बलौदाबाजार में धान खरीदी पर संकट! सहकारी समितियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल से समर्थन मूल्य योजना लड़खड़ाने की कगार पर

बलौदाबाजार। राज्य सरकार भले ही 15 नवंबर से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की तैयारियों को लेकर दावा कर रही हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है। सहकारी समिति कर्मचारियों और कंप्यूटर ऑपरेटरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल से खरीदी व्यवस्था पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
चार सूत्रीय मांगों को लेकर पांच संभागों के सैकड़ों कर्मचारी 4 नवंबर से हड़ताल पर हैं। शुक्रवार को आंदोलन अपने पांचवें दिन में प्रवेश कर गया, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। इससे किसानों और समितियों दोनों में गहरी नाराजगी पनपने लगी है।
लोहिया चौक बना आंदोलन का केंद्र : महासमुंद के लोहिया चौक पर हुए संभाग स्तरीय धरना-प्रदर्शन में बलौदाबाजार जिले के सैकड़ों कर्मचारियों ने शामिल होकर सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि अगर शासन ने जल्द समाधान नहीं निकाला तो यह आंदोलन प्रदेशव्यापी रूप ले लेगा – और धान खरीदी बहिष्कार की स्थिति बन जाएगी।
चार प्रमुख मांगों पर अडिग कर्मचारी : जिला सहकारी समिति कर्मचारी संघ ने सरकार के सामने चार ठोस मांगें रखी हैं –
- धान खरीदी वर्ष 2023-24 एवं 2024-25 की संपूर्ण सुखद राशि समितियों को तुरंत प्रदान की जाए।
- धान परिवहन में विलंब रोकने के लिए हर सप्ताह पूर्ण परिवहन सुनिश्चित किया जाए।
- शॉर्टेज, प्रोत्साहन, कमीशन और सुरक्षा व्यय में वृद्धि की जाए।
- मध्यप्रदेश की तर्ज पर उचित मूल्य विक्रेताओं को 3 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाए।
संघ के जिला सचिव सुखदेव सेन ने कहा –
“शासन ने पहले भी लिखित आश्वासन दिए, लेकिन आज तक एक भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। अगर सरकार फिर टालमटोल करती रही, तो इस बार कर्मचारी धान खरीदी का पूर्ण बहिष्कार करेंगे।”
किसानों में बढ़ी बेचैनी, प्रशासन मौन : धान खरीदी की तय तारीख करीब आने के बावजूद हड़ताल खत्म होने के कोई संकेत नहीं हैं। इससे किसानों के बीच चिंता गहराने लगी है कि समय पर खरीदी नहीं हुई तो उनकी फसल खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बिक जाएगी। वहीं प्रशासनिक तंत्र की चुप्पी इस संकट को और गहरा रही है।
राज्य सरकार के लिए चेतावनी की घंटी : सहकारी समितियों का यह असंतोष न केवल खरीदी व्यवस्था को ठप कर सकता है, बल्कि सरकार की कृषि नीति और प्रशासनिक समन्वय पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। अगर जल्द ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो यह आंदोलन छत्तीसगढ़ के समर्थन मूल्य तंत्र की रीढ़ मानी जाने वाली धान खरीदी प्रणाली को झकझोर सकता है।




