यह राहत बरकरार रहेगी या उन्हें उम्रकैद की सजा काटने जेल जाना होगा। सतीश जग्गी (मृतक के पुत्र) अभी भी अपनी इस लंबी कानूनी लड़ाई को अंतिम अंजाम तक पहुँचाने के लिए डटे हुए हैं।
छत्तीसगढ़ की सियासत में यह सवाल अब भी गूंज रहा है—क्या जग्गी हत्याकांड का जिन्न अमित जोगी का राजनीतिक करियर खत्म कर देगा, या वो एक बार फिर ‘कानूनी बाजीगर’ बनकर उभरेंगे?



