लैलूंगा : राजपुर में राजस्व अमले का ‘गोलमाल’, खसरा 380/6 के सीमांकन में क्यों पसीने छूट गए RI और पटवारी के? क्या अब तहसीलदार को खुद उतरना पड़ेगा मैदान में?…

रायगढ़। जिले की लैलूंगा तहसील के ग्राम राजपुर में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला खसरा नंबर 380/6 से जुड़ा है, जिसका सीमांकन करने में स्थानीय राजस्व निरीक्षक (RI) और पटवारी नाकाम साबित हुए हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस जमीन की नाप-जोख में ऐसा क्या ‘खेल’ है कि जिम्मेदार अधिकारी कार्यवाही पूरी किए बिना ही अपने कदम पीछे खींच रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल—क्या इस सीमांकन विवाद की भेंट वह प्रस्तावित सड़क चढ़ जाएगी जिसका लोगों को इंतज़ार था?

यहाँ प्रस्तुत है इस पूरे विवाद की एक विस्तृत और धारदार ग्राउंड रिपोर्ट:
क्या है खसरा 380/6 का पूरा ब्यौरा? – राजस्व दस्तावेजों और खसरा नक्शे ने इस जमीन की जो तस्वीर पेश की है, वह इस प्रकार है:
- ग्राम राजपुर (पटवारी हल्का नंबर 00003) में स्थित खसरा नंबर 380/6 की कुल भूमि 0.6760 हेक्टेयर है।
- दस्तावेजों के अनुसार, यह एक असिंचित कृषि भूमि है।
- इस जमीन के भूमिस्वामी राकेश कुमार हैं, जिनके पिता का नाम कीर्तनप्रसाद है।
क्या है 380/6 का ‘खेल’ और क्यों अटका सीमांकन? – विवाद की असली जड़ खसरा नक्शे की भौगोलिक स्थिति में छिपी है।
- खसरा नक्शे के अनुसार, भूमि 380/6 कई अन्य खसरों (जैसे 377, 378/4, 378/3, 379, 380/1, 380/19 आदि) से घिरी हुई एक बड़ी संरचना है।
- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस खसरे के पश्चिमी छोर पर खसरा 338 और 481 दर्ज हैं, जो नक्शे में स्पष्ट रूप से एक लंबी पट्टी यानी एक मार्ग या सड़क की शक्ल में नजर आ रहे हैं।
जब इस सड़क (संभावित खसरा 338/481) और निजी भूमि (380/6) की सरहद तय करने की बात आई, तो RI और पटवारी का अमला सीमांकन को अंतिम रूप नहीं दे सका। अक्सर ऐसे मामलों में ‘खेल’ यह होता है कि या तो शासकीय मार्ग की ज़मीन पर अतिक्रमण होता है या फिर निजी खातेदार की ज़मीन सड़क में जा रही होती है। बिना स्पष्ट सीमांकन के, मौके पर यथास्थिति बनाए रखने का बहाना बनाकर अधिकारी पल्ला झाड़ लेते हैं।
क्या अब तहसीलदार को खुद उतरना पड़ेगा मामले में? – लैलूंगा तहसील के अंतर्गत आने वाले इस संवेदनशील मामले में अब निचले अमले (RI और पटवारी) की नाकामी के बाद गेंद सीधे तहसीलदार के पाले में आ गई है। पटवारी और RI के सीमांकन की कार्यवाही पूरी न कर पाने का सीधा अर्थ है कि मामला सामान्य नाप-जोख से परे है। यदि इस ‘खेल’ को खत्म कर पारदर्शी तरीके से शासकीय और निजी भूमि का निर्धारण करना है, तो अब तहसीलदार को स्वयं मौके पर जाकर, राजस्व न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस विवादित सीमांकन को अपने निर्देशन में पूर्ण कराना होगा।
…तो क्या अब सड़क बनने से रही? – इस प्रशासनिक लेटलतीफी और सीमांकन के पेंच का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। जब तक यह तय नहीं हो जाता कि 0.6760 हेक्टेयर की निजी कृषि भूमि की सीमा कहाँ समाप्त होती है और सार्वजनिक मार्ग कहाँ से शुरू होता है, तब तक कोई भी निर्माण एजेंसी वहाँ सड़क बनाने का जोखिम नहीं लेगी।
जब तक राजस्व विभाग इस खसरे की गुत्थी नहीं सुलझाता, तब तक सड़क का निर्माण अधर में ही लटका रहेगा। अब देखना यह है कि प्रशासन इस ‘गोलमाल’ को सुलझाकर सड़क का रास्ता साफ करता है, या फाइलें दबी रह जाती हैं।




