बस्तर में विकास का नया सूर्योदय, आदिवासियों की संस्कृति में बसती है छत्तीसगढ़ की आत्मा : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु…

जगदलपुर। देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर में तीन दिवसीय संभाग स्तरीय ‘बस्तर पंडुम-2026’ का भव्य शुभारंभ किया। ऐतिहासिक लालबाग मैदान में आयोजित इस समारोह में राष्ट्रपति ने बस्तर की समृद्ध जनजातीय विरासत की सराहना करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ की आत्मा यहाँ के आदिवासियों की संस्कृति और परंपराओं में बसती है। उन्होंने माओवाद के खात्मे और बस्तर में लौटती शांति को विकास का ‘नया सूर्योदय’ करार दिया।
सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव : माँ दंतेश्वरी के जयघोष से शुरुआत – राष्ट्रपति ने अपने संबोधन की शुरुआत बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी के जयघोष के साथ की। उन्होंने कहा कि बस्तर पंडुम केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासियों की गौरवशाली संस्कृति का जीवंत प्रतिबिंब है।
- बेटियों की शिक्षा पर जोर : राष्ट्रपति ने विशेष रूप से आदिवासी बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकार के साथ-साथ समाज और माता-पिता को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
- हिंसा से लोकतंत्र की ओर : राष्ट्रपति ने संतोष व्यक्त किया कि चार दशकों के संघर्ष के बाद अब बस्तर में भय का वातावरण समाप्त हो रहा है। उन्होंने कहा कि माओवादी हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं और बंद स्कूल फिर से खुल रहे हैं।
अबूझमाड़ के नन्हे वीरों और गौर नृत्य ने मोहा मन : कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण अबूझमाड़ के मल्लखंब खिलाड़ियों और बास्तानार के ‘गौर नृत्य’ दल की प्रस्तुतियां रहीं:
- मल्लखंब का जादू : अबूझमाड़ मल्लखंब एंड स्पोर्ट्स एकेडमी के नन्हे खिलाड़ियों ने लकड़ी के खंभे पर अद्भुत संतुलन और फुर्ती दिखाई। ‘इंडियाज गॉट टैलेंट’ के विजेता इन बच्चों के करतब देखकर राष्ट्रपति ने स्वयं ताली बजाकर उनका उत्साहवर्धन किया।
- गौर नृत्य की धमक : बास्तानार के युवाओं ने ‘बाइसन हॉर्न’ (गौर के सींग) पहनकर पारंपरिक ‘गौर नृत्य’ प्रस्तुत किया। ढोल की थाप और कौड़ियों से सजे मुकुटों के साथ माड़िया जनजाति के इस नृत्य ने बस्तर की वन्य संस्कृति को जीवंत कर दिया।
भव्य प्रदर्शनी : बस्तर के शिल्प और व्यंजनों का अवलोकन – राष्ट्रपति ने आयोजन स्थल पर लगाई गई भव्य प्रदर्शनी का बारीकी से अवलोकन किया। उन्होंने जनजातीय कारीगरों से संवाद कर उनकी कला को समझा:
- शिल्प कला: प्रदर्शनी में ढोकरा हस्तशिल्प (लॉस्ट वैक्स कास्टिंग तकनीक), लौह शिल्प, टेराकोटा, वुड कार्विंग और तुम्बा कला का प्रदर्शन किया गया।
- परंपरागत खान-पान: स्थानीय व्यंजनों के स्टॉल पर मंडिया पेज, चापड़ा चटनी, तीखुर और सल्फी जैसे पारंपरिक खाद्य एवं पेय पदार्थों को प्रदर्शित किया गया।
मुख्यमंत्री का संकल्प : 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद का अंत – मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए बस्तर के बदलते स्वरूप को रेखांकित किया:
- विकास के मील के पत्थर : उन्होंने नियद नेल्ला नार (आपका अच्छा गाँव), प्रधानमंत्री जनमन और ‘धरती आबा’ अभियान जैसी योजनाओं का जिक्र किया, जिनसे सुदूर वनांचलों में बिजली, सड़क और पानी पहुँच रहा है।
- सुरक्षा और शांति : मुख्यमंत्री ने दोहराया कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के संकल्प से 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को समूल समाप्त कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि जहाँ कभी गोलियां चलती थीं, आज वहाँ स्कूल की घंटियाँ बज रही हैं।
राज्यपाल का संदेश : जल, जंगल और जमीन का सामंजस्य – राज्यपाल श्री रमेन डेका ने कहा कि बस्तर की सबसे बड़ी ताकत प्रकृति के साथ उसका सामंजस्य है। उन्होंने ‘ढोकरा कला’ को छत्तीसगढ़ की शान बताया और कहा कि बस्तर पंडुम जैसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं।
प्रमुख उपस्थितियाँ : इस ऐतिहासिक अवसर पर राज्यपाल श्री रमेन डेका, मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय, उपमुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा, केंद्रीय राज्य मंत्री श्री तोखन साहू, वन मंत्री श्री केदार कश्यप, संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल सहित बस्तर के जन प्रतिनिधि, पारंपरिक मांझी-चालकी, गायता और हज़ारों की संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।


