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पन्ने पलटने की कायरता बनाम किताब बंद करने का खौफनाक सच…

लेख – ऋषिकेश मिश्रा

जिंदगी उस चौराहे पर आकर बेहद बेदर्द हो जाती है जहाँ सांस लेना भी एक भारी समझौते जैसा लगने लगता है। जब इंसान के भीतर की सारी उम्मीदें चुक जाती हैं, तब वह उस मेज पर अकेला बैठता है जहाँ उसके अतीत, उसके आंसुओं और उसके फैसलों की एक फटी हुई किताब खुली होती है। उंगलियाँ पन्ने के आखिरी कोने को छू रही होती हैं, और भीतर एक तीखा सवाल गूंजता है: क्या एक बार फिर खुद को धोखा देकर पन्ना पलटा जाए, या एक ही झटके में इस किताब की जिल्द को हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए?

​यह फैसला दिमाग का नहीं, उस लहूलुहान आत्मसम्मान का होता है जिसे हम बरसों से दुनिया की नज़रों से छिपाकर ढो रहे होते हैं। लोग अक्सर कह देते हैं कि ‘समय हर घाव भर देता है’ या ‘जिंदगी में अगला पन्ना हमेशा नया होता है’। मगर यह उन कायरों का फलसफा है जो उस कड़वे सच को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि जिस किताब की बुनियाद ही गलत हो, उसका हर अगला पन्ना पहले वाले से ज्यादा जहरीला साबित होगा।

पन्ना पलटने का सीधा सा अर्थ है – वही सड़ांध, वही किरदार, वही फरेब, बस तारीख और जगह नई। हम पन्ना तब पलटते हैं जब हम अकेलेपन के सन्नाटे से डरते हैं। हम खुद को यह तसल्ली देते हैं कि शायद अगला पैराग्राफ हमारे हक में लिखा होगा। हम माफ करते हैं, हम समझौता करते हैं, हम अपने आंसुओं को यह कहकर पी जाते हैं कि ‘शायद इस बार चीजें सुधर जाएं’।

​लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा वीभत्स होती है। जब आप बार-बार पन्ना पलटते हैं, तो आप सामने वाले को यह लाइसेंस दे रहे होते हैं कि वह आपकी आत्मा पर अपने जूते साफ करके आगे बढ़ सकता है। हर नया पन्ना उन लोगों के लिए सिर्फ एक और मौका बनता है जो आपकी सहनशीलता की हदें नापने में लगे हैं। यदि हर मोड़ पर आपकी गरिमा को कुचला जा रहा है, आपकी उपस्थिति को एक आदत मानकर खारिज किया जा रहा है, तो नया पन्ना पलटना कोई परिपक्वता नहीं है; वह अपने ही हाथों अपनी बलि चढ़ाने का घिनौना सिलसिला है।

​किताब बंद करना कोई सहज विदाई नहीं होती। यह उस भ्रम की निर्मम हत्या है जिसे आपने शायद अपनी पूरी जवानी, अपनी सारी ऊर्जा और अपनी सांसें सौंपकर सींचा था। इसका मतलब है यह बेबाक स्वीकारोक्ति कि यह कहानी एक कचरा थी, और इसका कोई भी अंत खूबसूरत नहीं हो सकता था।

​किताब तब बंद की जाती है जब इंसान के भीतर का सारा शोर मर जाता है। न चीखने की इच्छा बचती है, न सफाई देने की चाहत, और न ही किसी को गलत साबित करने का उफान। एक बिल्कुल ठंडा, सुन्न और अटल मौन छा जाता है। उस क्षण आपको यह समझ आ जाता है कि:

  • ​जिस रिश्ते में आपको अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए लगातार गिड़गिड़ाना पड़े, वह रिश्ता नहीं बल्कि एक खुला अपमान है।
  • ​जिस सपने या काम में आपकी मानसिक शांति और वजूद ही दांव पर लग जाए, वह सफलता नहीं बल्कि एक सजी-धजी बर्बादी है।
  • ​और जिस जगह आपकी कद्र सिर्फ तब होती है जब सामने वाले को कोई जरूरत हो, वहाँ से आपका खामोशी से निकल जाना ही सबसे बड़ी बगावत है।

​उस मोड़ पर उस खुली हुई किताब को पटककर बंद करना पड़ता है। उस पर जम चुकी धूल को झाड़ने का कोई मतलब नहीं रहता। उसे बंद करने का मतलब यह नहीं कि आप माफ कर रहे हैं या भूल रहे हैं; इसका सीधा मतलब यह है कि सामने वाला अब इस लायक भी नहीं बचा कि उस पर आपका एक और शब्द, एक और सांस, या एक और आंसू खर्च हो।

​फर्क सिर्फ इतना है कि पन्ना तब पलटा जाता है जब कहानी में संघर्ष आपका हो और किरदार सच्चे हों। जहाँ सामने वाले की आँखों में पछतावे की नमी हो और दोनों तरफ से आग को सुलगाने की कोशिश बराबर हो।

​लेकिन जब आप यह देख लें कि आप एक मृत लाश को जीवित करने की कोशिश में अपनी नसों का खून बहा रहे हैं, तो तुरंत रुक जाइए। उस किताब को बंद कीजिए। न जिल्द पर नाम देखने की जरूरत है, न यह जानने की बेचैनी कि बाकी पन्नों में क्या लिखा जा सकता था। जिंदगी किसी एक अध्याय या किसी एक इंसान की मोहताज नहीं होती। यह एक अनंत यात्रा है, और जब तक आप उस गला घोंटने वाली किताब को अपनी मेज से उठाकर रद्दी के ढेर में नहीं फेंकेंगे, तब तक आपके खाली हाथों में अपनी खुद की, एक आजाद और बेबाक दास्तान लिखने की ताकत नहीं आएगी।

​किताब बंद करना हार नहीं है। यह उन तमाम बदतमीजियों, समझौतों और आंसुओं के मुंह पर आत्मसम्मान का एक ऐसा तमाचा है, जिसकी गूंज उस कहानी के किरदारों को उनकी आखिरी सांस तक सुनाई देगी।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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