जशपुर

पत्थलगांव : ‘नगर पालिका’ का ठप्पा या विकास पर ‘फुल स्टॉप’? सीएम के गृह जिले में ही सौतेलेपन का शिकार ‘आर्थिक नगरी’…

पत्थलगांव। राजनीति में कथनी और करनी का अंतर जब गहराता है, तो जनता के बीच आक्रोश का जन्म होता है। मुख्यमंत्री का गृह जिला, सत्ता पक्ष के दिग्गज जनप्रतिनिधि और नगर सरकार में भी सत्ताधारियों का कब्जा – बावजूद इसके पत्थलगांव आज विकास के लिए ‘पाई-पाई’ को मोहताज है। नगर पंचायत से नगर पालिका बनने का जो जश्न कल तक सत्ता पक्ष के नेताओं ने ढोल-नगाड़ों के साथ मनाया था, वह आज शहर की बदहाली और ठप्प पड़े विकास कार्यों के शोर में कहीं गुम हो गया है।

कुनकुरी और जशपुर पर ‘मेहरबानी’, पत्थलगांव क्यों ‘अनदेखा’? – जिले की ‘आर्थिक नगरी’ कहे जाने वाले पत्थलगांव के साथ हो रहे भेदभाव ने अब क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल खड़े कर दिए हैं। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि जिले के अन्य निकायों, विशेषकर कुनकुरी और जशपुर नगर पालिका को अधोसंरचना मद में करोड़ों रुपये की सौगातें मिलीं, लेकिन पत्थलगांव के हिस्से में सिर्फ ‘आश्वासन’ आया। सवाल यह है कि आखिर पत्थलगांव के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों?

एसी कमरों में ‘कैद’ जनप्रतिनिधि, सड़कों पर परेशान जनता – चुनाव के समय जो हाथ घर-घर जाकर वोट की गुहार लगा रहे थे, वे आज जनसमस्याओं के समाधान के लिए उठते नहीं दिख रहे। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर पालिका के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि अब एसी कमरों तक सीमित होकर रह गए हैं।

  • राशन कार्ड का संकट : गरीब तबका महीनों से नगर पालिका के चक्कर काट रहा है, लेकिन फाइलों की धूल साफ नहीं हो रही।
  • भ्रष्टाचार की गूँज : एनओसी (NOC), मकान निर्माण अनुमति और अतिक्रमण जैसे मामलों में ‘वसूली’ की चर्चाएं अब सरेआम हैं।

क्या पत्थलगांव की जनता का काम सिर्फ सत्ता पक्ष के नेताओं को वाहवाही बटोरने का मौका देना है? जब अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और विधायक (गोमती साय) सब सत्ता पक्ष से हैं, तो विकास के नाम पर ‘बजट का रोना’ क्यों?” – यह सवाल आज हर नगरवासी की जुबान पर है।

सत्ता का रसूख… या विकास का छलावा? – विधायक गोमती साय ने चुनाव पूर्व शहर के कायाकल्प का जो रोडमैप दिखाया था, वह अब कागजों से बाहर नहीं निकल पा रहा है। अधोसंरचना विकास (Infrastructure) के कार्य पूरी तरह ठप्प हैं। निर्माण कार्यों के बजाय नगर पालिका अब अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों का केंद्र बनती जा रही है।

मुख्य बिंदु जो प्रशासन और सरकार को कटघरे में खड़ा करते हैं :

  • फंड की कमी : सत्ता पक्ष के पार्षद होने के बाद भी बजट का अभाव।
  • प्रशासनिक उदासीनता : राशन कार्ड जैसे बुनियादी कार्यों के लिए आम जनता की भारी फजीहत।
  • अवैध वसूली के आरोप : निर्माण और अनुमति कार्यों में कथित लेन-देन की बढ़ती शिकायतें।

सुलगता सवाल – यदि मुख्यमंत्री के अपने जिले में एक महत्वपूर्ण नगर पालिका की यह स्थिति है, तो प्रदेश के बाकी हिस्सों में विकास का पैमाना क्या होगा? पत्थलगांव की जनता अब ‘नगर पालिका’ के केवल नाम से संतुष्ट नहीं है, उसे वह विकास चाहिए जिसका वादा चुनाव के समय किया गया था। उदासीनता का यह आलम कहीं आने वाले समय में सत्ता पक्ष के लिए भारी न पड़ जाए।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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