सिस्टम का ‘दोहरा चरित्र’ : शहर में भू-माफियाओं को ‘अभयदान’, गांव में पेड़ लगाने वालों पर ‘दोहरी मार’…

• एक ‘गुनाह’, दो अदालतें : तमनार में पेड़ लगाने की ‘सजा’ बनी ग्रामीणों के लिए जी का जंजाल…
रायगढ़/तमनार। जिला प्रशासन की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ‘अंधेर नगरी’ की तर्ज पर चल रहे सिस्टम का आलम यह है कि शहर के बीचों-बीच सरकारी जमीनों पर कंक्रीट के अवैध महल खड़े हो रहे हैं, जिस पर प्रशासन की ‘चुप्पी’ नहीं टूटती। वहीं, सुदूर गांव में अगर कोई पर्यावरण बचाने के लिए सरकारी जमीन पर आम या सागौन का पौधा लगा दे, तो पूरा प्रशासनिक अमला उसे अपराधी साबित करने में जुट जाता है।
मामला तमनार ब्लॉक के ग्राम सारसमाल का है, जहां प्रशासन ने एक अजीबोगरीब नजीर पेश की है – “एक अपराध, दो सजा।”
क्या है पूरा मामला? – सारसमाल में खसरा नंबर 90/4, रकबा 11.002 हेक्टेयर भूमि ‘बड़े झाड़ के जंगल’ के रूप में दर्ज है। गांव के पांच लोगों ने, जिनमें एक जनपद सदस्य के पति भी शामिल हैं, इस बंजर भूमि पर हरियाली लाने के उद्देश्य से आम और सागौन के पौधे रोपे। कुछ हिस्से में सरसों भी बोई गई। मौके पर न तो कोई पक्का निर्माण हुआ, न ही कोई व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स खड़ा किया गया। लेकिन, यह ‘हरियाली’ सिस्टम की आंखों में चुभ गई।
राजनीतिक खुन्नस और प्रशासन का ‘हथियार’ बनना – इस पूरी कार्यवाही की नींव ‘राजनीतिक रंजिश’ पर टिकी है।
- शिकायतकर्ता बीडीसी चुनाव में हारा हुआ प्रत्याशी अनिल गुप्ता है।
- आरोप है कि चुनावी हार का बदला लेने के लिए उसने अतिक्रमण की शिकायत को हथियार बनाया।
- हैरानी की बात यह है कि प्रशासन ने बिना जमीनी हकीकत और नीयत देखे, शिकायत पर तुरंत ‘एक्शन मोड’ ऑन कर दिया।
न्यायिक प्रक्रिया का मज़ाक: जुर्माना भरा, फिर भी नोटिस! – इस मामले ने प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
- तहसीलदार कोर्ट : पहले तमनार तहसीलदार ने नोटिस दिया। ग्रामीणों ने जवाब दिया कि वृक्षारोपण जनहित में है, व्यक्तिगत कब्जे के लिए नहीं। कोर्ट ने जुर्माना लगाया, जिसे अनावेदकों ने भर भी दिया।
- कलेक्टर कोर्ट : जब एक कोर्ट में मामला रफा-दफा हो गया और जुर्माना अदा कर दिया गया, तो उसी मामले में अब कलेक्टर न्यायालय से दोबारा नोटिस जारी कर दिया गया है।
कानून के जानकारों और ग्रामीणों का सवाल है कि “क्या एक ही कृत्य के लिए एक नागरिक को दो अलग-अलग अदालतों में घसीटा जा सकता है?” यह ‘डबल जेपार्डी’ (Double Jeopardy) यानी दोहरे दंड के सिद्धांत का उल्लंघन प्रतीत होता है।
‘हरियर छत्तीसगढ़’ के नारे पर तमाचा – एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर ‘हरियर छत्तीसगढ़’ का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ सारसमाल में पर्यावरण संरक्षण करने वालों को प्रताड़ित किया जा रहा है। ग्रामीणों का तर्क तीखा और सीधा है :
“अगर पेड़ लगाना अतिक्रमण है, तो सरकार वृक्षारोपण के नाटक क्यों करती है? शहर में सरकारी जमीनों को निगलने वाले ‘सफेदपोशों’ पर नोटिस भेजने में स्याही क्यों सूख जाती है?”
भविष्य के लिए खतरनाक संकेत – इस कार्यवाही ने ग्रामीणों के मन में भय पैदा कर दिया है। दोहरे न्यायिक संकट में फंसे लोग अब सोच रहे हैं कि भविष्य में सामुदायिक भलाई या पर्यावरण के लिए एक कदम भी आगे बढ़ाना, उनके लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने का सबब बन जाएगा। प्रशासन की यह ‘अति-सक्रियता’ गांव में सामाजिक कार्यों की कमर तोड़ने के लिए काफी है।




