सारंगढ़ - बिलाईगढ़

सारंगढ़ में ‘सूचना के अधिकार’ की हत्या: RTI का गला घोंटकर भ्रष्टाचार पर परदा डालने की साजिश? SDM ऑफिस का तुगलकी फरमान!…

ग्राम पंचायत सहजपाली में हुए ‘खेल’ को छुपाने के लिए अफसरों ने कानून का ही बना दिया मजाक, आवेदक को थमाया ‘नकल’ का झुनझुना।…

सारंगढ़-बिलाईगढ़। क्या सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में ‘सूचना का अधिकार अधिनियम-2005’ की मियाद खत्म हो चुकी है? या फिर यहाँ के सरकारी बाबुओं ने कसम खा ली है कि चाहे जो हो जाए, “सच” को बाहर नहीं आने देंगे? यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि अनुविभागीय अधिकारी (रा.) एवं जन सूचना अधिकारी, सारंगढ़ के कार्यालय से जो जवाब निकला है, उसने प्रशासनिक पारदर्शिता की धज्जियां उड़ा दी हैं।

​मामला ग्राम पंचायत सहजपाली में हुई कथित अनियमितताओं, जांच और नोटिस के ‘गोलमाल’ से जुड़ा है, जिसे दबाने के लिए अब आरटीआई (RTI) कानून की ही गलत व्याख्या की जा रही है।

क्या छुपा रहे हैं साहब? – ​आवेदक अजय कुमार साहू ने 5 दिसंबर 2025 को एक सीधा सवाल पूछा था। वे ग्राम पंचायत सहजपाली के सरपंच-सचिव के खिलाफ हुई जांच, जारी नोटिस, उनके बयान और जांच टीम के प्रतिवेदन की कॉपी चाहते थे। ये वो दस्तावेज हैं जो जनता के पैसे के हिसाब-किताब और सरकारी कार्यवाही की हकीकत बताते हैं।

​लेकिन, जन सूचना अधिकारी ने जानकारी देने के बजाय आवेदक को कानून का एक ऐसा पेंच दिखाया, जिसे देखकर जानकार भी हैरान हैं।

RTI से बचने का नया ‘हथकंडा’ – ​दिनांक 26/12/2025 और 29/12/2025 को जारी पत्रों में जन सूचना अधिकारी ने जानकारी देने से साफ मना कर दिया। तर्क क्या दिया गया?

“जिन दस्तावेजों की नकल (Certified Copy) विधि की प्रक्रिया से मिल सकती है, उसके लिए RTI का उपयोग नहीं किया जा सकता।”

​इसके लिए उन्होंने 2008 के एक पुराने CIC आदेश (महाबीर वि. नगरपालिका निगम दिल्ली) का हवाला दिया।

सीधा सवाल: जब RTI एक्ट की धारा 22 साफ कहती है कि यह कानून अन्य कानूनों के ऊपर प्रभावी होगा, तो फिर आवेदक को “नकल शाखा” के चक्कर काटने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है? क्या यह सिर्फ इसलिए है ताकि आवेदक परेशान होकर हार मान ले और पंचायत का “सच” फाइलों में ही दफन रह जाए?

‘फाइल नोटिंग’ देने में क्यों कांप रहे हाथ? – सबसे बड़ा शक तब गहराता है जब दूसरे पत्र में अफसर “प्रशासनिक कार्यवाहियों की फाइल नोटिंग” देने से भी कतराते नजर आते हैं। फाइल नोटिंग ही वह आईना है जो बताता है कि किस अफसर ने फाइल पर क्या लिखा और कैसे भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया गया। क्या सहजपाली पंचायत मामले में किसी “खास” को बचाने के लिए ऊपर से नीचे तक जोर लगाया जा रहा है?

लोकतंत्र के ‘प्रहरी’ या ‘सिस्टम’ के रक्षक? – ​जिस जन सूचना अधिकारी की कुर्सी जनता को सूचना देने के लिए लगाई गई है, अगर वही अफसर कानून की आड़ लेकर सूचना रोके, तो इसे क्या समझा जाए? यह महज अज्ञानता नहीं है, यह सोची-समझी रणनीति लगती है।

  1. ​जांच प्रतिवेदन सार्वजनिक क्यों नहीं है?
  2. ​सरपंच-सचिव के बयान में ऐसा क्या है जो बाहर आने पर हंगामा मच सकता है?
  3. ​क्या जिला प्रशासन को डर है कि RTI के जरिए उनकी अपनी ही जांच टीम की पोल खुल जाएगी?

कार्रवाई की दरकार – ​यह मामला अब सिर्फ अजय कुमार साहू का नहीं, बल्कि सिस्टम की नीयत का है। जिस तरह से पुराने और अप्रासंगिक तर्कों का सहारा लेकर RTI आवेदन को खारिज किया गया है, वह धारा 20 के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।

​अब देखना यह है कि जिले के कलेक्टर और राज्य सूचना आयोग इस “लीपापोती” पर कब संज्ञान लेते हैं। क्या इस जन सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगेगा और विभागीय जांच होगी? या फिर सारंगढ़ में फाइलों का पेट भरने का खेल यूं ही चलता रहेगा?

जनता पूछ रही है : साहब! अगर दाल में कुछ काला नहीं है, तो पूरी दाल दिखाने से डर क्यों रहे हो?

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!